11 December, 2018

स्वाधीन भारत में वर्ग-संघर्ष और साधु-संत

h.l.dushad, sadhu, ayodhya, dalit, ram janam bhumi

एच.एल.दुसाध

लेखक एच.एल.दुसाध बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं

गत एक माह से जो तबका देश में छाया  हुआ है, वह और कोई नहीं साधु-संतों का तबका है, जो अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर लगातार सुर्खियाँ बटोर रहा है. वह जिस उग्रतर तरीके से अपनी बात मनवाने पर आमादा दिख रहा है, उससे देश में एक दहशत का माहौल व्याप्त हो गया है. हालही में जब उसने गत 25 नवम्बर को अयोध्या में जमावड़ा किया, पूरी अयोध्या छावनी में तब्दील हो गयी. ढेरों स्थानीय लोग किसी बड़े अनिष्ट की आशंका से दूर-दराज के अपने रिश्तेदारों के यहां पनाह ले लिए. इसी तबके के एक काबिल सदस्य,जो देश के सबसे बड़े सूबे की कमान संभाले हुए हैं, जब भी कोई बयान जारी करते हैं, मीडिया की सुर्खियाँ बन जाते हैं. अख़बारों में छप रहा है कि दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की ओर से प्रधान सेवक के बाद दूसरे सबसे बड़े स्टार प्रचारक की हैसियत वे ही अख्तियार कर लिए हैं. कुल मिलकर आज देश में साधु-संतों का जो दबदबा कायम हुआ है, उसे देखते हुए स्वाधीन भारत के इतिहास में उनकी भूमिका का आंकलन एक जरुरी विषय बन गया है. बहरहाल अगर इनकी भूमिका का आंकलन करना है तो सबसे पहले मार्क्स के नजरिये से मानव जाति के इतिहास को जान लेना होगा.

मार्क्स ने कहा है अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है अर्थात जिसका शक्ति के स्रोतों-आर्थिक, राजनीतिक, शैक्षिक और धार्मिक –पर कब्ज़ा है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है अर्थात शक्ति के स्रोतों से दूर व बहिष्कृत है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता. नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वर्गों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है. प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने और दूसरे वर्ग पर अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए राज्य का उपयोग करता है.मार्क्स के वर्ग-संघर्ष के इतिहास की यह व्याख्या मानव जाति के सम्पूर्ण इतिहास की निर्भूल व अकाट्य सचाई है, जिससे कोई देश या समाज न तो अछूता रहा है और न आगे रहेगा. जबतक धरती पर मानव जाति का वजूद रहेगा, शक्ति-संपन्न और शक्ति-शून्य दो वर्गों के किसी न किसी रूप में वर्ग-संघर्ष कायम रहेगा.

किन्तु भारी अफ़सोस की बात है कि जहां भारत के ज्ञानी-गुनी विशेषाधिकारयुक्त तबके के लोगों द्वारा अपने वर्गीय हित में, वहीं आर्थिक कष्टों के निवारण में न्यूनतम रूचि लेने के कारण बहुजन बुद्धिजीवियों द्वारा मार्क्स के कालजई वर्ग-संघर्ष सिद्धांत की बुरी तरह अनदेखी की जाती रही है , जोकि ऐतिहासिक भूल की श्रेणी में गिने जाने लायक है . ऐसा इसलिए कि विश्व इतिहास में सदियों से वर्ग-संघर्ष का सर्वाधिक बलिष्ठतम  चरित्र हिन्दू धर्म का प्राणाधार उस वर्ण-व्यवस्था, में क्रियाशील रहा है,जो मूलतः शक्ति के स्रोतों अर्थात उत्पादन के साधनों के बंटवारे की व्यवस्था रही है एवं जिसके द्वारा ही भारत समाज सदियों से परिचालित होता रहा है. जी हाँ, वर्ण-व्यवस्था मूलतः संपदा-संसाधनों, मार्क्स की भाषा में कहा जाय तो उत्पादन के साधनों के बटवारे की व्यवस्था रही. चूँकि वर्ण-व्यवस्था में विविध वर्णों(सामाजिक समूहों) के पेशे/कर्म तय रहे तथा इन पेशे/कर्मों की विचलनशीलता धर्मशास्त्रों द्वारा निषिद्ध रही, इसलिए वर्ण-व्यवस्था एक आरक्षण व्यवस्था का रूप ले ली, जिसे हिन्दू आरक्षण कहा जा सकता है. वर्ण-व्यवस्था के प्रवर्तक आर्यों द्वारा हिन्दू आरक्षण में शक्ति के समस्त स्रोत सुपरिकल्पित रूप से तीन अल्पजन विशेषाधिकारयुक्त तबकों के मध्य आरक्षित कर दिए गए. इस आरक्षण में बहुजनों के हिस्से में संपदा-संसाधन नहीं, मात्र तीन उच्च वर्णों की सेवा आई, वह भी पारिश्रमिक-रहित. वर्ण-व्यवस्था के इस आरक्षणवादी चरित्र के कारण भारत में चिरकाल के लिए दो वर्गों का निर्माण हुआ: एक विशेषाधिकारयुक्त व सुविधासंपन्न अल्पजन और दूसरा वंचित बहुजन. सारांश में कहा जा सकता है मार्क्स ने वर्ग-संघर्ष का जो अकाट्य सिद्धांत दिया है, भारत में वह वर्ग-संघर्ष आरक्षण पर संघर्ष के रूप में क्रियाशील रहा है . बहरहाल हजारों साल से भारत के विशेषाधिकारयुक्त जन्मजात सुविधाभोगी अल्पजन और वंचित बहुजन समाज के मध्य आरक्षण पर जो अनवरत संघर्ष जारी रहा, उसमें 7 अगस्त, 1990 को मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद एक नया मोड़ आ गया. इसके बाद शुरू हुआ भारत के दो वर्गों के मध्य आरक्षण पर संघर्ष का एक नया दौर,जो आज तक जारी है.

