18 August, 2018

अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट में 15 मई को सुनवाई

  • सुनवाई के तरीके पर पक्ष-विपक्ष ने रखी दलील, एक पक्ष मामले को संविधान बेंच को सौंपने की मांग कर रहा तो दूसरा पक्ष विरोध 

नई दिल्ली। अयोध्या मसले पर सुप्रीम कोर्ट में अगली सुनवाई 15 मई को होगी। मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से इस केस की सुनवाई पांच जजों की बेंच के पास भेजने की मांग करनेवाले वरिष्ठ वकील राजीव धवन अस्वस्थ होने के चलते आज मौजूद नहीं थे। कोर्ट उन्हें 15 मई को अपनी दलीलें रखने का पूरा मौका देगा।

मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से आज वकील राजू रामचंद्रन ने कहा कि ये सिर्फ भूमि विवाद का मसला नहीं है ये राष्ट्रीय महत्व का विषय है। जबकि हिन्दू पक्षकारों की ओर से हरीश साल्वे ने कहा कि इस दलील का विरोध करते हुए कहा कि इस मामले को सिर्फ जमीन विवाद की तरह सुना जाए। इसे संविधान बेंच को भेजने की जरुरत नहीं है।

मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कहा विवाद 19वीं शताब्दी के मध्य में शुरु हुआ। उन्होंने कहा कि इस मामले की संवेदनशीलता की वजह से कानून-व्यवस्था न केवल अयोध्या में प्रभावित होता है बल्कि ये दूसरे इलाकों में भी होता है। उन्होंने कहा कि इससे कोई इनकार नहीं कर सकता है कि ये केस अनोखा केस है। हाईकोर्ट के फैसले से कोई खुश नहीं है और सभी फैसले का विरोध कर रहे हैं। फर्स्ट अपील का ये पहला केस था जिस केस पर सुनवाई के लिए हाईकोर्ट की फुल बेंच गठित की गई थी। इसलिए इस मामले को पांच जजों की बेंच के पास सुनवाई के लिए भेजना चाहिए।

राजू रामचंद्रन ने कुछ फैसलों को उद्धृत किया और कहा कि ये केस इतना महत्वपूर्ण है कि छोटी बेंच इसे हैंडिल नहीं कर सकती है। ये केस राष्ट्र के लिए काफी महत्वपूर्ण है। अधिकांश राजनीतिक दल अपना पक्ष प्रकाशित कर रहे हैं। इस पर चर्चा छिड़ गई है। उन्होंने कहा कि मसलों को क्लीनिकली अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। इस मामले के इतिहास को देखते हुए इसे पांच जजों की बेंच को सौंपना चाहिए।

उसके बाद रामलला की तरफ से वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे ने अपनी दलीलें शुरु की। उन्होंने कहा कि 1992 का बार-बार हवाला दिया जा रहा है और देश उससे काफी आगे जा चुका है। केस को राजनीतिक और धार्मिक रंग देनेवाले ऐसी दलील बाहर छोड़ दें। कोर्ट को इस मसले के साक्ष्यों और कानून के हिसाब से फैसला करना चाहिए। ये संपत्ति का विवाद नहीं है। तब इस पर दो जजों की बेंच को सुनवाई करना चाहिए। चूंकि ये महत्वपूर्ण केस है| इसलिए इसे तीन जजों की बेंच को सुनवाई करना चाहिए।

हरीश साल्वे ने कहा कि ये संपत्ति विवाद है| इसलिए इसे पांच जजों की बेंच के पास नहीं भेजा जाना चाहिए। ये इतना महत्वपूर्ण मसला नहीं है कि इसे संविधान बेंच के पास भेजा जाए।

पहले की सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वकील राजीव धवन ने कहा था कि किसी मस्जिद के गिरा देने का मतलब यह नहीं है कि वह मस्जिद नहीं है। उन्होंने कहा था कि मस्जिद को भी देश में उतनी ही बराबरी से देखा जाना चाहिए जितना मंदिर और दूसरे पूजा स्थलों को।

राजीव धवन ने 1994 के इस्माइल फारुखी फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग की थी। इस फैसले में मस्जिद को इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं माना गया था। धवन ने कहा था कि इस्लाम के तहत मस्जिद का काफी महत्व है। एक बार मस्जिद बन जाए तो वो अल्लाह की संपत्ति मानी जाती है। उसे तोड़ा नहीं जा सकता है। खुद पैगंबर मोहम्मद ने मदीने से तीस किलोमीटर दूर मस्जिद बनाई थी। इस्लाम में इसके अनुयायियों के लिए मस्जिद जाना अनिवार्य माना गया है।

धवन ने कहा था कि भारत में हर धर्म के माननेवाले लोग हैं। ये देश संगमरमर की इमारत की तरह है। किसी टुकड़े के सरकने से इमारत को नुकसान होता है। हिंदुओं के लिए कई इमारतें अहम हैं। लेकिन मुसलमानों के लिए ऐसी कोई जगह नहीं है। दावा किया जाता है कि लाखों साल पहले भगवान राम पैदा हुए थे। लेकिन वो उसी जगह पर पैदा हुए थे इसका क्या प्रमाण है ।

पिछले 14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वो सबसे पहले ये फैसला करेगा कि ये मसला पांच सदस्यीय संविधान बेंच के पास भेजा जाए कि नहीं। राजीव धवन ने कहा था कि 1994 के इस्माईल फारुकी केस का फैसला करने में सुप्रीम कोर्ट ने गलती की जिसमें कहा गया है कि मस्जिद का इस्लाम से कोई संबंध नहीं है।

14 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दाखिल सभी हस्तक्षेप याचिकाओं पर सुनवाई से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट की रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि अब वे इस मसले पर किसी भी हस्तक्षेप याचिका को स्वीकार न करें। कोर्ट ने कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट के पास जो पक्षकार नहीं थे| उनकी हस्तक्षेप याचिका हम स्वीकार नहीं करेंगे।

rgautamlko@gmail.com

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