21 October, 2018

कृषि व दुग्ध के लिए अपने जलवायु के अनुसार खरीदें गाय

लखनऊ । कृषि के लिए गाय बहुत उपयोगी मानी गयी है। दुधारू पशु होने के कारण यह बहुत उपयोगी घरेलू पशु है। गाय पालन, दूध उत्पादन व्यवसाय या डेयरी फार्मिंग छोटे व बड़े स्तर दोनों पर सबसे ज्यादा विस्तार में फैला हुआ व्यवसाय है। साथ ही इसके वंश से कृषि में महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाते हैं।
गाय पालन व्यवसाय प्रमुखतः व्यवसायिक या छोटे स्तर पर दूध उत्पादन किसानों की कुल दूध उत्पादन में मदद करता है और उनकी आर्थिक वृद्धि को बढ़ाता है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि, भारत में कई वर्षों से गाय पालन कर डेयरी फार्मरों ने दूध उत्पादन से आर्थिक वृद्धि में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
भारत में गायों की 30 प्रकार की नस्ले पायी जाती हैं। आवश्यकता और उपयोगिता के आधार पर इन्हें 3 भागो में विभाजित किया गया है।
दुग्धप्रधान एकांगी नस्ल
अच्छा दूध देने वाली लेकिन उसकी सन्तान खेती के कार्यो में अनुउपयोगी
वत्सप्रधान एकांगी नस्ल
दूध कम देती है लेकिन उसकी संतान कृषि कार्य के लिए उपयोगी
सर्वांगी नस्ल
अच्छा दूध देने वाली और संतान खेती के कार्य में उपयोगी
गायों की प्रजातियां:-
सायवाल जाति
ये पंजाब में मांटगुमरी रावी नदी के आसपास और लोधरान गंजिवार लायलपुर आदि जगह पर पायी जाती हैं। ये दुग्ध उत्पादन में अच्छी होती है। यह प्रजाति भारत में कहीं भी रह सकती है। इस जाती के गाये लाल रंग की होती है। शरीर लम्बा, टांगें छोटी होती हैं। ये ब्याने के बाद 10 माह तक दूध देती है। दूध का औसत प्रतिदिन 10 से 16 लीटर होता है।
गिर जाति की गाय
यह मूलतः गुजरात के काठियावाड़ का गिर क्षेत्र में पायी जाती हैं। इसके शरीर का रंग पूरा लाल या सफेद या लाल सफेद काला सफेद हो सकता है। इसके कान छोड़े और सिंग पीछे की और मुड़े हुए होते हैं। औसत वजन 400 किलोग्राम दूध उत्पादन 1700 से 2000 किलोग्राम तक होना माना गया है।
थारपारकर
यह मूलतः पाकिस्तान के सिंध के दक्षिण अर्ध मरूस्थल के थार में पायी जाती हैं। इसका रंग खाकी भूरा और सफेद होता है। इसका औसत वजन 400 किलोग्राम का होता है। इसकी खुराक कम होती है ओसत दुग्ध उत्पादन 1400 से 1500 किलोग्राम होता है।
रेड सिंधी
इसका मुख्य स्थान पकिस्तान का सिंध प्रान्त माना जाता है। इसका रंग लाल बादामी होता है। आकार में साहिवाल से मिलती जुलती होती है। इसके सिंग जड़ों के पास से शरीर की तुलना में इसके कुबड़ बड़े आकर के होते हैं। इसमें रोगों से लड़ने की अदभुत क्षमता होती है, इसका वजन औसतन 350 किलोग्राम तक होता है। ब्याने के 300 दिनों के भीतर ये 200 लीटर दूध देती है।
काँकरेज
गुजरात के कच्छ से अहमदाबाद और रधनपुरा तक का प्रदेश इनका मूलस्थान है। ये सर्वांगी वर्ग की गाये होती हैं। इनकी विदेशों में भी काफी मांग रहती है। इनका रंग कला, भूरा, लोहया होता है। इसकी चाल अटपटी होती है, इसका दुग्ध उत्पादन 1300 से 2000 किलोग्राम तक रहता है।
मालवी
ये गायें दुधारू नहीं होती हैं, इनका रंग खाकी सफ़ेद और गर्दन पर हलका कला रंग होता है। ये ग्वालियर के आसपास पायी जाती हैं।
नागोरी
ये राजस्थान के जोधपुर पायी जाती हैं। ये ज्यादा दुधारू नहीं होती है लेकिन ब्याने के बाद कुछ दिन दूध देती हैं।
पवार
इस जाति की गाय को गुस्सा जल्दी आता है। ये पीलीभीत पूरनपुर खीरी मूलस्थान है। इसके सिंग सीधे और लम्बे होते हैं और पुछ भी लम्बी होती है, इसका दुग्ध उत्पादन भी कम होता है।
हरियाणवी
इसका मूलस्थान हरियाणा के करनाल गुडगाव दिल्ली हे।ये उचे कद और गठीले बदन की होती है। इनका रंग सफेद मोतिया हल्का भूरा होता है। इनसे जो बैल होते हैं वो खेती के कार्य और बोझ धोने के लिए उपयुक्त होते हैं। इसका ओसत दुग्ध उत्पादन 1140 से 3000 किलोग्राम तक होता है।
अम्रत महल -वस्तप्रधान गाय
हल्लीकर – वस्तप्रधान गाये
बरगुर – वस्तप्रधान गायें
बालमबादी -वस्त प्रधान गायें
कगायम – दूध देने वाली गायें
क्रष्णवल्ली – दूध देने वाली गाय
कोट-गाय को अपने शहर के जलवायु के अनुसार हीं खरीदना चाहिए ताकि वे आपके शहर की जलवायु को बर्दास्त कर सके, इसलिए बेहतर होगा कि गाय आप अपने शहर से हीं खरीदें। नस्ल के हिसाब से लोग गाय तो खरीद लेते पर उसके पालन में बहुत सारी परेशानी आती है।
-जवाहर निषाद पशुपालन विशेषज्ञ

jaydeep@ds.in

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