22 September, 2018

जाने…बाबा साहब के 12 अनसुलझे रहस्य

डॉ. भीमराव अम्बेडकर एक ऐसे युगपुरुष और क्रान्तिदूत हैं जो अपने व्यक्तित्व और कर्तृत्व के बल पर इंसान से भगवान जैसे बन गये हैं। वे आधुनिक भारत के प्रमुख शिल्पियोें मेें से एक हैं। डॉ0 अम्बेडकर एक मौलिक चिंतक, समीक्षक और सिद्धान्तकार थे। वे विश्वविख्यात विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, समाजशास्त्री, तत्ववेत्ता, राजनीतिक द्रष्टा, पत्रकार थे। उनका व्यक्तित्व बहुआयामी था। उन्होंने हर तरह से लूले-लंगड़े, गूंगे-बहरे, दृष्टिहीन, दीन-हीन, गाली-मार सहर्ष स्वीकार करने वाले अस्पृश्य और पिछड़े समाज को चेतना दी, अधिकार के लिए कुर्बानी देना सिखाया और स्वाभिमान से जीने तथा स्वावलम्बन की ओर अग्रसर किया। हिन्दू समाज की रुढिवादी जड़ता को तोड़ने के लिए उसे भूकम्पी झटके देकर गतिशील करने का कार्य किया।  गाँधीजी  और हिन्दू स्वराज्यवादियों को कड़ी चुनौती  डॉ0 अम्बेडकर न केवल देश की राजनीतिक आजादी बल्कि सामाजिक और आर्थिक रूप से हजारों वर्षांे से  गुलामी की जिन्दगी जीने वालोें की भी आजादी चाहते थे। इन पद दलित गुलामोेें की स्वतंत्रता के लिए उन्होंने देश के राजनीतिक स्वतंत्रता आन्दोलन को गौण माना।

उन्होंने गुलाम नागरिकों की आजादी की मांग स्पष्ट और जोरदार ढंग से विभिन्न मंचोें पर उठाई, जिसके विरुद्ध स्वराजवादियोें और हिन्दू राष्ट्रवादियोेें ने उन्हें अंग्रेजपरस्त, देशद्रोही और न जाने क्या-क्या कहा । इस पर डॉ0 अम्बेडकर ने काँग्रेस और गाँधीजी को कड़ी चुनौती दी । जब भी डॉ0 अम्बेडकर को अंग्रेजपरस्त, देशद्रेाही कहा गया तो उनका एक मात्र अकाट्य तर्क होता था कि यदि मैं तुम्हारे मुताबिक अंग्रेजपरस्त, राष्ट्रद्रोही हूँ तो इस राष्ट्रद्रोह का जिम्मेवार मैं नहीं हूँ । बल्कि इसके लिए तुम और तुम्हारा देश जिम्मेदार है जिसे मातृभूमि कहते हुए मुझे संकोच का अनुभव होता है। इस अपराध का बोझ उन राष्ट्रवादियोें और हिन्दू स्वराजवादियोें के माथे पर है जिन्होंने हजारोें वर्षो तक जबरन अछूत बना कर रखे गए करोड़ों भारतीयों के प्रति उन्होंने अपने कर्त्तव्य की अवहेलना की है। उन्हेें जब कभी दो हिन्दू राजाओें महाराजा बड़ौदा और महाराजा कोल्हापुर के छात्रवृत्ति और आर्थिक सहायता से अध्ययन करने के एवज मेेें उनके द्वारा हिन्दू धर्म के विरुद्ध बोलने और अछूतोें की आजादी की मांग के लिए अकृतज्ञ कह कर सम्बोधित किया गया, तो उस पर उनकी तत्क्षण प्रतिक्रिया होती थी कि अंग्रेजों ने विश्वविद्यालय खोलकर हिन्दुस्तानी हिन्दुओेें को अंग्रेजी शिक्षा दी तथा इंग्लैण्ड मेेें उच्च शिक्षा दिलाई फिर वे क्यों अंग्रेज शासकोें  के प्रति अकृतज्ञ होकर उनसे मुक्त होने के लिए स्वराज्य की मांग कर रहे हैं ? यदि ऐसे  कृतघ्न हिन्दू देशभक्त कहला सकते हैं, तो अछूत जाति को हजारों सालोें की अमानवीय दासता और गुलामी से छुटकारा दिलाने की कोशिश देशभक्ति का श्रेष्ठ कर्म क्यों नहीं हो सकता ?

