23 March, 2019

खटास मिटा ढाई दशक बाद एक मंच पर

  • सपा-बसपा  2014 के लोकसभा चुनाव में बसपा का खाता भी नहीं खुला था
  • 2009 के लोकसभा के चुनाव में राज्य की 20 सीटें जीती थीं।

लखनऊ। एसएनबीभले ही बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल हो मगर यूपी की राजनीति में आज यह पार्टी हाशिए पर है। विधानसभा में बसपा तीसरे पायदान पर है तो मौजूदा लोकसभा में उसकी संख्या नगण्य है। शायद यही वजह है कि 17वीं लोकसभा चुनाव में बसपा नेतृत्व समाजवादी पार्टी (सपा) से गठबंधन को बाध्य हुई है। इसके लिए बसपा अध्यक्ष मायावती ने सपा से चल रही ढाई दशक पुरानी ‘‘रंजिश’ को भी भुला दिया।85 बनाम 15 के फामरूले यानी सर्वणों के मुकाबले दलित, अति पिछड़ों को जोड़ने के लिए बसपा संस्थापक कांशीराम ने 1984 में इस पार्टी का गठन किया था। वे खुद 1985 में मध्य प्रदेश की होशंगाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़े मगर पराजित हुए। वहां से चला बसपा का कारवां कांशीराम बढ़ाकर 1993 में यूपी विधानसभा के चुनाव में सपा के तत्कालीन अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव से गठबंधन कर 67 विधायकों की संख्या पर पहुंचाया। बसपा और सपा के इस गठबंधन ने यूपी में 4 दिसम्बर 1993 को सरकार बनायी।

कांग्रेस ने इसे बाहर से समर्थन दिया। हालांकि 18 महीने चली इस सरकार में 2 जून 1995 को ऐसी घटना हुई, जिसने बसपा-सपा में दूरियां बना दीं। इस प्रकरण ने बसपा अध्यक्ष मायावती को सपा नेतृत्व के प्रति बेहद उद्वेलित कर दिया। मगर बसपा-सपा गठबंधन टूटा तो भाजपा ने मायावती को समर्थन देकर यूपी में 3 जून 1995 को बसपा की सरकार बनवा दी। इस सरकार की मुख्यमंत्री बनी मायावती। मायावती ने उसके बाद गठबंधन और अकेले मिलकर राज्य में लगातार चार बार मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली। साल 2007 में तो मायावती ने टिकटों के बंटवारे में ऐसा जातीय समीकरण बनाया कि उन्हें पूर्ण बहुमत हासिल हुआ। हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव में मायावती की पार्टी को महज 80 सीटों पर संतोष करना पड़ा और बसपा सत्ताच्युत हो गई। बसपा के हाथ से फिसली सरकार 2012 में समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के हाथ में आयी। इसके बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में बसपा ने सभी 78 सीटों पर चुनाव लड़ा मगर उनका एक भी प्रत्याशी नहीं जीता। बसपा को यह राजनीतिक तौर पर बड़ा झटका लगा।

बेशक बसपा के 34 प्रत्याशी दूसरे स्थान पर रहे। मगर इस चुनाव में बसपा को 19.60 प्रतिशत वोट हासिल हुए। जो उसे 2009 के लोकसभा चुनाव में मिले वोटों से 7.82 फीसद कम थे। बसपा ने साल 2009 के लोकसभा के चुनाव में राज्य की 20 सीटें जीती थीं।लोकसभा 2014 के चुनाव में मिले झटके से बसपा नेतृत्व उबर भी नहीं पाया था कि करीब ढाई साल बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में पार्टी कुछ अच्छा नहीं कर सकी बसपा के महज 19 प्रत्याशी ही विजयी हो सके। विधानसभा के इन चुनाव नतीजों ने बसपा नेतृत्व को राजनीतिक तौर पर बड़ा झटका दिया। ऐसे में बसपा राज्य में राजनीतिक हाशिए पर पहुंच गई। उधर भाजपा केन्द्र की सत्ता के साथ ही यूपी में भी पूर्ण बहुमत हासिल कर ज्यादा ताकतवर बनकर खड़ी हो गयी। मगर लोकसभा के दो उपचुनाव में सपा द्वारा भाजपा को परास्त किए जाने की घटना ने बसपा और सपा के बीच दूरियां कम करने में अहम भूमिका निभाई। इसकी पहल सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मायावती के घर जाकर की। इस मुलाकात ने भाजपा के खिलाफ गठबंधन की नीव रखी। दोनों ही पार्टियों ने बीते लोकसभा चुनाव में मिले वोटों का समीकरण देखा। सपा को इस चुनाव में 22.20 फीसद तो बसपा को 19.60 प्रतिशत वोट मिले जिनका जोड़ 41.80 प्रतिशत होता है। फिर दोनों ही दलों के नेताओं ने देखा गठबंधन बनने से भाजपा के खिलाफ आगामी लोकसभा चुनाव में मुस्लिम, दलित और पिछड़ों की ताकत से मुकाबला आसान हो सकेगा। गठबंधन में जाट वोटों को जोड़ने के लिए रालोद को भी शामिल किया गया है। अब यह भविष्य के गर्त में है कि यह गठबंधन चुनाव में मोदी फैक्टर को भेदने में कितनी सफलता पा सकेगा।

rgautamlko@gmail.com

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