23 March, 2019

राजनीति की पाठशाला बन गया वाणिज्य कर विभाग

  • अपर मुख्य सचिव के आश्वासन पर वापस हो चुके आन्दोलन को फिर से गरमाने की कोशिश
  • अधिकारी संघ के आन्दोलन पर खड़े किये पूर्व अध्यक्ष ने सवाल

लखनऊ। प्रदेश सरकार का वाणिज्य कर विभाग जिसका मूल कार्य कर संग्राह का है, वो अब राजनीति की पाठशाला के रूप में विकसित होता नजर आ रहा है। संघ का सत्ता पक्ष हो या विपक्ष एक दूसरे को मुद्दों पर घेरने का कोई मौका नहीं छोड़ा जा रहा है। पूर्व कमिश्नर कामिनी चौहान रतन के कार्यकाल में 38 ज्वाइंट व 5 डिप्टी कमिश्नरों को दंडित किये जाने के बाद विभाग में छाये आन्दोलन के काले बादल जो कि कमिश्नर के तबादले के बाद छट चुके हैं। उस पर संघ के एक पूर्व अध्यक्ष ने सवाल खड़े करके एक बार फिर शांत नदी में विछोप उत्पन्न कर दिया है। विभाग के अधिकारियों के वाट्सएप ग्रुप पर उन्होंने यक्ष प्रश्न किया है कि आन्दोलन किसके खिलाफ था, पूर्व कमिश्नर के खिलाफ या फिर अधिकारियों के दंड के खिलाफ क्योंकि अधिकारियों का दंड समाप्त हुए बिना ही आन्दोलन किन कारणों से टाला गया क्योंकि पूर्व कमिश्नर भी अधिकारियों को कार्य में सुधार किये जाने का समय दे चुकी थीं तो उस समय आन्दोलन क्यों नही डाला गया। पूर्व अध्यक्ष के इस सवाल ने विभाग में एक बार फिर र्चचाओं का दौर गरम हो गया है।

पूर्व अध्यक्ष का विभाग के शांत महौल में ऐसा सवाल उठाना शयाद इसलिए भी जरूरी हो गया है, क्योंकि लम्बे समय से संघ की राजनीति का वनवास काटने के दौरान ये मुद्दा शायद अध्यक्ष पद की कुर्सी तक पहुंचने के लिए सीड़ी का काम कर सकता है। वहीं वर्तमान में तैनात सेवासंघ के अध्यक्ष अपने प्रतिनिधि मंडल के साथ अपरमुख्य सचिव कर एंव निबन्धन से मिल चुके हैं और उनके आश्वासन के बाद आन्दोलन न किये जाने के निर्णय से अपने सदस्यों को अवगत भी करा चुके हैं। वहीं वे अपने सदस्यों को यह भी अहसास करा रहे है कि उनके नेतृत्व में सदस्यों के अधिकार सुरक्षित हैं, अब चूकि विभाग में नयी कमिश्नर आ चुकी हैं तो उनके आते ही आन्दोलन करना शिष्टाचार नहीं है।ऑन-लाइन व मैनुअल रिकार्ड के डाटा में अन्तर पाए जाने पर पूर्व कमिश्नर कामिनी चौहान रतन ने विभाग के 38 ज्वाइंट व 5 डिप्टी कमिश्नरों को बिना पूर्व नोटिस के ही विशेष प्रतिकूल प्रविष्ट देकर दंडित कर दिया था। इसके बाद विभाग में जो घमासान मचा वे उनके तबादले के बाद ही शांत हुआ। सेवासंघ के अध्यक्ष राजवर्धन सिंह जो कि चुनाव के बाद से ही शांत थे और कमिश्नर द्वारा कई नोटिस दिए जाने के बाद भी संघ की शक्ति का प्रयोग नहीं करना चाहते थे, इसे उनके सदस्यों ने कमजोरी मान लिया। विभाग में जब बड़ी संख्या में अधिकारी दंडित हो गये तो सदस्यों ने उनके मनोबल पर ही सवाल खड़े कर दिये।

इसके बाद उन्होंने आन्दोलन का गांडिव उठाते हुए 22 जनवरी से प्रदेश व्यापी आन्दोलन करने का शंखनाद कर दिया। विभाग में जब आन्दोलन की रणधेरी बजने लगी तो प्रोन्नत संघ के अध्यक्ष सुनील वर्मा जो की शायद ये तो मान रहे थे, कि अधिकारियों को गलत तरीके से दंडित किया गया है,लेकिन आन्दोलन को समर्थन देने के लिए तैयार नहीं हुए क्योंकि उन्हें भी अपनी राजनीतिक महत्व को प्रदर्शित करना था। जब विभाग में घमासान मचा तो उन्होंने अपनी राजनीति की जमीन मजबूत करने के लिए विवाद के समाधान के लिए कई फारमूले पेश कर दिये। इसी-बीच पूर्व अध्यक्ष जो कि लम्बे समय से विभाग की राजनीति से दूर है, उन्हें सुनहरा भविष्य दिखा तो वे आन्दोलन के विरोध में बयान बाजी करने लगे। इसी-बीच आन्दोलन के ठीक दो दिन पहले कमिश्नर का तबादला हो गया। बताया जाता है कि प्रदेश के मुख्यमंत्री जो कि विभाग के मंत्री भी हैं, उन्होंने समाचार पत्रों की सुर्खियां बन चुके आन्दोलन के समाचारों का संज्ञान लेते हुए ये कदम उठाया। इसके बाद नयी कमिश्नर के आने के बाद सेवासंघ ने अपना आन्दोलन स्थगित कर दिया, हालाकि अधिकारियों का दंड अभी भी बना हुआ है। इसके पीछे सेवासंघ का तर्क ये है कि नए विभागाध्यक्ष के आते ही उन्हें आन्दोलन का सामना करना पड़े ये ठीक नहीं है। इसके बाद से विभाग की हलचल समाप्त हो गयी तो विपक्ष के नेता के अन्दाज में पूर्व अध्यक्ष ने सवाल खड़ा करके र्चचाओं का दौर एक बार गर्म कर ही दिया है। अधिकारी तो अधिकारी कर्मचारी संघ भी किसी से कम नहीं हैं। अभी चार दिन पूर्व गाजियाबाद में ज्वाइंट कमिश्नर के खिलाफ शुरू हुए कर्मचारियों के आन्दोलन में प्रान्तीय कार्यकारिणी ने सेवासंघ से आन्दोलन का समर्थन वापस लिए जाने तक की धमकी दे डाली। इन सभी घटनाक्रमों को देखकर अगर ये कहा जाए कि विभाग के संघ राजनीति की पाठशाला बन गये हैं तो गलत नहीं होगा।

rgautamlko@gmail.com

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