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मंडलवादी आरक्षण की घोषणा होते ही स्वाधीन भारत में वर्ग-संघर्ष का रूप पहली बार सुस्पष्ट रूप में उभरा. इस रिपोर्ट के प्रकाशित होते ही हजारों साल से शक्ति के स्रोतों से बहिष्कृत दलित,आदिवासी ,पिछड़े और इनसे धर्मान्तरित तबके रातों-रात परस्पर घृणा और शत्रुता का परित्याग कर भ्रातृ-भाव लिए आरक्षित बहुजन वर्ग में तब्दील हो गए. इसके साथ ही नाटकीय रूप से वंचित बहुजनों की जाति-चेतना में ऐसा लम्बवत उछाल आया कि आजाद भारत में राजसत्ता पर एकाधिकार जमाये विशेषाधिकारयुक्त वर्ग के राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील होने के लक्षण उभर आये. देखते ही देखते जन्मजात अल्पजन सुविधाभोगी वर्ग के छात्र,लेखक-कलाकार,मीडिया,पूंजीपति और राजनीतिक दल मंडलवादी आरक्षण के खिलाफ अपनी-अपनी भूमिका अदा करने में जुट गए. छात्र जहां आत्म-दाह और राष्ट्र की संपदा-दाह में जुटे, वहीं लेखकों– कलाकारों और मीडिया ने इसके खिलाफ माहौल बनाने में सर्वशक्ति लगा दिया. किन्तु मंडल के खिलाफ सुविधाभोगी वर्ग के तमाम तबकों की महत्त्वपूर्ण भूमिका के बावजूद अलग से चिन्हित करने लायक किसी की भूमिका रही तो, वह साधु-संतों का तबका है, जिसके चरणों में लोट कर पीएम-सीएम-डीएम ही नहीं, राज्यपाल और राष्ट्रपति तक खुद को धन्य महसूस करते हैं. इन्ही साधु-संतों को लेकर संघ परिवार ने मंडल की रिपोर्ट प्रकाशित होने के एक माह के अन्तराल में ही रामजन्म भूमि-मुक्ति आन्दोलन छेड़ दिया, जिसे परवर्तीकाल में प्राख्यात स्वयंसेवी अटल बिहारी वाजपेयी ने आजाद भारत का सबसे बड़ा आन्दोलन करार दिया था. इन्हीं साधु-संतों को साथ लेकर संघ परिवार दैविक गुलाम बहुजनों की जाति चेतना का मुकाबला धार्मिक चेतना के राजनीतिकरण के जरिये करने कामयाब रहा, जिसके फलस्वरूप उसके शिशु-संगठन भाजपा को एकाधिक बार सत्ता में आने का अवसर मिला और आज देश पर संघ की तानाशाही सत्ता कायम हो चुकी है. ऐसे में दावे के साथ कहा जा सकता है स्वाधीन भारत में जो सबसे बड़ा वर्ग-संघर्ष संगठित हुआ, उसमें साधु-संत ही सबसे बड़ा फैक्टर रहे. साधु-संतों को भी अपनी भूमिका का इल्म है, इसलिए जब-जब संघ के राजनीतिक संगठन पर संकट आता है, वे अपनी चिर-परिचित भूमिका अदा करने के लिए सामने आ जाते हैं. उनके ऐसा करने से निरीह हिन्दुओं को दुःख होता है कि आखिर जो साधु-संत जगत मिथ्या-ब्रह्म सत्य में विश्वास करते हैं, वे क्यों बार-बार संघ के लिए मोहरा बनने को तैयार हो जाते हैं?

