18 April, 2019

‘एकला चलो’ की राह पर कांग्रेस

  • प्रियंका की इंट्री से बिगड़ सकता है गठबंधन का गणित
  • सपा-बसपा को दलित, यादव व मुसलमानों पर भरोसा

लोकसभा की सर्वाधिक 80 सीट वाले यूपी में भाजपा को रोकने के लिए विपक्ष को अधिकाधिक सीटें जीतनी होंगी। इसी लक्ष्य को लेकर सपा और बसपा लोकसभा चुनाव में उतर रही हैं। मगर कांग्रेस की नेता प्रियंका गांधी की सक्रिय राजनीति में इंट्री सपा-बसपा को नुकसान पहुंचा सकती है। सपा-बसपा गठबंधन का बीते 12 जनवरी को ऐलान हुआ। इसी दिन दोनों दलों ने श्री मोदी से मुकाबले के लिए 80 में से 76 सीटें आपस में बराबर (38-38) बांटी। गठबंधन में शामिल रालोद के लिए दो सीटें छोड़ने के साथ ही कांग्रेस को गठबंधन से बाहर रखते हुए दो सीटें रायबरेली और अमेठी पर कांग्रेस के खिलाफ कोई प्रत्याशी नहीं उतारने का फैसला किया।इतना ही नहीं, इसी दिन बसपा नेत्री मायावती ने भाजपा की तरह ही कांग्रेस को भी दलितों,मजलूमों किसानों और गरीबों का विरोधी करार दिया।

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से दोस्ती की बात तो कही, मगर उन्हें भाजपा के खिलाफ चुनावी जंग का साथी बनाने से इनकार कर दिया। 2014 के लोकसभा नतीजों पर नजर डालें तो ‘‘अबकी बार मोदी सरकार’ के नारे ने भाजपा को उसके गठन के बाद यूपी में सर्वाधिक 71 सीटों पर विजय दिला दी। दो सीटें सहयोगी दलों को मिलीं। इस चुनाव में बसपा शून्य पर जा पहुंची तो यूपी की सत्ता में काबिज सपा को पांच सीटें मिलीं, जिन पर ‘‘समाजवादी परिवार’ के लोग ही जीते। मगर तब केन्द्र की सत्ता में रही कांग्रेस ने अपने राजनीतिक सफर की सबसे कम दो सीटें रायबरेली (सोनिया गांधी) और अमेठी (राहुल गांधी) ही जीत सकी। यूपी की सफलता ने ही भाजपा को लोकसभा में पूर्ण बहुमत की दहलीज पार कराई और नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गये।

2017 में यूपी विधानसभा के हुए चुनाव में बसपा 80 से घटकर 19 सीट पर आ गई और सत्ता में रही सपा को 229 की बजाए 47 सीटें मिलीं। ऐसे में अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही बसपा अध्यक्ष मायावती और समाजवादी परिवार की ‘‘रार’ से चिंतित सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गठबंधन की राह पकड़ी है। गठबंधन के नेताओं को भरोसा है कि ‘‘दलित,यादव और मुस्लिम’ समीकरण के जरिए आगामी लोकसभा चुनाव में भाजपा को सत्ताच्युत किया जा सकता है। मगर लोकसभा चुनाव नजदीक आते कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्रप कार्ड के तौर पर बहन प्रियंका गांधी वाड्रा को राष्ट्रीय महासचिव बनाने के साथ ही उन्हें पूर्वी उप्र का प्रभारी बना दिया। राजनीति में प्रियंका की एंट्री ने गठबंधन के नेताओं को तो सकते में डाला ही है, केन्द्र में सत्तारूढ़ भाजपा को भी अपनी रणनीति बदलने को बाध्य किया है। प्रियंका ने सोमवार को लखनऊ में रोड-शो कर अपने राजनीतिक सफर का आगाज भी कर दिया है। इस मौके पर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने ‘‘यूपी में कांग्रेस पार्टी बैकफुट नहीं फ्रंट फुट पर खेलेगी’ यानि लोकसभा के चुनावी समर में कांग्रेस अकेले लड़ेगी, कहकर अपना इरादा साफ कर दिया। ऐसे में गठबंधन के नेता जिन वोटरों के सहारे भाजपा को परास्त करने का मंसूबा पाले थे, कांग्रेस प्रियंका के जरिए उसमें ही सेंध लगाने में यदि सफल रही तो फिर सपा-बसपा का राजनीतिक गणित बिगड़ सकता है।

rgautamlko@gmail.com

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