23 April, 2018

आमेट में शहीद गुलाबशाह का दो दिवसीय उर्स 3 से

उदयपुर । राजस्थान के राजसमंद जिले के आमेट में नदी दरवाजा स्थित हजरत पीर सैयद शहीद गुलाबशाह का दो दिवसीय 19वां उर्स मुबारक 3 नवम्बर से शुरू होगा।
हजरत जावेद बापू सूरत की जेरे सदारत व जामा मस्जिद आमेट के मौलाना मोहम्मद मुस्तकीम की सरपरस्ती मे आयोजित होने वाले दो दिवसीय उर्स के तहत 3 नवम्बर सुबह दरगाह शरीफ पर कुरआन ख्वानी व परचम कुशाई होगी। जोहर की नमाज के बाद चादर शरीफ का नये अंजुमन मदरसे से गाजे बाजे के साथ जुलूस शुरू होकर शाम को बाबा के आस्ताने पर पहुंचेगा। रात्रि में ईशा की नमाज के बाद महफिल व कव्वाली का आयोजन होगा जिसमंे कव्वाल इरफान तुफेल एंड पार्टी व शौकत अंदाज एंड पार्टी जोधपुर कलाम पेश करेंगी। दूसरे दिन शनिवार सुबह से कुल की रस्म अदा की जायेगी। उर्स मे शिरकत करने वाले जायरीनों के लिये लंगर ग्रुप की ओर से लंगर की व्यवस्था की गई है। उर्स को लेकर दरगाह कमेटी की ओर से दरगाह परिसर मे साफ सफाई व रंगरोगन का कार्य किया जा रहा है।
मेवाड़ के लिए कुर्बान हुए थे बाबा गुलाबशाह
-गुलाबशाह बाबा आमेट के मुस्लिम समाज की धार्मिक हस्ती होने के साथ आमेट के इतिहास पुरुष भी हैं। आमेट ठिकाने की सेना के ओहदेदार के रूप में गुलाबशाह बाबा ने आमेट की हिफाजत के जंग में बहादुरी दिखाते हुए शहादत दी।
यह बात मेवाड़ के महाराणा प्रताप के सभी को साथ लेकर चलने की नीति से शुरू होती है। महाराणा प्रताप ने हकीम खां सूरी को अपना प्रधान सेनापति बनाया था। महाराणा प्रताप का उद्देश्य राज्य और राजनीति में सभी को साथ लेकर चलने का रहा। इसी नीति के कारण अकबर की सेना को मेवाड़ से खाली हाथ लौटना पड़ा था और अकबर इतना शक्तिशाली होते हुए भी मेवाड़ को अपने अधीन नहीं कर सका। महाराणा प्रताप के समय से ही मेवाड़ के महाराणाओं ने अपने राज दरबार में 16 बड़े ठिकानेदारों के साथ एक मुस्लिम जागीरदार की बैठक शामिल की जिसे 17वां उमराव कहा गया। इस परिपाटी में मेवाड़ के सभी बड़े ठिकानों में एक मुस्लिम को जागीर देकर उसे अपनी बैठक में शामिल किया गया। 17वें उमराव मंे सिंध से आए सिंधी मुसलमान थे। इसी क्रम में मेवाड़ के कई बड़े ठिकानों में सिंधी मुसलमानों को जागीर और बैठक देने में प्राथमिकता दी गई।
इसी के तहत आमेट ठिकाने में लगभग 150 वर्ष पूर्व गुलाबशाह बाबा सेना के ओहदेदार थे। एक राजपूत समूह ने जब आमेट पर कब्जा करने के लिए हमला किया तब गुलाबशाह बाबा आमेट की हिफाजत के लिए लड़ रहे थे। उस समय ठिकाने के मुख्यालय के रूप में आमेट चारों ओर परकोट से सुरक्षित था। आमेट के आवागमन के चार दरवाजे थे। इनमें पूर्व में वराई दरवाजा, पश्चिम में मारू दरवाजा, उत्तर में नदी दरवाजा और दक्षिण में आगरिया का दरवाजा था।
तीन दरवाजों की ओर से बाहरी सेना के हमले का ज्यादा खतरा नहीं था। चन्द्रभागा नदी दरवाजे के सामने नदी पार करने या नदी में पानी कम होने पर काफी लम्बा और खुला मैदानी भाग था। यहां से बाहरी हमलावरों के आने का पूरा खतरा था। अतः गुलाबशाह बाबा नदी दरवाजे की बुर्ज पर ही तैनात होकर आमेट की हिफाजत कर रहे थे। माना जाता है कि तभी आमेट क्षेत्र के किसी एक जमीदार ने गद्दारी करके गुलाबशाह बाबा के पीछे से गोली मार दी। बाबा शहीद हो गए। उस लड़ाई में आमेट की सेना की जीत हुई। आमेट ठिकाना और ठिकानेदार परिवार सहित सुरक्षित रहे। तब आमेट ठिकाने ने जहां गुलाबशाह बाबा शहीद हुए वहीं उनकी मिट्टी की मजार बना दी। फिर लगभग एक सदी तक आमेट ठिकाने की ओर से गुलाबशाह बाबा को फूल, अगरबती, कपूर, लोबान व चादर चढ़ाई जाती रही। ताकि, गुलाबशाह बाबा की शहादत की याद बनी रहे और उनकी शहादत को इज्जत दी जाती रहे।
आजादी के बाद भी क्षेत्रवासी उनकी मेवाड़ के लिए शहादत को याद करते आ रहे हैं। हर वर्ष सफर माह की 13 तारीख को गुलाबशाह बाबा का उर्स भरता है। आमेट के चुण्डावत ठिकानेदारों की यह खूबी रही कि उन्होंने अपने ठिकाने के राजकाज में कई मुस्लिम परिवारों को नवाजते हुए ओहदे दिए और उन्हें जागीरंे बख्शी। इनमें तोपची उस्ता, शोरगर, शहर कोतवाल, हाथी घोड़ांे के हकीम, चाबुक सवार और मुंशी कुनबे आदि शामिल हैं। 

jaydeep@ds.in

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