18 February, 2019

कीमो व इम्यूनोथेरेपी से फेफड़े के कैंसर पर वार

एनडीएस संवाददाता
लखनऊ। फेफड़े के कैंसर को हराने के लिए दोतरफा हमला होगा। कीमोथेरेपी के साथ इम्यूनोथेरेपी से कैंसर पर वार होगा। डॉक्टरों का कहना है कि दोनों थेरेपी चलने से मरीज की सेहत में सुधार देखा गया है। जो फेफड़े  (लंग) का कैंसर से पीडि़त मरीज छह माह में दम तोड़ते थे उनका जीवन डेढ़ साल से ज्यादा लंबा हो गया है।
फेफड़े का कैंसर जागरुकता सप्ताह के तहत लोहिया संस्थान में मेडिकल आंकोलॉजिस्ट डॉ. गौरव गुप्ता ने बताया कि  जागरुकता के बावजूद फेफड़े के कैंसर से पीडि़त 90 प्रतिशत मरीज आखिरी अवस्था में डॉक्टर के पास पहुंचते हैं। शुरुआती लक्षणों को टीबी व सांस की बीमारी मानकर डॉक्टर इलाज शुरू करते हैं। जांच के बाद फेफड़े के कैंसर का पता चलता है। आखिरी अवस्था में कैंसर काफी फैल चुका होता है। ऐसे में डॉक्टर के पास करने को कुछ नहीं होता है। यही वजह है कि देश में फेफड़े के कैंसर से मरने वालों की संख्या सबसे ज्यादा है। डॉ. गौरव गुप्ता ने बताया कि फेफड़े के कैंसर में खांसी, बलगम के साथ खून आता है। सीने में दर्द महसूस होता है। धीरे-धीरे भूख में कमी आने लगती है। बुखार, सिर दर्द, नींद न आना, कमजोरी महूसस होती है। इलाज में देरी से हड्डियों में दर्द होने लगता है। हैरानी की बात यह है कि यह सभी लक्षण टीबी में भी नजर आते हैं। ऐसे में मरीज के साथ डॉक्टर भी भ्रम में रहते हैं। वह शुरु में टीबी का इलाज शुरू कर देते हैं। दवा फायदा नहीं करती है। इस दौरान कैंसर बढ़ता है। फेफड़े के कैंसर का सबसे बड़ा कारण धूम्रपान है। कैंसर महिलाओं के मुकाबले पुरुषों में ज्यादा होता है। उन्होंने बताया कि फेफड़े के कैंसर की पहचान बायोप्सी से होती है।
डॉ. गौरव गुप्ता ने बताया कि फेफड़े की टीबी या सांस की बीमारी का इलाज शुरू करने से पहले जांच कराएं। शक के आधार पर फेफड़े के कैंसर की पहचान के लिए मॉलीक्यूलर जांच भी कराएं। इस जांच से न सिर्फ बीमारी की गंभीरता बल्कि इलाज की दिशा भी तय होती है। उन्होंने बताया कि फेफड़े के कैंसर में कीमोथेरेपी के साथ इम्यूनोथेरेपी दी जा सकती है। इलाज का यह तरीका कैंसर को खत्म करने में कारगर साबित हो रहा है।
डॉ. हर्षवर्धन आत्रेय ने बताया कि भारत में स्क्वैमस सेल काॢसनोमा सबसे आम फेफड़ो का कैंसर बन गया है। अधिकंाश कैंसर के लिए बढ़ती उम्र सबसे बड़ा कारण है। फेफड़ो के कैंसर के अन्य कारकों में तंबाकू का उपयोग, वायु प्रदूषण, रेडिएंट थेरेपी से छाती का एक्सपोजर, सीटी स्कैन, फेफड़ों के कैंसर का पारिवारिक इतिहास भी शामिल है।  फेफड़ों का कैंसर आमतौर पर इसके शुरुआत में लक्षण नजर नहीं आते हैं। इसकी पहचान पहचान भी आसान नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों के आधार पर समय रहते जांच कराई जाये तो मरीज की जान बचाई जा सकती है। कम वसा वाले, उच्च फाइबर आहार, ताजा फल और सब्जियां, अनाज का सेवन, फेफड़ों के साथ ही अन्य प्रकार के कैंसर और हृदय रोग के खतरे को कम कर सकते हैं। प्रदूषण के संपर्क में आने से बचने के लिए मास्क का प्रयोग करें। नियमित व्यायाम  फेफड़ों व अन्य प्रकार के कैंसर को कम कर सकता है। वयस्कों को हर रोज एरोबिक एक्टिविटी कम से कम 30 मिनट करनी चाहिए।

 

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