26 September, 2018

दांव पर योगी की साख

Yogi Adityanath, Loksabha By Poll, Uttar Pradesh
  • मोदी नहीं योगी की परीक्षा
  • कम वोटिंग से दिलचस्प हुआ सत्ता संग्राम 
  • बीते चुनाव के मुकाबले इस बार मतदान में 7.21 फीसद की गिरावट

गोरखपुर। चुनावी भाग्यविधाता यानी मतदाता द्वारा चुनाव के अंतिम दिन तक ओढ़ी गयी चुप्पी के बीच गोरखपुर संसदीय सीट पर उपचुनाव का परिणाम बुधवार को सामने आ जाएगा। मतदान के बाद अब अगले दो दिन आमजनमानस की परिणाम को लेकर कयासबाजी, बूथों पर पार्टियों द्वारा जुटाए गए अपने-अपने आंकड़ों के आगणन से अपनी जीत का तर्क गढ़ने में बीतेंगे। इस पूरे चुनाव में न कोई लहर थी और न ही कोई भावनात्मक मुद्दा। विधानसभा चुनाव 2017 में प्रभावी रही मोदी लहर दूर-दूर तक नहीं। अलबत्ता, यह पूरा चुनाव पांच दफे इस सीट का प्रतिनिधित्व करने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के असर की परीक्षा का चुनाव बनकर रह गया। परिणाम किसी के पक्ष में आए, मार्जिन किसी का घटे-बढ़े, बुधवार को वोटों की गिनती के साथ ही चुनावी परीक्षा में योगी के अपने प्रभाव का परसेंटेज तय होगा।गोरखपुर संसदीय सीट के उप चुनाव में केंद्रीय मुद्दा योगी आदित्यनाथ ही रहे।

भाजपा से यहां प्रचार में आए सभी नेताओं ने इस सीट को बड़ी चालाकी से योगी की प्रतिष्ठा से जोड़कर सारा दारोमदार उनके ही सिर पर डाल दिया। योगी आदित्यनाथ के लिए इस चुनाव का परिणाम कितना प्रतिष्ठापरक और चुनौतीपूर्ण है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने उपचुनाव में एक सीट पर करीब डेढ़ दर्जन चुनावी सभाएं कर डालीं। भाजपा को पुराने आंकड़ों के दम पर इस चुनाव में कोई चुनौती नजर नहीं आती लेकिन सपा-बसपा द्वारा की गयी घेराबंदी के बीच परिणाम यदि भाजपा के लिए आशातीत नहीं रहा तो पार्टी स्तर की बजाय सबसे बड़ा नुकसान योगी आदित्यनाथ को ही होगा।

भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी उपेंद्र दत्त शुक्ल ने भी हर जगह खुद को योगीजी के बगिया का माली बताकर योगी नाम के प्रभाव को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की तो वहीं भाजपा से यहां प्रचार में आए सभी नेताओं ने इस सीट को बड़ी चालाकी से योगी की प्रतिष्ठा से जोड़कर सारा दारोमदार उनके ही सिर पर डाल दिया। योगी आदित्यनाथ के लिए इस चुनाव का परिणाम कितना प्रतिष्ठापरक और चुनौतीपूर्ण है, इसे इस बात से समझा जा सकता है कि मुख्यमंत्री ने उपचुनाव में एक सीट पर करीब डेढ़ दर्जन चुनावी सभाएं कर डालीं। भाजपा को पुराने आंकड़ों के दम पर इस चुनाव में कोई चुनौती नजर नहीं आती लेकिन सपा-बसपा द्वारा की गयी घेराबंदी के बीच परिणाम यदि भाजपा के लिए आशातीत नहीं रहा तो पार्टी स्तर की बजाय सबसे बड़ा नुकसान योगी आदित्यनाथ को ही होगा। कारण, इस समय उनकी भूमिका बीजेपी में नेशनल लेवल पर पोस्टर ब्वाय की है और गैर हिंदी भाषी प्रांतों में भी उनकी प्रचार शैली की जबरदस्त डिमांड है।