मरे जानवरों को उठाने और खाने का कड़ा विरोध 

डॉ0 अम्बेडकर ने सन् 1926 मेें आह्वान किया  कि महार- चमार एवं अन्य अछूत जातियां मरे हुए गाय-भैंस को न तो उठायें और न ही मरे हुए गाय-भैंस का माँस खायेें । उन्होंने कहा कि हिन्दू गाय को माता कहते हैं। जिन्दा गाय-भैंस का दूध पीते हैं और मरने पर उसे हमसे फेंकवाते हैं। ऐसा क्यों ? अगर वे अपनी बुढ़ी माँ के मरने पर उसे खुद उठा ले जाते हैं तो मरी हुई अपनी गौ माता को स्वयं क्यों नहीं उठा ले जाते हैं ? इस पर सवर्ण हिन्दुओें की रोसपूर्ण व्यापक प्रतिक्रिया हुई। बाल गंगाधर तिलक एवं उनकी पत्रिका केसरी के सम्पादक ने कई लेख प्रकाशित कर यह बतलाया कि हर वर्ष मृत पशुओें के न उठाने से महारों, चमारोें, भंगियोें का बहुत बड़ा नुकसान हो रहा है । उसने सविस्तार आकड़े दे कर यह सिद्ध किया कि मरे हुये पशु की हड्डियों, आंतों, दांतों सीगोें को बेचने से हर अछूत को पाँच-छः सौ रुपये वार्षिक लाभ होता है। पर  डॉ0 अम्बेडकर अछूतों को मृतक जानवरों को उठाने से मना कर के उनका नुकसान करवा रहा है। केसरी के सम्पादक ने डॉ0 अम्बेडकर से व्यक्तिगत रूप से मिलकर भी यह बात कही तथा उनसे अपनी अपील वापस लेने का अनुरोध किया । बाबासाहब ने कहा कि इसका जवाब मैं उन्हेें किसी सभा मेें दूंगा। डॉ0 अम्बेडकर ने संगमनेर की सभा मेें जहाँ केसरी का वह सम्पादक उपस्थित था उसको सम्बोधित करते हुए कहा कि हमारे लोगोें के पास अन्न, वस्त्र, मकान, जमीन नहीं है इसका क्या कारण है ? उसकी चिंता तुम क्योें नहीं करते हो ? जो मरे हुये गायों-भैंसों के इस लाभ की चिन्ता करते हो। तुम अपने जाति बिरादरी और सम्बन्धियों को यह कहो कि वे मरे हुये गाय भैसोें को उठाकर फेंके और पाँच सौ रुपये वार्षिक लाभ प्राप्त करेें । इसके अलावा ऐसा करने पर उन्हेें मैं पाँच सौ रुपया का इनाम स्वयं दँूगा । इस प्रकार उन्हेें दोगुना लाभ होगा । ऐसे मौके को सम्पादक महोदय मत छोड़ो । हमारा तो नुकसान होगा पर तुमको तो दोगुना लाभ होगा । इसे अपने लोगों से करवाओेे और अपने समाचार पत्र के माध्यम से ऐसा प्रचार करोे । इस पर केसरी का वह सम्पादक वहाँ से उठकर जाने लगा । तिलक और सम्पादक के विरुद्ध नारे लगे । इस ऐलान को केसरी ने अपने पत्रिका मेें प्रकाशित नहीं किया बल्कि यह समाचार दूसरे पत्रिका में छपा। ऐसे थे तिलक और केसरी का सम्पादक ।

