14 December, 2018

खादी के मोह में खाकी

  • यूपी के पुलिस अफसरों में बढ़ा राजनीति के जरिए समाजसेवा का भूत 
शिशुपाल सिंह
लखनऊ। यूपी में खाकी पर खादी का मोह सिर चढ़कर बोल रहा है। रिटायरमेंट से पहले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चि_ïी लिखकर अपनी राजनीतिक महत्वकांक्षा का खुलासा करने वाले डीजी डा. सूर्य कुमार शुक्ला पहले आईपीएस नहीं हैं, जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर राजनीति में कूदने के लिए इच्छा जताई हो। यूपी में पहले डंडा और अब झंडा उठाने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। कुछ आईपीएस अफसर पुलिस सेवा के दौरान ही सामाजिक संगठन के जरिए राजनीति में आने का प्लेटफार्म तैयार कर रहे हैं।
मालूम हो कि खाकी उतारने के बाद डीजीपी से लेकर कांस्टेबिल तक खादी पहनकर जनसेवा करने का उतावलापन देखते बन रहे है। दिल्ली में देश की प्रथम महिला आईपीएस किरण बेदी के भाजपा में शामिल होने और उन्हें सीएम प्रोजेक्ट किए जाने के बाद अन्य लोगों के अलावा रिटायर्ड पुलिस अफसरों के भाजपा में शामिल होने के क्रम में प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक बृजलाल के साथ रिटायर्ड डीआईजी ज्ञान सिंह के भाजपा में शामिल हो गए। बृजलाल को इनाम के तौर पर उत्तर प्रदेश अनुसूचित जाति जनजाति आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है। यह पहला मौका नहीं है जब खाकी में खादी पहनकर समाजसेवा का भूत सवार हुआ है। इससे पूर्व भी डीजीपी से लेकर सिपाही तक के लोग सक्रिय राजनीति से चुनावी राजनीति में आए कुछ को सफलता मिली तो कुछ निराश होकर बैठ गए। बृजलाल से पूर्व प्रदेश के पुलिस महानिदेशक रहे श्रीशचन्द्र दीक्षित तो वाराणसी से सांसद भी रहे। प्रदेश के अन्य पुलिस महानिदेशक रहे यशपाल सिंह पीस पार्टी में शामिल हुए थे उन्हे संगठन में राष्टï्रीय महासचिव की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी लेकिन वे ज्यादा दिनों तक सक्रिय नहीं रहे और संगठन से पीस पार्टी से किनारे हो गए। पूर्व मुख्य सचिव नीरा यादव के पति आईपीएस एडीजी रहे महेन्द्र सिंह यादव भाजपा में शामिल हुए फिर कैबिनेट मंत्री बने। भाजपा की सरकार जाने के बाद लोकदल में शामिल हो गए।
केरल के एडीजी रहे राजबहादुर ने 2012 के विधानसभा चुनाव में लखनऊ की सरोजनीनगर सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा लेकि न उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा। जबकि डिप्टी एडीजी रहे मंजूर अहमद पहले कांग्रेस फिर बसपा में रह मेयर और विधानसभा का चुनाव लड़ा दोनों ही चुनावों में उन्हे शिकस्त का सामना करना पड़ा। प्रदेश के एडीजी सुब्रत त्रिपाठी ने सरकारी सेवा रहते हुए किसी दल में शामिल होने के बजाए मनुवादी पार्टी बनाई। और उसी के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करनें में लगे है। आईजी रह चुके एसआर दारापुरी दो बार चुनाव लड़े दोनों ही बार उन्हे हार का सामना करना पड़ा। इन दिनों एक्टिविस्ट के रूप  में सक्रिय है। सपा की सरकार में आईजी रहे अमर दत्त मिश्र ने रिटायर होने के बाद पिछला चुनाव भदोही से लड़ा लेकिन उन्हे  भी निराशा हाथ लगी। जब कि रिटायर्ड डीआईजी सीएम प्रसाद सोनभद्र की दुद्वी विधानसभा से चुनाव लड़़े और जीते। विधानसभा में पुलिस अधिकारियों और सिपाहियों की माननीय के रूप में उपस्थिति कोई नई बात नहीं है।
पूर्व डीआईजी अहमद हसन  सेवानिवृति होने के बाद से समाजवादी पार्टी की राजनीति में सक्रिय हंै, कई बार मंत्री बने और विधानपरिषद में नेता विपक्ष हैं। यूपी कैडर के एक आईपीएस जो कई जिलों में कप्तान और राजभवन में एडीसी रहे दावा शेरपा को जब पुलिस की पुलिस की नौकरी रास नहीं आई सियासत का चस्का लगा अपने गृह प्रदेश मेघालय चले गए दार्जिलिंग से  चुनाव लड़े और पराजित होकर बैठ गए। फैजाबाद के एसएसपी रहे डीबी राय भी भाजपा के टिकट पर सुल्तापुर से सांसद रह चुके है। इसके अलावा एडीजी रहे मनोज कुमार सिंह,अजय सिंह, कांग्रेस में और सीआरपीएफ के आईजी वीपीएस पवार रालोद में शामिल हो चुके है। जबकि पूर्व एडीजी बीजेन्द्र सिंह और पूर्व डीआईजी केके तिवारी ने भी पीस पार्टी की सदस्यता ली थी। आईपीएस के अलावा पीपीएस अधिकारियों को भी राजनीति का चस्का न लगा हो ऐसी बात नहीं है। एसटीएफ से इस्तीफा देकर कांग्रेस में गए शैलेन्द्र सिंह चंदौली से लोकसभा का चुनाव लड़े लेकिन जीत नहीं पाए। नेताओं के साथ

सुरक्षाकर्मी रहे लोगों को भी माननीय बनने का अवसर मिला। सपा-बसपा से विधायक और सांसद रहे उमाकांत यादव पुलिस की नौकरी से बर्खास्त हुए तो राजनीति में आ गए। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के मुख्य सुरक्षा अधिकारी रहे प्रो.एसपी सिंह बघेल संसद के दोनों में प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की एसपीजी में शामिल रहे कमल किशोर कमांडों बहराइच से सांसद रहे। पुलिस अधिकारियों के अलावा सिपाहियों ने भी राजनीति में हाथ आजमाएं। राजधानी  के हजरतगंज कोतवाली मे तैनात रहे सिपाही रामहर्ष यादव ने नौकरी से इस्तीफा देकर समाजसेवा का रास्ता चुना फिर राजनीति का भूत सवार हुआ तो मानवता समाज पार्टी का गठन कर राजनीति शुरू कर दी।
सामाजिक संगठन बहुजन सशक्तिकरण संघ के जरिए आईपीएस बी.पी. अशोक राजनीति में दस्तक देने के लिए पर्दे के पीछे से पसीना बहा रहे हैं। एससी-एसटी एक्ट के मुद्दे पर जहां इस्तीफा देने का स्टंट किया वहीं अब इसका योगी सरकार ने मेरठ का आईजी क्राइम बनाकर इनाम भी दिया है। आईपीएस बी.पी. अशोक की युवा वर्ग में काफी लोकप्रियता है। आईपीएस बी.पी. अशोक के सामाजिक संगठन बहुजन सशक्तिकरण संघ में काफी संख्या में दलित अफसरों की सहभागिता है। बी.पी. अशोक की राह पर तेजतर्रार आईपीएस प्रेम प्रकाश भी हैं। दलित संगठनों के कार्यक्रमों में जहां काफी सक्रियता से हिस्सा लेते हैं वहीं अपने परिजनों को राजनीति में घुसेडऩे के लिए चुनाव भी लड़वा चुके हैं।
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