21 October, 2018

विवाहेतर संबंध अब अपराध नहीं

Section 497, adultery against women,Supreme Court, Constitution Bench of the Supreme Court ,
  • शीर्ष कोर्ट ने 157 साल पुराने प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया
  • महिला को पति की संपत्ति बना देता है यह कानून

नई दिल्ली। व्यभिचार (एडल्टरी) के कानून को महिलाओं के खिलाफ बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि तलाक आदि के दीवानी मामलों में एडल्टरी के आधार पर डिवोर्स की याचिका दायर करने का प्रावधान पहले की तरह जारी रहेगा। सुप्रीम कोर्ट ने धारा 497 को आईपीसी से हटा दिया। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद विवाहेतर संबंध अब अपराध नहीं माना जाएगा।

अंग्रेजों के जमाने की आईपीसी की धारा 497 में एडल्टरी की परिभाषा अजीबो-गरीब थी। इस धारा के तहत यदि पुरुष किसी पराई विवाहिता से उसके पति की अनुमति के बिना शारीरिक संबंध स्थापित करता है तो वह एडल्टरी का अपराधी होगा और उसे पांच साल तक की सजा हो सकेगी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने इस प्रावधान को लैंगिक आधार महिला के खिलाफ करार दिया।

संविधान पीठ ने कहा कि 497 का प्रावधान साफतौर पर विवाहित महिला को पति की बपौती बना देता है। हालांकि, इस धारा को लैंगिक तटस्थ (जेंडर न्यूट्रल) करने का भी संविधान पीठ से अनुरोध किया गया था ताकि विवाहेत्तर संबंध रखने वाले महिला और पुरु ष दोनों को अपराध की परिधि में लाया जा सके। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे जेंडर न्यूट्रल के आधार पर संशोधन करने से इंकार कर दिया।व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से बाहर करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इससे संबंधित भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार देते हुए निरस्त कर दिया और कहा कि यह महिलाओं की स्वायत्तता और व्यक्तित्व को ठेस पहुंचाता है और इस प्रावधान ने महिलाओं को पतियों की संपत्ति बना दिया था।

चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, अजय खानविलकर, धनंजय चंद्रचूड और इंदु मल्होत्रा की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से व्यभिचार से संबंधित 158 साल पुरानी भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक करार हुए इस दंडात्मक प्रावधान को निरस्त कर दिया। अदालत ने इस धारा को स्पष्ट रूप से मनमाना, पुरातनकालीन और समानता के अधिकार तथा महिलाओं के लिए समान अवसर के अधिकार का उल्लंघन करने वाला बताया। संविधान पीठ ने एकमत से कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 497 असंवैधानिक है।

संविधान पीठ ने जोसेफ शाइन की याचिका पर यह फैसला सुनाया। यह याचिका किसी विवाहित महिला से विवाहेत्तर यौन संबंध को अपराध मानने और सिर्फ पुरु ष को ही दंडित करने के प्रावधान के खिलाफ दायर की गई थी। व्यभिचार को प्राचीन अवशेष करार देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मानव जीवन के सम्मानजनक अस्तित्व के लिए स्वायत्ता स्वभाविक है और धारा 497 महिलाओं को अपनी पसंद से वंचित करती है। चीफ जस्टिस ने अपने फैसले में कहा कि व्यभिचार आपराधिक कृत्य नहीं होना चाहिए लेकिन इसे अभी भी नैतिक रूप से गलत माना जाएगा और इसे विवाह खत्म करने तथा तलाक लेने का आधार माना जाएगा। घरों को तोड़ने के लिए कोई सामाजिक लाइसेंस नहीं मिल सकता।

भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अनुसार यदि कोई पुरुष यह जानते हुए भी कि महिला किसी अन्य व्यक्ति की पत्नी है और उस व्यक्ति की सहमति या मिलीभगत के बगैर ही महिला के साथ यौनाचार करता है तो वह एडल्टरी के अपराध का दोषी होगा। यह बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा। इस अपराध के लिए पुरुष को पांच साल की कैद या जुर्माना अथवा दोनों की सजा का प्रावधान था। शाइन की ओर से दायर याचिका में तर्क दिया गया था कि कानून तो लैंगिक दृष्टि से तटस्थ होता है लेकिन धारा 49 का प्रावधान पुरु षों के साथ भेदभाव करता है और इससे संविधान के अनुच्छेद 14 (समता के अधिकार), अनुच्छेद 15 (धर्म, जाति, लिंग, भाषा अथवा जन्म स्थल के आधार पर विभेद नहीं) और अनुच्छेद 21 (दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन होता है। 

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