22 February, 2018

गोमती रिवर फ्रंट घोटाला : CBI की सक्रियता से नेताओं और नौकरशाहों की उड़ी नींद

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  • विस्तार से सरकार से जांच के लिए विशेषज्ञ मांगे
  • सीबीआई के लिए आसान नहीं होगी रिवर फ्रंट प्रॉजेक्ट की जांच
  • 800 से ज्यादा टेंडर और 5000 पन्नों के दस्तावेज खंगालने होंगे
  • घोटाले की सभी कड़ियां जोड़कर साक्ष्य जुटाने की भी होगी चुनौती
  • हर काम की अलग से करनी होगी पड़ताल
  • जांच रिपोर्ट भी जांच के दायरे में

लखनऊ। गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण में हुईं अनियमितताओं की जांच सीबीआई ने शुरू कर दी है, लेकिन यह जांच सीबीआई के लिए आसान साबित नहीं होगी। कहने को यह एक प्रॉजेक्ट है, लेकिन इसका दायरा काफी बड़ा है। इस प्रॉजेक्ट के लिए 800 से ज्यादा टेंडर हुए। इन सभी की जांच सीबीआई को करनी होगी। इसके अलावा न्यायिक जांच समिति ने जो जांच की है, उसके संबंध में 5000 पन्नों के एनक्लोजर लगाए गए हैं। सीबीआई को इन सभी की कड़ियां जोड़ने के साथ साक्ष्य भी जुटाने होंगे। गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण में गड़बड़ियों की भरमार है। परियोजना का बजट छह से आठ गुना तक बढ़ गया। कई ऐसे काम हुए, जिन्हें मंजूरी बाद में मिली और उनका बजट एक साल पहले से जारी हो गया। बिना डीपीआर के काम शुरू कर दिया गया, पर्यावरण की एनओसी नहीं ली गई। अधिकारी और मंत्री परियोजना के नाम पर स्वीडन, जापान, चीन, जर्मनी, मलयेशिया, सिंगापुर, साउथ कोरिया और ऑस्ट्रिया घूमते रहे, लेकिन अमल के नाम पर कुछ नहीं हुआ। सीबीआई को इन सब की जांच भी करनी होगी।

तीन सदस्यीय न्यायिक समिति ने कई बड़ों को अपनी जांच में दोषी नहीं ठहराया, लेकिन अपनी रिपोर्ट में कई जगह उनकी भूमिका को लेकर इशारे कर दिए हैं। इनमें तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में गठित अनुश्रवण समिति की भूमिका सबसे अहम है। सीबीआई की पड़ताल में तत्कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल सिंह यादव, तत्कालीन मुख्य सचिव आलोक रंजन, प्रमुख सचिव वित्त और बाद में मुख्य सचिव रहे राहुल भटनागर, प्रमुख सचिव सिंचाई दीपक सिंघल का नाम प्रमुखता से शामिल है।

गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण के दौरान इंजिनियरों ने अफसरों की शह पर जमकर ‌फर्जीवाड़े किए। एक काम को दो-दो जगह होना दिखाया गया। कागजों में 31 काम का जिक्र है, लेकिन 24 काम ही वास्तविक मिले हैं। इनमें भी आठ काम ही पूरे हुए और छह तो शुरू भी नहीं हुए। 18 में 11 काम ऐसे थे, जिनमें अनुमोदित बजट से काफी ज्यादा खर्च किया गया। शुरुआत में यह प्रॉजेक्ट 565 करोड़ का था और बाद में सिंचाई विभाग ने 1990.24 करोड़ रुपये की डिमांड कर दी। वित्त विभाग ने इसे घटाकर 1513.51 करोड़ रुपये कर दिया। इनमें से करीब 95 प्रतिशत बजट (1437 करोड़) खर्च होने के बाद भी करीब 60 प्रतिशत काम ही पूरा हुआ है। इन सभी की अलग-अगल पड़ताल भी सीबीआई की लिस्ट में है।
बड़ों की क्या रही भूमिका

गोमती रिवर फ्रंट का पूरा काम तकनीकी है। सीबीआई ने इसकी पड़ताल के लिए यूपी सरकार से विशेषज्ञों की टीम मांगी है। जांच के लिए आईआईटी, पर्यावरण और चैनलाइजेशन के काम से जुड़े विशेषज्ञों की मदद ली जाएगी। बताते चलें कि तीन सदस्यीय न्यायिक समिति की जांच रिपोर्ट में इस बात का भी जिक्र है कि तत्कालीन मंत्रियों और अधिकारियों ने रिवर फ्रंट के निर्माण के लिए आईआईटी के विशेषज्ञों को मोटा भुगतान किया, लेकिन वे यहां झांकने तक नहीं आए। सीबीआई के एक अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि इस मामले की जांच उतनी आसान नहीं है, जितनी दिख रही है। न्यायिक समिति ने जो जांच की है, उसका दायरा सीमित है। अभी निर्माण से जुड़े कई ऐसे पहलू हैं, जो सामने ही नहीं आए हैं। इसलिए सीबीआई ने इसमें एफआईआर से अलग एक पीई दर्ज की है। इसके जरिए इन सभी पहलुओं को सामने लाया जाएगा।

 

सीबीआई ने प्रॉजेक्ट से जुड़े सभी विभागों से ब्योरा मांगा है। इनमें सिंचाई विभाग, एलडीए, नगर विकास, जल निगम, बिजली, वित्त, राजस्व और पर्यावरण शामिल हैं। गोमती रिवर फ्रंट के काम पर नजर रखने के लिए तत्कालीन मुख्य सचिव की अध्यक्षता में जो उच्चस्तरीय अनुश्रवण समिति बनी थी, सीबीआई ने उनके द्वारा की गईं 23 बैठकों का भी ब्योरा मांगा है। सीबीआई इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि तीन सदस्यीय न्यायिक समिति की जांच में उन बड़े नामों को क्लीनचिट कैसे मिल गई, जो प्रॉजेक्ट से सीधे जुड़े थे। उन लोगों ने काम को लेकर देश-विदेश में कई दौरे भी किए थे।

 

 

 

rgautamlko@gmail.com

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