कुल मिलाकर चुनाव परिणाम योगी आदित्यनाथ के असर और उस असर को कम करने में जुटे विपक्ष के समीकरणों का इम्तिहान है।विपक्ष के पास खोने को कुछ नहीं लोकसभा उप चुनाव में गोरखपुर सीट पर विपक्ष के पास खोने के लिए कुछ नहीं है। 1989 से इस सीट पर विपक्षी दलों को पराजय का ही सामना करना पड़ा है। 2014 के लोकसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ यहां पांचवीं बार जीते तो जीत का अंतर इतना अधिक रहा कि संयुक्त विपक्ष के वोट भी उनसे पीछे रह गये। हालांकि उप चुनाव में न तो मोदी लहर है और न ही योगी खुद चुनाव मैदान में हैं। बसपा ने चुनाव में भागीदारी की बजाय सपा को समर्थन दे दिया। उधर स्थानीय स्तर पर वोटों में कुछ हद तक हिस्सेदारी करने वाली निषाद पार्टी और पीस पार्टी को साथ लेकर ही सपा ने प्रत्याशी तय किया। ऐसे में समीकरणों के आधार पर विपक्ष की तरफ से भाजपा की धारदार घेराबंदी की गयी।

जातीय समीकरणों के आधार पर सपा-बसपा के नेता यह मानकर चल रहे हैं कि वह रणनीतिक घेरेबंदी से भाजपा की नकेल कस चुके हैं। इस दावे की असलियत परिणाम के साथ ही सामने आयेगी। कांग्रेस ने उप चुनाव में डा. सुरहीता चटर्जी करीम को प्रत्याशी बनाया लेकिन आखिरी दौर तक लड़ाई भाजपा बनाम सपा व उसे समर्थन करने वाले दलों तक सिमटी रही। सपा, बसपा, निषाद पार्टी और पीस पार्टी के लिए उपचुनाव एक प्रायोगिक प्लेटफार्म की तरह है। नतीजे उस 2019 के आम लोकसभा चुनाव में इन पार्टियों के गठबंधन का आधार भी तय करेंगे। सपा को जीत मिलती है तो आगामी आम चुनाव में गठबंधन की गुंजाइश अधिक होगी। 

तीन दशक तक गोरक्षपीठ के कब्जे में रही सदर लोकसभा सीट के लिए रविवार को उपचुनाव में वोटरों की उदासीनता से सत्ता संग्राम रोमांचक हो गया है। उपचुनाव में 47.45 प्रतिशत लोगों ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। पिछले लोकसभा चुनाव की तुलना में इस बार मतदान में 7.21 प्रतिशत की गिरावट हुई है। कम मतदान होने पर इस सीट पर जीत-हार को लेकर कयासबाजी जोर पकड़ने लगी है। यह माना जा रहा है कि बीस बरस बाद यहां लोगों को एक बार फिर भाजपा व सपा के बीच नजदीकी मुकाबला देखने को मिल सकता है। गोरखपुर सदर सीट पर 1989 से गोरक्षपीठ का कब्जा चला आ रहा है।

2014 के चुनाव में योगी आदित्यनाथ ने 3,12 लाख के अंतर से चुनाव जीता था। हालांकि, मुख्यमंत्री बनने के कारण उन्हें इस सीट को छोड़ना पड़ा। योगी के इस्तीफे के बाद इस सीट के लिए रविवार को उपचुनाव हुआ। पिछले विधानसभा चुनाव में सदर सीट पर जबरदस्त बढ़त को देखते हुए भाजपा के रणनीतिकारों ने शहरी क्षेत्र में अपनी सक्रियता बढ़ायी थी। लेकिन सदर सीट पर इस बार के मतदान प्रतिशत ने भाजपा की बेचैनी बढ़ा डाली है। सदर सीट पर पिछले बार की तुलना में इस दफा 11.43 प्रतिशत कम वोट पड़ा है।

हालाकि बीते लोस चुनाव की तुलना में सभी पांचों सीटों पर मतदान प्रतिशत में गिरावट आयी है। उधर कम मतदान होने के बाद अब चौक-चौराहों पर जीत-हार की अटकलें लगनी शुरू हो गयी हैं। हालांकि, कम मतदान के बावजूद जीत का सेहरा किसके सिर माथे बंधेगा जनता जनार्दन का फैसला 14 मार्च को सामने आएगा। 

rgautamlko@gmail.com

Review overview
NO COMMENTS

POST A COMMENT