23 March, 2019

वाणिज्य कर विभाग : नोटिस के खिलाफ चढ़ा पारा

  • आन्दोलन स्थगित हुआ था खत्म नहीं : राजवर्धन सिंह
  • अधिकारी दंडित हुए तो बड़ा आन्दोलन : सुनील वर्मा

लखनऊ। सेवासंघ के अध्यक्ष राजवर्धन सिंह ने एक बार फिर तेवर तल्ख किये हैं। उनका कहना है कि सचल दल व एसआईबी के अधिकारियों को अविधिक नोटिस दी गयी है, उसे समाप्त किया जाए। पूर्व में दिया गया आन्दोलन का नोटिस विभाग में नए कमिश्नर की तैनाती के बाद सेवासंघ द्वारा शिष्टाचार के रूप में स्थगित किया गया था, हमारी मांग अभी पूरी नहीं हुई है। उनका कहना है कि संघ को यह ज्ञात हुआ है कि सचल दल अधिकारियों को माल के स्वामी की गलत व्याख्या करते हचए दंडित किए जाने की तैयारी की जा रही है, जबकि जीएसटी काउन्सिल व माननीय उच्च न्यायालय पहले ही माल के स्वामी को लेकर स्थिति स्पष्ट है। इसके बाद भी इतनी बड़ी संख्या में अधिकारियों को दंडित करने का आधार नही है। उन्होंने एक बार फिर आन्दोलन की बात दोहराई।लखनऊ। वाणिज्य कर अधिकारी सेवासंघ के अध्यक्ष सुनील वर्मा ने एक बार फिर अपने संगठन की संख्या बल का अहसास कराया है। उनका कहना है कि यह पूरी तरह से उत्पीड़न की कार्रवाई है, इसे किसी भी तरह से बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने सेवासंघ द्वारा उनके आन्दोलन को समर्थन दिये जाने का स्वागत किया। उनका कहना है कि यह पूरी तरह से उत्पीड़न है हमारे अधिकारी रात दिन मेहनत कर रहे है, उनके लिए भय का महौल पैदा किया गया है जिसका प्रभाव कार्र की उत्पादकता पर पड़ रहा है।

  • प्रदेश के 40 असिस्टेन्ट कमिश्नरों को नोटिस दिए जाने का प्रकरण
  • अधिकारियों ने खुद बदल दी एक राष्ट्र एक कर की परिभाषाआठ माह तक व्यापारियों का हुआ उत्पीड़न

लखनऊ। प्रदेश सरकार के वाणिज्य कर विभाग में का सियासी पार उस समय चढ़ गया, जब कमिश्नर वाणिज्य कर मुख्यालय प्रशासन द्वारा प्रदेश के करीब 40 सचल दल अधिकारियों को नोटिस देकर दंडित किये जाने की प्रक्रिया का विरोध करते हुए सीधी भर्ती के अधिकारियों के सेवा संघ के अध्यक्ष राजवर्धन सिंह ने प्रोन्नत संघ के अध्यक्ष सुनील कुमार वर्मा द्वारा दिए गए आन्दोलन को समर्थन किये जाने की घोषणा करते हुए कमिश्नर कार्यालय को ज्ञापन सौप दिया। सेवा संघ व प्रोन्नत संघ के बीच हुए इस गठबंधन ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया है कि राजनीति में न कोई स्थाई दोस्त होता है और न ही दुश्मन, क्योंकि विचार धारा की लड़ाई में इन दोनों संगठनों के बीच छत्तीस का आंकड़ा है। इस महासंग्राम में दोनों ही संघों का करीब आना इसलिए भी लाजमी हो गया था, क्योंकि सचल दल के जितने भी अधिकारियों को दंड की चपेट में लेने का प्रयास हो रहा उसमें दोनों ही संगठन के सदस्य शामिल हैं। फिलहाल काम के दबाव के बीच अधिकारियों को दंडित करवाने की फिराक में रहने वाले मुख्यालय में अस्थाई तौर पर तैनात अधिकारियों को लेकर प्रदेश भर के अधिकारियों में भारी रोष है और अधिकारी तनाव ग्रस्त हैं, कमिश्नर अमृता सोनी व एडीशनल कमिश्नर यशु रूस्तगी ने अगर इस मामले को गंभीरता से न लिया तो इस प्रभाव अधिकारियों की कार्य उत्पादकता व प्रदेश सरकार के राजस्व पर भी पड़ेगा।विभाग में मचे इस घमासान के लिए मुख्यालय में तैनात विभाग के उन वैज्ञानिक अधिकारियों को माना जा रह है, जिन्होंने मुख्यालय को दंड की प्रयोगशाला बना दिया है।

