नारी उत्थान के मसीहा थे बाबा साहब

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बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर के विचारों को सम्पूर्ण रूप में व्यक्त कर पाना इनता आसान प्रतीत नहीं है,  क्योंकि आज सम्पूर्ण विश्व उनके सामने अपने आप को छोटा महसूस कर रहा है। बाबा साहेब की विद्ववता को चुनौती देने का साहस आज किसी में दिखाई नहीं देता है। यहां यह भी माना जा सकता है कि एक विद्वान हमेशा दूसरे विद्वान का सम्मान करता है। विश्व के तमाम विद्वान बाबा साहेब का सम्मान करने को आतुर दिखाई दे रहे हैं। देश की नारी हितों की समस्याओं के समाधान के लिए उनके द्वारा किए गए प्रयास और संघर्ष किसी से छिपा नहीं है। आधुनिक भारत में नारी आज जिस अधिकार का उपभोग कर रही है या जो भी आजादी उसे मिली हुई है। वह सभी अधिकार बाबा साहेब की ही देन है। इस बात को बाबा साहेब के ही कथन से समझा जा सकता है। वह समाज में नारी और पुरूष की समान रूप से सहभागिता को अनिवार्य मानते थे। उनका कथन था कि किसी भी समाज की उन्नति का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उस समाज की महिलाओं की प्रगति कितनी हुई है।
नारी की उन्नति के बिना समाज एवं राष्ट्र की उन्नति असम्भव है। यह कथन बाबा साहेब के नारी समानता के विचार की अभिव्यक्ति को दर्शाता है। इसके साथ ही वह लोकतंत्र में विश्वास रखते थे, क्योंकि समानता लोकतंत्र की पहली शर्त है। बाबा साहेब बिना किसी विभेद के समानता के पक्षधर थे। भारत मेें आजादी से पहले नारियों की बहुत ही खराब थी। वह बहुत सारे सामाजिक बन्धनों में बंधी हुई थी और उसे वर्तमान समय के अनुसार किसी भी प्रकार की आजादी नहीं थी। इस प्रकार की स्थिति से उनको निकालने के लिए बाबा साहेब से भी पूर्व बहुत से महापुरूषों ने काम किया। किन्तु उनका परिणाम उतनाअच्छा नहीं मिल पाया, जितना बाबा साहेब के द्वारा किए गए प्रयासों से हासिल हो सका। भारतीय समाज में बहुत सी कुरीतियों का सामना नारियों को चुपचाप करना पड़ता था। जो कभी धर्म के नाम पर, तो कभी रूढिय़ों एवं परम्पराओं के नाम पर मानने को मजबूर किया जाता था। ऐसा भी नहीं है कि प्राचीन भारत की नारियों ने इसका विरोध नहीं किया, किन्तु उनकी संख्या बहुत ही नगण्य थी। भारत में सामाजिक सुधारों का एक लम्बा दौर भी दिखाई देता है, जिसने नारी उत्थान में अपना सहयोग प्रदान किया। भारत में सामाजिक सुधार का आन्दोलन 1870 के दशक में ही प्रारम्भ हो गया था। इस समय आन्दोलन के दो गुट दिखाई देते हैं।
एक गुट ब्राह्मïण समाज सुधारकों का था तो, दूसरा गुट गैर ब्राह्मïण समाज सुधारकों का था। इसी सुधार क्रम में बहुत से गैर ब्राह्मïण समाज सुधारकों ने समाज में व्याप्त कुरीतियों को खत्म करने का काम किया, उन सभी समाज सुधारकों में महात्मा ज्योतिब फुले, पेरियार साहेब के अलावा और भी अनेकों समाज सुधारक शामिल थे। इन्हीं सुधारकों में बाबा साहेब भी एक महान सुधारक के रूप में दिखाई देते हैं। बाबा साहेब हमेशा हर वर्ग की नारी के उत्थान के बारे में सोचा करते