23 October, 2018

विकास के लिए समाज में शांति व सद्भावना का वातावरण जरूरी : दलाई लामा

नई दिल्ली। तिब्बती धर्मगुरू दलाई लामा ने विश्व कल्याण और मानव विकास के लिए शांति को जरूरी बताते हुए कहा कि विकास व समृद्धि के लिए समाज में शांति व सद्भावना का वातावरण जरूरी होता है। 

दलाईलामा ने जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में ‘सामंजस्यपूर्ण सह-अस्तित्व के विचार : भारत के धर्म एवं दर्शन’ विषय पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य मशीन का प्रोडक्ट नहीं है। विचार भेद, रूचि भेद, चिंतन भेद होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में मतभेद को विकास का प्रतीक माना गया है। जब मनभेद मतभेद में बदल जाते हैं तब समस्या उत्पन्न होती है। जरूरत है हम संवाद के द्वारा, वार्ता के द्वारा सह अस्तित्व के लिए निरंतर प्रयासरत रहें। विकास व समृद्धि के लिए समाज में शांति व सद्भावना का वातावरण जरूरी होता है।
अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक प्रख्यात जैन आचार्य डा. लोकेश मुनि ने कहा कि पर्यावरण प्रदूषण से ज्यादा वैचारिक प्रदूषण खतरनाक है। शांतिपूर्ण सहस्तित्व भारत की बहुलतावादी संस्कृति की पहचान है। अनेकता में एकता उसकी मौलिक विशेषता है| सर्वधर्म संवाद इसका मूल मंत्र है। सर्वधर्म सद्भाव को अपने जीवन में उतारना विश्व शांति के लिए आवश्यक है। धर्म हमें जोड़ना सिखाता है, तोड़ना नहीं। धर्म के क्षेत्र में हिंसा, घृणा और नफरत का कोई स्थान नहीं हो सकता। हिंसा और आतंकवाद किसी समस्या का समाधान नहीं है। हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है। आचार्य लोकेश ने कहा कि भगवान महावीर के दर्शन पर आधारित जैन धर्म अहिंसा, अनेकांत व अपरिग्रह जैसे सिद्धांतों पर आधारित है। यह सिद्धांत एक जाति व धर्म तक सीमित नहीं है। इनको समझने और जीवन में उतारने से अनेक वैश्विक समस्याओं का समाधान मुमकिन है। भगवान महावीर दर्शन को अपनाने से समाज में शांति व सद्भावना स्थापित कर मानवता को पूर्ण विकास की ओर ले जा सकते हैं। सैयदना ताहिर फक्करुद्दीन ने कहा कि मौजूदा समय में हम जिस दौर से गुजर रहे हैं, आज न केवल भारत बल्कि समस्त विश्व हिंसा व आतंकवाद से प्रभावित है| आये दिन धर्म, जाति व सम्प्रदाय के नाम पर बेगुनाहों का कत्लेआम हो रहा है। ऐसे समय में अंतरधार्मिक संवाद की बहुत आवश्यकता है। जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी में गौर गोपालदास, ई ई. मालेकर, मंजीत सिंह. के., डा. ए.के. मर्चेंट, आर्चबिशप अनिल जोसेफ थॉमस, भारत के पूर्व चीफ जस्टिस अहमदी ने संगोष्ठी को संबोधित किया। विश्वभर के विभिन्न धर्मों के धर्माचार्य, राजनेताओं, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों ने भाग लिया।

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