विभागीय जानकारों की माने तो इन अधिकारियों ने अगस्त माह में 1930 का सेल्स ऑफ गुड्स का नियम निकाल कर चेकिंग के दौरान पकड़े गए माल के स्वामी की परिभाषा ही बदल डाली, जिससे यह समस्या खड़ी हो गयी कि अगर कोई व्यापारी दिल्ली से ऑन-लाइन बुकिंग के जरिये माल मंगवाता है और उसके प्रपत्रों में कमी पाए जाने पर अगर सचल दल अधिकारी माल सीज कर देता है तो माल को छुड़वाने का पहला अधिकार उसे दिया गया, जिसने माल मंगवाने का आर्डर दिया था। यानी अगर माल भेजने वाले कारोबारी ने माल के प्रपत्रों में कोई कमी छोड़ दी तो जुर्माना व टैक्स माल मंगवाने वाले कारोबारी को भरना होगा, जो कि आज के परिवेश में एकदम प्रासंगिक नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि अब कारोबारी को मिलने के बाद ही भुगतान किया जाता है ऐसे में वो किसी पचड़े में क्यो पड़ेगा। मुख्यालय की ओर से ऐसा औचित्य हीन आदेश जारी होने के बाद करीब आठ माह तक व्यापारियों का शोषण होता रहा और उन्हे अपना माल छुड़वाने के लिए माल की कीमत के बराबर जुर्माना व टैक्स भरना पड़ा। व्यापारियों व समाचार पत्रों के माध्यम से मामला जीएसटी काउन्सिल के संज्ञान में आने व उच्च न्यायालय तक पहुंच जाने पर माल के स्वामित्व की परिभाषा स्पष्ट कर दी गयी। इसके बाद भी प्रदेश के करीब 40 असिस्टेन्ट कमिश्नरों के खिलाफ नोटिस जारी कर दी गयी। सूत्रों के अनुसार इसके लिए पूर्व कमिश्नरों को गुमराह किया गया कि जीएसटी काउन्सिल का आदेश आने से पूर्व जिन अधिकारियों ने इस नियम के विपरीत टैक्व व जुर्माना जमा करवाकर गाड़िया छोड़ी हैं, उससे सरकार को राजस्व हानि हुई है अगर इन अधिकारियों को नोटिस न जारी की गयी तो जिम्मेदारी कमिश्नर पर आ जाएगी। मुख्यालय की इस कार्रवाई पर सवाल खड़े हो गये हैं, क्योंकि कानून की परिभाषा में माल का पहला स्वामी उसी को माना जाता है, माल जिसके कब्जे में होता है। विभाग की एसआईबी टीम भी इसी आधार पर कार्रवाई कर रही है। मुख्यालय के वैज्ञानिक अधिकारियों द्वारा माल के स्वामी की गलत व्याख्या किया जाना एक राष्ट्र एक कर की व्यवस्था को भी धाराशाही करता है, क्योंकि देश के किसी भी राज्य में माल के स्वामी की यह दोहरी परिभाषा नहीं चलती है। इस प्रकरण की सबसे महत्वपूर्ण बात ये भी है कि जब जीएसटी काउन्सिल ने सचल दल अधिकारी को निर्णय करने की शक्ति प्रदान की है तो मुख्यालय उसके निर्णय पर कैसे सवाल खड़े कर रहा है।

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