थे, उन्होंने कभी भी नारी के अस्तित्व को लेकर कोई भेदभाव नहीं किया। उनकी सोच नारी के प्रति एक समान भाव की थी अर्थात वह सभी नारियों को समान समझते थे। उनकी नजर में नारी का अस्तित्व जाति तथा धर्म के बन्धन से परे था, वह जानते थे कि प्रत्येक वर्ग की नारी की दशा एक समान है। इसलिए उनका मानना था कि भारतीय समाज में समस्त स्िित्रयों की उन्नति, शिक्षा और संगठन के बिना, समाज का सांस्कृतिक तथा आर्थिक उत्थान अधूरा है। बाबा साहेब भारतीय नारियों की इस दयनीय स्थिति का कारण हिन्दू धर्म को मानते थे। इस बात को उन्होंने अपने प्रसिद्घ निबन्ध ह्म्दिू नारी का उत्थान एवं पतन में व्यक्त किया है। जिसमें उन्होंने हिन्दू धर्म को ही इन समस्याओं का एक विोष कारण बताया है। भारतीय नारियों की समस्याओं का समाधान करने के लिए बाबा साहेब ने शिक्षा को एक बहुत बड़ा हथियार बताया था। नारी शिक्षा की महत्ता पर जोर देते हुए बाबा साहेब कहा था कि यदि हम लड़कों के साथ-साथ लड़कियों की शिक्षा की ओर ध्यान देने लगेंगे, तो हम अतिशीघ्र प्रगति कर सकते हैं। ािक्षा किसी वर्ग की बपौती नहीं है। उस पर किसी एक ही वर्ग का अधिकार नहीं है। नारी शिाक्षा पुरूष से भी अधिक महत्वपूर्ण है। चूॅकि पूरी पारिवारिक व्यवस्था की धुरी ही नारी है, इसलिए उसे नकारा नहीं जाना चाहिए। इस प्रकार यह समझा जा सकता है कि बाबा साहेब नारी समानता और उनकी इस दयनीय स्थिति को लेकर बहुत ज्यादा चिन्तित थे और इसका समाधान करने का निरन्तर प्रयास कर रहे थे, किन्तु समाज में व्याप्त सदियों से चली आ रही तथाकथित परम्परा के नाम पर किया जाने वाला अत्याचार को समाप्त कर पाना उतना आसान नहीं था।
भारत की स्वतंत्रता मिलने के बाद कुछ उम्मीद की किरण दिखाई दी और वह किरण भारतीय संविधान के निर्माण के लिए बनाई गई। मसौदा समिति का उन्हें अध्यक्ष चुना जाना था। उन्होंने भारतीय संविधान में नारी को ध्यान में रखकर बहुत से ऐसे प्रावधान किए, जिससे उनकी समस्याओं का समाधान किया जा सके। भारतीय संविधान में नारी समानता एवं स्वतंत्रता के लिए जो बातें शामिल की गई, उनमेंसे कुछ प्रावधानों को संविधान के विभिन्न अनुच्छेदो में देखा जा सकता है। जिसमें अनुच्छेद 15-जो किसी भी प्रकार के धर्म, वंा, लिंग, वर्ग अथवा जाति के आधार पर भेदभाव को गैरकानूनी मानता है। अनुच्छेद 16-सार्वजनिक सेवा में किसी भी प्रकार के भेदभाव को निषिध करता है, इसमें लिंग को आधार मानना बाबा साहेब की नारी समानता को व्यक्त करता है। अनुच्छेद 39-समान काम का समान वेतन, अनुच्छेद 42-मातृत्व अवकाा, अनुच्छेद 51-ऐसी सभी प्रथाएं, जो नारी के सम्मान के विरूद्घ हो उसे त्यागने की बात करता है। इन सबके साथ ही सबसे महत्वपूर्ण प्रावधान अनुच्छेद 325 एवं 326, जो नारी के लिए राजनीतिक समानता की व्यवस्था करता है, जिसमें उसे पुरूष के समान मत देने और चुने जाने का अधिकार शामिल है। इन सभी प्रावधानों का भारतीय संविधान में शामिल किया जाना बाबा साहेब की सोच का ही परिणाम थी। भारतीय संविधान में किए गए यह सारे प्रावधानों को बाबा साहेब ने एक बिल के रूप में 11 अप्रैल, 1947 को संविधान सभा के सामने पेा किया था जिसे हिन्दू कोड बिल के नाम से भी जाना जाता है।
