25 September, 2018

कभी बहार ए जिंदगी में पलकों में ख्वाब सजाए थे…

dastak

लेखक :-जुहैर बिन सगीर, आईएएस

कभी बहार ए जिंदगी में पलकों में ख्वाब सजाए थे,
अब वीरां हैं दिल की गलियां, दस्तक क्यूँ नहीं देते?
उन चाहतों के समंदर में आरजुएं थी बेकरां,
नए मौसमों की खिजाओं में दस्तक क्यूँ नहीं देते?
उसे शिकवे हैं हजार, मुझे उसके हर गिले से उल्फत,
फिर अजमाएं, बहलाएं, आएं, दस्तक क्यूँ नहीं देते?
तुम्हें याद है, तुम्हारी जुल्फों में सजा हो वो एक सुनहरा फूल
गुल-पोश वादियां भी अब मिस्ले-खार हैं, दस्तक क्यूँ नहीं देते?
हर राह तेरे कूचे की तरफ गामजन है,
मैं हूं अपनी रेह से बेखबर, दस्तक क्यूँ नहीं देते?

खिजाओं – पतझड़
गिला – शिकायत
गुल-पोश -फूलों से भरी
मिस्ले-खार – कांटों की तरह
कूचा- गली
गामजन -जाती हुई

rgautamlko@gmail.com

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