11 December, 2018

सिद्घू की राष्ट्र विरोध कब तक सहेगा भारत

सुरेश गांधी 
फिरहाल, पंजाब के कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता नवजोत ङ्क्षसह सिद्घू के पाकिस्तान जाने का विवाद अभी थमा भी नहीं है कि पाकिस्तान में खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला, जो भारत की तबाही के लिए कुछ भी कर गुजरने पर आमादा है, के साथ उनकी तस्वीर नए विवादों को जन्म दे दिया हैं। इसके पीछे सिद्घू की क्या चाहते है ये तो वहीं जाने लेकिन इतना तो साफ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से हटाने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। दरअसल, करतारपुर करिडोर के शिलान्यास कार्यक्रम में आतंकी हाफिज सईद का सहयोगी और खालिस्तान समर्थक गोपाल चावला भी दिखा था, उसी के साथ नवजोत ङ्क्षसह सिद्घू की फोटो ने नये विवाद को जन्म दे दिया है। गोपाल चावला का लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए- मोहम्मद के आतंकियों से भी करीबी रिश्ता है। इसके बावजूद कभी बेजवा तो कभी चावला से सिद्घू का हाथ मिलाना सवालों के घेरे में तो है ही। क्योंकि पाकिस्तान आतंकवादियों की संरक्षण स्थली है। यह अलग बात है कि सिद्घू के ही पंजाब मुखिया कैप्टन अमङ्क्षरदर ङ्क्षसह ने पाक जाने से उन्हें इसलिए मना किया कि पाकिस्तान भारत विरोधी और पंजाब विरोधी गतिविाियों का समर्थन करता है। वो भी उस गोपाल चावला के साथ तस्वीर ङ्क्षखचवाई, जो हाफिज सईद का करीबी सहयोगी है और भारतविरोधी व्यक्ति है।
जहां तक करतारपुर का सवाल है तो इसके लिए कांग्रेस सरकार ही दोषी है। अगर अपने कार्यकाल के दौरान सरहद से महज 4 किमी की दूरी पर बसे गांव को ले लिया हेता तो आज देश को नानक जी की जन्मस्थली पर पहुंचने के लिए पाकिस्तान जाने का काम नहीं करना पड़ता। हो जो भी सच तो यही है कि नवजोत ङ्क्षसह सिद्घू की हरकतें साफ करती हैं कि वह पाकिस्तान के एजेंट हैं। पहले वह पाकिस्तान के दौरे पर गए तो वहां के उस आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा से गले मिले जो हमारे लोगों की जान ले रहा है। हद तो यह हो गई है कि वहां एक आतंकी के साथ उनकी फोटो सामने आ रही है। चावला ने खुद सिद्घू के साथ मुलाकात की तस्वीर अपने फेसबुक पेज पर शेयर किया है। इस तस्वीर को शेयर करते हुए गोपाल चावला ने सिद्घू को पाजी कहकर संबोधित किया है। पंजाबी में पाजी का मतलब बड़ा भाई होता है। जवाब में सिद्घू कहते है वे राहुल गांधी और अहमद पटेल से पूछकर पाकिस्तान गए थे। हालांकि गुरुद्वारा साहिब में मत्था टेकना हरेक सिख के जीवन में विशेष महत्व रखता है। गुरू नानक ने ना केवल अपने जीवन के 18 साल यहां व्यतीत किया बल्कि यह उनकी आरामगाह भी था। कहा कि सकता है करतारपुर गलियारा उम्मीद और सद्भभावना पर आधारित है लेकिन जमीनी वास्तविकताओं के प्रति सचेत रहने की जरुरत है। करतारपुर साहिब पाकिस्तान में रावी नदी के पार स्थित है और डेरा बाबा नानक से करीब चार किमी दूर है। सिख गुरु ने 1522 में इस गुरुद्वारे की स्थापना की थी। करतारपुर गलियारे से भारतीय सिख श्रद्घालु करतारपुर में स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब तक वीजा रहित यात्रा कर सकेंगे। इस गलियारे के छह महीने के भीतर बनकर तैयार होने की उम्मीद है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि दोनों देशों के बीच कुई मुद्दे हैं। दोनों देशों के बीच में सात दशकों की कांटेदार सरहद है।
माना कि इस पहल से न सिर्फ इन दो पवित्र स्थानों के बीच आवाजाही आसान होगी, बल्कि यह कवायद कूटनीतिक और सामरिक तनातनी से निजात पाने के सिलसिले की शुरुआत भी हो सकती है। चूंकि दोनों देशों को बांटनेवाली सरहद बहुत बाद में बनी है और उससे पहले सदियों से दोनों तरफ बस्तियों और आबादियों का अपनापा रहा था, तो ऐसी कोशिशों की दरकार समूची भारत-पाकिस्तान सीमा पर है। दोनों तरफ से यह बात कही जाती रही है कि बीते दौर की कड़वाहट और रंजिशों को भुलाकर नये सिरे से रिश्तों की तामीर होनी चाहिए। इससे शायद ही किसी को एतराज हो। लेकिन, अगर आतंकवाद, अलगाववाद और घुसपैठ की घटनाएं जारी रहती हैं, तो फिर बीते दौर और मौजूदा वक्त में फर्क