27 May, 2018

गले की फांस बन रहा है दलितों के साथ सहभोज का कार्यक्रम

शिशुपाल सिंह

लखनऊ। दलित वोटों को समेटने की कवायद में जुटी भाजपा का एक मुख्य एजेंडा दलितों के घर भोजन करने का है। अमित शाह से ले कर यूपी के मंत्री और नेता तक दलितों के घर भोजन करने जा रहे हैं और यह बताने की कोशिश भी चल रही है कि भाजपा दलितों के प्रति समरसता की पक्षधर है, लेकिन इन आयोजनों में आये दिन होने वाले विवादों से भाजपा की छवि प्रभावित हो रही है।

यूपी के गन्ना मंत्री सुरेश राणा के दलित सहभोज कार्यक्रम से भी एक विवाद जुड़ गया। भाजपा के दलितों के घर रात्रि प्रवास अभियान के तहत सुरेश राणा एक गांव लोहगढ़ में पहुंचे तो वहां एक कैटर के जरिये खाना और मिनिरल वाटर की व्यवस्था करवाई गयी थी। इसकी खबर बाहर आते ही विवाद हो गया, हलाकि मंत्री महोदय ने रात की अपनी इस भूल को तड़के ही सुधार लिया और सुबह-सुबह दूसरे दलित सुनपति सिंह के घर चाय बनवाकर पी, इसके बाद गांव से निकल गए।
दलित वोट बैंक को साधने की कवायद में जुटी भाजपा ने अपने स्थापना दिवस 6 अप्रैल से कार्यक्रमों की सीरीज की शुरुआत की। इससे पहले साल 2016 पार्टी ने अपनी निगाह जब यूपी के मिशन 2017 पाकर लगायी थी तब भी दलित भोज का आयोजन किया गया था। मोहनलाल गंज से बीजेपी के सांसद कौशल किशोर ने दलितों के लिए लंच का आयोजन किया था। इसमें बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता शामिल हुए थे। बीजेपी के इस भोज के बाद बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने अमित शाह और भाजपा पर निशाना साधा था। मायावती ने इस लंच को राजनीतिक नाटक करार देते हुए कहा था कि कांग्रेस नेता भी इस तरह की हरकतें कई बार कर चुके हैं।
भाजपा के इस आयोजन के पीछे आरएसएस की सलाह थी जिसने भाजपा को दलितों के करीब लाने के लिए संघ ने डी थी। भाजपा की सवर्ण हिंदूवादी पार्टी की छवि बदलने के दिशा में यह एक बड़ी रणनीति थी। पहले 2014 के लोकसभा और फिर यूपी के विधान सभा चुनावो में भांप को दलित समुदाय के एक हिस्से के वोट भी मिले और यूपी में मायावती को बड़ा झटका लगा था। लेकिन उसके बाद दलित उत्पीडऩ की बढ़ती घटनाओं ने दलितों को भाजपा से दूर कर दिया । अब जब 2019 के चुनावों की रणभेरी बज चुकी है तब भाजपा के रणनीतिकारों ने एक बार फिर अपना ध्यान दलित वोटरों की तरफ  देना शुरू कर दिया है। दलित भोज की ताजा सीरिज इसी रणनीति का हिस्सा है। लेकिन पहले से ही दलित विरोधी होने के विपक्ष के हमलों के बीच खुद भाजपा के नेता यदि इस तरह के आयोजनों में अपनी किरकिरी करवाने से बाज नहीं आयेंगे तो दलित भोज की यह कसरत महज दिखावा ही साबित होगी और मायावती भाजपा पर दलित विरोधी होने का प्रहार करने में नहीं चूकेंगी।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखपुर में दलितों के संग सहभोज को बसपा सुप्रीमो मायावती द्वारा राजनीतिक नाटकबाजी और सियासी लाभ लेने की कोशिश बताना अप्रत्याशित नहीं है। इसके पीछे प्रदेश के मौजूदा राजनीतिक समीकरण और वोटों की गणित है। यही वजह है कि सीएम के दलितों के संग भोजन करने से मायावती बेचैन हैं। उनकी कोशिश है कि भाजपा के ऐसे सहभोज के जरिये दिए जा रहे संदेश पर रोक लगे। इसीलिए उन्होंने यह भी जोड़ा कि भाजपा के इन दिखावटी कामों से दलितों और पिछड़ों को बरगलाया नहीं जा सकता।
बहराइच की बीजेपी सांसद सावित्री बाई फूले ने अब योगी सरकार पर हमला बोला है।  बीजेपी सांसद ने दलित के घर सहभोज कार्यक्रम पर सवाल उठाते हुए कहा कि सिर्फ घर में खाना खाने से अनुसूचित जाति वर्ग का सम्मान नहीं बढ़ता है। उन्होंने कहा कि अगर भोजन ही करना है तो अनुसूचित के घर बना हुआ खाएं। उनके बर्तन में खाएं। चौके में खाना खाते तो माना भी जाता। लेकिन यहां तो बाहर से बर्तन आ रहा है। भंडारी बाहर से आता है। खाना भी दूसरे लोग ही बनाते हैं। ये तो पूरे देश के बहुजन समाज व

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