इसका उत्तर यह है कि अतीत से लेकर आज तक हिन्दू समाज में व्यक्ति की सोच स्व-जाति/वर्ण की स्वार्थ सरिता के मध्य प्रवाहित होती रही है. ऐसे समाज में जन्मे लोगों में समग्र वर्ग की चेतना का नितांत अभाव होता है. हिन्दू समाज की इस मनोवैज्ञानिक कमजोरी के कारण ही फुले,शाहूजी, आंबेडकर,पेरियार ने अगर दलित-पिछड़ों के लिए अपना सर्वस्व त्याग किया तो राजा राममोहन राय, विद्यासागर,बंकिम,रवि,डॉ.हेडगेवार इत्यादि जैसे अनगिनत उच्च वर्णीय हिन्दू महापुरुषों की सोच सवर्ण समाज के हित की परिधि को पार कर, बहुजन समाज तक प्रसारित न हो सकी. वर्तमान पीढ़ी के साधु-संत भी हिन्दू-जाति समाज की इसी मनोवैज्ञानिक व्याधि के हाथों पीड़ित होकर 1990 के बाद से ही भाजपा को फायदा पहुचाने का सतत उपक्रम चला रहे हैं. चूँकि प्रधानमंत्री मोदी की चरम देश व बहुजन विरोधी नीतियों के कारण भाजपा का 2019 में सत्ता से बाहर जाना तय सा दिख रहा है, इसलिए वे इस बार 1992 के बाद अतिरिक्त प्रयास करते दिख रहे हैं. लेकिन संघ के प्रति उनकी दुर्बलता का निर्भूल आंकलन उनकी जाति जानकार ही की जा सकती है.

भारत के साधु-संत किस जाति के हैं? दिमाग पर बिना कोई बोझ डाले कहा जा सकता है,’ब्राह्मण जाति के’! कुछ संख्या योगी आदित्यनाथ जैसे क्षत्रियों की भी हो सकती है. दूरबीन से देखने पर इनमें उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा, आचार्य धर्मेन्द्र,बाबा रामदेव,साध्वी सावित्रीबाई फुले,साक्षी महाराज जैसे नगण्य संख्यक शुद्रातिशूद्र  भी मिल जायेंगे, जो संतों की जमात में घुसपैठियों जैसी हैसियत रखते हैं. घुसपैठिये इसलिए कि जिस उद्देश्य(मोक्ष) के लिए संत गृह-त्याग कर आध्यात्मानुशीलन में रत होते हैं, उसकी पूर्ति के लिए हिन्दू धर्म-शास्त्र-ईश्वर ने शुद्रातिशूद्रों के लिए एकमात्र उपाय तीन उच्चतर वर्णों की निष्काम-सेवा बताया है: सन्यास इनके लिए पूरी तरह वर्जित रहा है. इस प्रावधान के कारण ही राम ने शम्बूक का सर कलम किया: इस कारण ही स्वामी विवेकानंद के मरणोपरांत सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस सर गुरुदास बंदोपाध्याय को कहना पड़ा था,‘भारत में होता यदि कोई हिन्दू राजा,विवेकान्द को फांसी के फंदे पर लटका देता, क्योंकि हिन्दू धर्म में शुद्र को सन्यास ग्रहण करने का कोई अधिकार नहीं है.’ धर्माधारित इन तथ्यों के आईने में कहा जा सकता है कि शास्त्रगत अधिकारों और प्रावधानों के कारण साधु-संतों की जमात में कमसे कम 90 प्रतिशत संत ही ब्राह्मण समुदाय से होंगे: शुद्रातिशुद्र और क्षत्रिय-वैश्यों से युक्त अ-ब्राह्मण साधु-संत 10 प्रतिशत से ज्यादा हो ही नहीं सकते. ऐसे में यह मानने में द्विधा नहीं होनी चाहिए कि संत समाज वास्तव में ब्राह्मणों का समाज है. और जब ब्रह्मणों का समाज है तो जाहिर है उसकी सोच ब्राह्मण हित से प्रेरित होगी. क्योंकि पहले ही बताया जा चुका है कि हिन्दू जाति-समाज में व्यक्ति की सोच स्व-जाति/वर्ण के स्वार्थ की परिधि के मध्य प्रवाहित होती है. चूंकि भाजपा के पितृ-संगठन आरएसएस का लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सवर्णों का शक्ति के स्रोतों(आर्थिक-राजनितिक-शैक्षिक-धार्मिक) पर एकाधिकार स्थापित करवाना है और इस काम में भाजपा का कोई जोड़ नहीं है. इसलिए ही साधु-संत संघ के शिशु संगठन भाजपा के प्रति अतिरिक्त दुर्बलता का पोषण करते हुए इसके पक्ष में आम आदमी की तरह फिजा बनाने में जुट जाते हैं.

लेखक (बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, संपर्क:9653816191)

rgautamlko@gmail.com

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