कैसे किया जा सकता है? करतारपुर गलियारा खोलने के साथ भारत कई ऐसी मांगों पर जोर देता रहा है, जिनसे दोनों देशों के लोग और कारोबारी एक-दूसरे के नजदीक आ सकें। इस बाबत कई फैसले भी हुए। श्रीनगर-मुजफ्फराबाद रास्ता खुला, दिल्ली-लाहौर बस चली, समझौता एक्सप्रेस की रवानगी हुई, सामानों की आवाजाही के लिए कायदे नरम हुए, वीजा देने की प्रक्रिया में ढील दी गयी आदि। लेकिन, इसी दौरान कभी संसद पर हमला हुआ, कभी मुंबई को निशाना बनाया गया, कभी जहाज अपहरण किये गये, घुसपैठ जारी रही, आतंकियों को पैसा, हथियार और प्रशिक्षण दिया जाता रहा तथा भारत को तबाह करने की ामकियां दी गय। इतना ही नह, हाफिज सईद, मसूद अजहर, जकीउर रहमान लखवी जैसे आतंकी सरगनाओं को पाकिस्तानी हुक्मरान सर-आंखों पर बिठाये रहे। कश्मीर के बड़े हिस्से पर पाकिस्तान का अवैा कब्जा तो है ही, जम्मू-कश्मीर को बर्बाद करने में भी पाकिस्तान ने कोई कसर नह छोड़ी है। यह सब बदस्तूर जारी है।
मतलब साफ है अगर इमरान खां का इरादा वाकई पाक साफ है तो उन्हें कम से कम ऐसे पवित्र मौके पर कश्मीर का पुराना पाकिस्तानी राग अलापने से बचना चाहिए था। उन्हें बताने की कोई जरुरत नहीं थी कि पाकिस्तान के लिए सिर्फ कश्मीर एकमात्र मसला है। जबकि भारत के लिए उससे बड़ा मसला आतंकवाद है। भारत जिस आतंकवाद से जूझ रहा है उसके कर्ताधर्ता पाक की जमीन पर न सिर्फ उग रहे है बल्कि दिन दूनी रात चौगुनी पल-बढ़ रहे है। पाकिस्तान में चाहे सेना का शासन हो या लोकतांत्रिक सरकार रही हो, आतंकवाद और अलगाववाद उसकी विदेश और रक्षा नीति का अहम हिस्सा रहा है। इसलिए इमरान की दोस्ती के पैगाम को शक की निगाह से ही देखा जायेगा। क्योंकि कश्मीर का मुद्दा उछालना और आतंकवाद का कोई जिक्र नहीं करना उनकी सबसे बड़ी कमजोरी उजागर करने वाला है। ऐसे ही कमजोरी पाकिस्तान के हरेक पीएम ने दिखाई हैं। ऐसे में भारत को नसीहत देने से पहले आने देश में मौजूद शांति के शत्रुओं से भिडऩे का जोखिम इमरान उठा पायेंगे, जिन्होंने सत्ता के लिए न सिर्फ कट्टरपंथियों से हाथ मिलाया बल्कि सेना का आर्शीवाद लेने के लिए रणनीतिक कौशल दिखाया। जबकि पाक राजनीति में दोनों की ही मजबूती भारत के खिलाफ नफरत की राजनीति पर टिकी है। पाकिस्तानी प्राानमंत्री इमरान खान की यह बात  सही है कि दक्षिण एशिया में गरीबी, बीमारी और पिछड़ेपन जैसे मसले बेहद संगीन हैं तथा भारत-पाकिस्तान हाथ मिला लें, तो इनका हल बहुत मुश्किल काम नह होगा, परंतु इसके लिए भरोसे का माहौल बनाने की कोशिशें भी जरूरी हैं। दोनों देश सरहद को कारोबार के लिए ाीरे-ाीरे खोलते जाएं और पाकिस्तान आतंक पर नकेल लगाने का काम शुरू कर दे। इतनी कदमताल के बाद खुली बातचीत का मौका तो बन ही जायेगा। खून-खराबे और नफरत ने दोनों देशों का बहुत नुकसान किया है। इसकी भरपाई और आने वाले दिनों की बेहतरी अमन, कारोबार और आवाजाही के रास्तों से ही संभव है। क्योंकि इमरान जब तक ऐसा जोखिम नहीं लेंगे भारत उन पर कभी भरोसा नहीं कर सकेगा। इमरान को अगर जीत का सिलसिला आगे जारी रखना है तो यह जोखिम उठाना होगा, नही ंतो शांति की पिच पर बोल्ड होना महज कुछ समय की ही बात होगी।
लेकिन दाऊद जैसे मसले को वे हम अतीत में नह जी सकते। हमें अतीत को पीछे छोडऩा होगा और आगे देखना होगा कहकर टाल देते हैं। उन्होंने मुंबई हमले के गुनहगारों को सजा देने पर कहा, हाफिज सईद पर संयुक्त राष्ट्र ने प्रतिबंा लगा रखा है। जमात-उद-दावा प्रमुख पर पहले से ही शिकंजा कसा हुआ है। जमात-उद-दावा को जून, 2014 में अमेरिका ने एक विदेशी आतंकवादी संगठन घोषित किया था। सईद लश्कर-ए-तैयबा का सह संस्थापक है जो मुम्बई में 26 नवंबर 2008 को हुए हमले के लिए जिम्मेदार है। इन हमलों में 166 लोगों की मौत हुई थी। मुंबई हमलों के बाद सईद को नजरबंद किया गया था लेकिन 2009 में अदालत ने उसे रिहा कर दिया था। भारत, पाकिस्तान से 2008 के मुंबई हमलों के साजिशकर्ताओं को दंडित किए जाने की मांग करता रहा है। यह अलग बात है पूछे जाने पर इमरान खान कहते है ”देश के बाहर आतंकवाद फैलाने के लिए पाकिस्तान की जमीन का इस्तेमाल करने की इजाजत देना हमारे हित में नह है।

 

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