भारतीय महिलाओं की सभी समस्याओं का समाधान इस बिल में किया गया था। यहॉ यह जिक्र किया जाना सही प्रतीत होता है कि आजादी से पहले पुरूष एवं नारी को तालाक का अधिकार नहीं था। पुरूष एक से ज्यादा शादी कर सकता था। किन्तु विधवाएं दूबारा शादी नहीं कर सकती थी और ना ही उन्हें सम्पत्ति में कोई अधिकार था। इन बातों से भारतीय समाज की उस व्यवस्था का पता चलता है, जिसमें भारतीय महिलाएं अपनी जिदंगी जीने को मजबूर थी। इस प्रकार की सभी कुरीतियों का समाधान इस बिल में किया गया था। बाबा साहेब ने पूरी ताकत से एवं तर्कपूर्ण तरिके से अपनी बात संविधान सभा के सामने रखने का काम किया किन्तु भारतीय समाज का एक बड़ा तबका उसे पारित कराने के विरोध में खड़ाथा और सभी प्रकार के साधनों का प्रयोग कर रहा था कि बिल ना पास हो सके। बाबा साहेब का प्रयास बेअसर हुआ और यह बिल 9 अप्रैल, 1948 को सेलेक्ट कमिटि के पास भेज दिया गया। बाद में भारतीय संविधान के लागू होने के बाद 1951 में बाबा साहेब ने पुन: इस बिल को संसद में लाने का काम किया। बिल ने संसद के अन्दर एवं बाहर एक विद्रोह सा पैदा कर दिया। इस दौरान ऐसा प्रतीत हो रहा था कि बाबा साहेब सम्पूर्ण भारत में महिलाओं के लिए लडऩे वाले एकमात्र व्यक्ति थे और सम्पूर्ण देश उनके खिलाफ था। इस बिल पर बाबा साहेब की चिन्ता उन्हीं के शब्दों में कहे तो, वह कहते थे मुझे भारतीय संविधान के निर्माण से अधिक दिलचस्पी और खुशी, हिन्दू कोड बिल को पास कराने में हैं। किन्तु यह बिल पास नहीं हो पाया, जिस कारण से बाबा साहेब ने कानून मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। इस बिल में शामिल विधानों का संक्षेप में जिक्र किया जाना सार्थक प्रतीत हो रहा है। इसमें जो प्रावधान शामिल किए गए थे। उसमें-हिन्दू विवाह, विशेष विवाह, गोद लेना, हिन्दू उत्तराधिकार, निर्बल तथा साधनहीन परिवार का भरण-पोषण, अप्राप्तवय संरक्षण, विधवा पुनर्विवाह इत्यादि प्रावधान थे। बाद में इसी बिल के प्रावधानों को भारतीय संसद ने अलग-अलग हिस्सों में पारित करने का काम किया। भारत की महिलाओं के उत्थान के लिए यह कितना जरूरी था, यह समझ पाना आसान नहीं है किन्तु इतना कहां जा सकता है कि भारत की महिलाओं के प्रति बाबा साहेब की सोच की बराबरी करने वाला कोई भी व्यक्ति नहीं था। यदि यह बिल संसद ने पारित कर दिया होता तो, देा की आधी आबादी का सहयोग दो को मिलता और दोकी तस्वीर कुछ और होती। वर्तमान समय तक अगर देख जाए तो ह्म्दिू कोड बिल में वर्णित प्रावधानों पर विभिन्न सरकारों के द्वारा ध्यान दिया भी गया है और उन्होंने कही न कही उन प्रावधानों को कानून का रूप देने का काम किया है। इससे यह माना जा सकता है कि बाबा साहेब डॉ. भीम राव अम्बेडकर की सोच अपने समय से बहुत आगे की थी और यह उन्हें एक दूरदृष्टा के रूप भारत के सामने उपस्थित कर रही है।

 

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