15 August, 2018

गंगा में घुलित घातक रासायनिक तत्व से बढ़ रहे कैंसर के मरीज

कानपुर। देश की आस्था और जीवनदायनी गंगा नदी पर अब तक हर सरकार में अरबों रुपये खर्च किए गये, लेकिन परिणाम नहीं के बराबर है। आलम यह है कि गंगा में घुलित घातक रासायनिक तत्व से लोगों में कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी हो रही है। कानपुर सहित अन्य जनपदों में गंगा की बिगड़ती स्थिति को लेकर स्वास्थ्य विभाग में खलबली मच गयी और शासन को पत्र लिखने के लिये रिपोर्ट तैयार करने में जुट गया।

 

केन्द्र की प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने गंगा की निर्मलता और अविरलता के लिए नमामि गंगे की अत्याधिक महत्वकांक्षी योजना शुरू की थी, लेकिन उसका भी परिणाम उत्साहजनक नहीं है। या यू कहें कि नमामि गंगे में काम कम और प्रचार ज्यादा किया जा रहा है। हालत ये है कि गंगा की हालत ​​दिन-प्रतिदिन खराब होती जा रही है। गंगा में अभी भी हजारों नालों के चलते आक्सीजन की कमी के साथ अब नदी में घुलित हैवी मेटल जिंक, लेड, कॉपर, निकिल, आर्सेनिक, सिलेनियम व कैडमियम की अधिकता बढ़ गयी है। इसके अलावा गंगा की सहायक नदी रामगंगा के पानी में घुलित पीतल के काम का प्रदूषण एवं ई कचरा, डाई का उत्सर्जन, टेनरियों के डिस्चार्ज में घुलित क्रोमियम भी अधिक मात्रा में पाया जा रहा है। यह केमिकल युक्त पानी गंगा के किनारे रहने वाले लोगों के शरीर में जा रहा है। जिसके चलते लोगों में कैंसर जैसी घातक बीमारी बढ़ रही है।

 

कानपुर स्थित जेके कैंसर संस्थान में लगातार इस तरह की बीमारी के मरीजों के आने के बाद संस्थान ने अध्ययन शुरू किया। इसमें पता चला कि गंगा नदी के किनारे रहने वाले लोग गंगा के हानिकारक रसायनिक तत्वों वाला पानी का प्रयोग कर रहें हैं, जिसके चलते उनको गॉल ब्लाडर (पित्त की थैली) का कैंसर हो रहा है। संस्थान के नोडल अफसर डा. शरद सिंह ने बताया भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) कानपुर व कई प्रमुख संस्थानों के साथ मिलकर जनपद के आसपास करीब सौ किलोमीटर से अधिक गंगा के किनारे बसे लोगों पर अध्ययन शुरू किया, जिसमें गंगा के दाएं व बाएं किनारे की चार-पांच किलोमीटर की चौड़ी पट्टी भी ली गयी। इन तटवर्ती क्षेत्रों में गॉल ब्लॉडर के केस अधिक मिल रहे हैं। जो बाद में कैंसर का रूप धारण कर लेता है। इसकी पूरी रिपोर्ट तैयार कर शासन और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) को भेजी जायेगी।

 

बताया कि जेके कैंसर संस्थान की ओपीडी में रोज औसतन 150-200 मरीज आते हैं। इनमें कैंसर के नए मरीज 50-60 होते हैं, जिसमें 10-12 मरीज गॉल ब्लाडर कैंसर के होते हैं। जिनमें एक दो छोड़कर सभी गंगा नदी के किनारे रहने वाले मरीज हैं। हालांकि डा. शरद के मुताबिक गॉल ब्लॉडर में कैंसर की स्पष्ट वजह अभी तक सामने नहीं है। प्रारंभिक अध्ययन से यह पता चलता है कि इसके पीछे गंगा में घुलित घातक रासायनिक तत्व हैं। जेके कैंसर संस्थान के निदेशक डा. एमपी मिश्रा ने बताया कि मुख कैंसर के बाद गॉल ब्लाडर के केस सर्वाधिक रिपोर्ट में होते हैं। इसका स्पष्ट लक्षण न होने से काफी विलंब से आते हैं। ऐसे में कैंसर लीवर, छोटी आंत एवं पैंक्रियाज तक फैल चुका होता है। ऐसे मरीजों की जान बचाना मुश्किल होता है।

 

कहा कि गॉल ब्लाडर के मरीजों के आंकड़ें जुटाये जा रहें हैं। आंकड़ों के विश्लेषण के आधार पर कैंसर से निपटने की रणनीति तय की जाएगी। हालांकि केंद्रीय जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी ने बीते माह यह बयान दिया था कि अगले साल मार्च तक गंगा 70 से 80 प्रतिशत तक साफ हो जाएगी, जिससे उम्मीद की जा सकती है कि गंगा के किनारे रहने वालों को जल्द ही इस घातक बीमारी से निजात मिल जायेगी।

 

बताते चलें कि, कानपुर सहित आस-पास के जनपदों में गंगा नाले के रूप में तब्दील हो गयी है। इसके साथ ही आक्सीजन की भीषण कमी भी गंगा नदी में आ गई है। जिसके चलते ही बीतें दिनों कानपुर में ही हजारों मछलियां मर गयीं थी। ऐसे में गंगा में घुलित घातक रासायन से लोगों में बढ़ रही बीमारी सरकार के लिए चिंता का विषय है और इससे निपटना बड़ी चुनौती है।

rgautamlko@gmail.com

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