गोलवलकर को नसीहत

30 जनवरी सन् 1948 को महात्मा गाँधी की हत्या की गई । इसकी सबसे ज्यादा प्रतिक्रिया महाराष्ट्र में हुई। हत्यारा नाथू राम गोडसे महाराष्ट्र का चितपावन ब्राह्मण था। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सक्रिय सदस्य था।  महाराष्ट्र के गैर-ब्राह्मणों ने, मराठों नेे, महाराष्ट्र के नगरों एवं गाँवों में ब्राह्मणों के घरों को लूटा, उनके घर फूंके गये, उनकी  बहु-बेटियों के  साथ बुरा बर्ताव हुआ। कहीं-कहीं उन्हें जान से भी मारा गया। उन्हें विभिन्न प्रकार से उत्पीड़ित किया गया। महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों से ब्राह्मणों का जत्था बाबासाहब के पास मदद के लिए नई दिल्ली आया। बाबासाहब से मिलकर उनमें से कई लोग फूट-फूट कर रोने लगे कि मराठों  ने उन्हें बर्बाद कर दिया है। बबासाहब उस समय केन्द्रीय कानून मंत्री के पद पर थे।  उन्होंने लोगो को  सांत्वना दी, दुःख प्रकट किया । उन्हें आर्थिक सहायता दी। उन्होंने महाराष्ट्र  सरकार और भारत सरकार से उनके जानमाल की सुरक्षा का अनुरोध किया। वहाँ उपस्थित लोगों से बाबासाहब ने कहा कि जाति और वर्ण व्यवस्था का जो विषवृक्ष तुम्हारे ब्राह्मण पुरखे बो गये हैं उसी का जहरीला  फल अब तुम्हें चखना पड़ रहा है। वहाँ बाबासाहेब ने एक ब्राह्मण नेता को सम्बोधित करते हुए कहा कि जब मैं महाड़ तालाब से पानी लेने का आन्दोलन और नासिक के काला राम मंदिर प्रवेश का आन्दोलन कर रहा था, उस समय क्या तुम मराठा आदि लोगों को मुझे जान से मारने के लिए नहीं भड़काया था ? क्या तुम बढ़ चढ़ कर हमारे आन्दोलन के खिलाफ प्रचार और विषवमन नहीं किया था ? मैंने तुम्हें उस समय चेतावनी दी थी कि जाति-पाति और ऊँच-नीच की दीवारों को तोड़ो, उसे हटाओ, नहीं तो एक दिन ऐसा आयेगा जब तुम्हारी भड़काहट में आनेवाली यही मराठा और गैर-ब्राह्मण तुम्हारा सत्यानाश कर देंगे। वह वयोवृद्ध ब्राह्मण नेता आँसू बहाते हुए बोला, आपका सब कहना सत्य था। आपकी भविष्यवाणी सच हुई। अब हमारे लिए कुछ करो। आप हमारे प्रदेश और देश के नेता हो, हमारे रहनुमा हो। उसी समय राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख सदाशिव गोलवलकर बाबासाहब से मिलने आये और महाराष्ट्र में  ब्राह्मणों पर किये जा रहे अत्याचारों की अपनी व्यथा और सुझाव को मराठी में व्यक्त किया। उनकी बातों को सुनने के बाद बाबासाहब ने कहा, गोलवलकर तुम तो चितपावन ब्राह्मण हो तुम्हारे पुरखे पेशवा महाराज  के राज्य में अछूतांे  को गले में मिट्टी की हंडिया बांधने, कमर में झाड़ू और हाथ में काला धागा बांध कर सड़कों पर चलने का आदेश था ताकि कोई सवर्ण हिन्दू उन पथों पर चलकर या उनसे छुआ कर धर्मभ्रष्ट न हो जाय। तुम्हारा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी तो हिन्दू के नाम पर ब्राह्मण संगठन है। इसमंे न तो  अछूत हैं, न मराठे और न शूद्र। तुम संघ चलाओ, संगठन बनाओ किन्तु यह संगठन जाति पाति और वर्ण व्यवस्था का नाश करने के लिए, समतामूलक हिन्दू समाज के निर्माण के लिए हो। अब तुम हिन्दू- मुस्लिम विद्वेष की साम्प्रदायिकता का एक और विषवृक्ष  बोना आरंम्भ कर दिया है। इन सबका देश पर बहुत ही बुरा प्रभाव होगा।  अपनी पिछली भूल को सुधारो, इसमें मैं तुम्हारा साथ दूँगा।  गोलवलकर खामोशी से बाबासाहब की बात सुनते रहे और अन्त में बिना किसी बात का  उत्तर दिये  चुपचाप उठकर चले गये।

हिन्दू कोड बिल पर करपात्री को कड़ी चुनौती

जब सन् 1951 में हिन्दू कोड बिल पर स्वामी करपात्री के नेतृत्व मेेें भीषण विरोध आन्दोलन चलाया जा रहा था। बाबासाहब ने करपात्री को आकर संस्कृत, हिन्दी या अंग्रेजी मेेें वाद-विवाद की चुनौती दी । करपात्री ने जब कहा कि संन्यासी और स्वामियोें का दर्जा गृहस्थोेें से ऊँचा है। कानून मंत्री मेरे आश्रम निगमबोधी घाट, दिल्ली पर स्वयं वार्ता के लिए आवेें। प्रत्युत्तर मेें बाबासाहब ने लिखा कि मैं मानता हूँ कि संन्यासी गृहस्थ से बड़ा है लेकिन करपात्री तुम संन्यासी कहाँ हो ? तुम तो राजनीति कर रहे हो । संन्यासी को हिन्दू कोड बिल से क्या लेना देना । तुम तो संसारिक झमेले को त्याग चुके हो फिर राजनीति के अखा़ड़े मेें मल्ल बने क्योें बैठे हो ? हिन्दू कोड बिल एक राजनीतिक और विधायी प्रश्न है । तुम आकर शास्त्रार्थ कर सकते हो । यदि तुम्हें मेरे साथ छूने या सीधी बातचीत से परहेज है तो गरम पानी और परदे का प्रबन्ध करवा दूँगा। स्वामी करपात्री ने संदेशवाहक को बाबासाहब से मिलने का वायदा किया पर मिलने नहीं गये ।

हाजिर जवाब बाबा साहेब 

पं0 मदन मोहन मालवीय ने हास्य विनोद मेेें ही कहा कि डॉ0 अम्बेडकर तुम्हारे लोगोेें का रंग बहुत काला होता है इसलिए सवर्ण हिन्दू इनसे नफरत और भेदभाव करते हैं । तुम ऐसा करो कि जब अछूत स्त्रियां गर्भवती होती हैं तो उन्हें कीकर के छिलके का पावडर खाने की सलाह दो। क्योंकि ऐसा करने से पेैदा होने वाले बच्चे का रंग गोरा होगा और सवर्ण हिन्दू इनसे घृणा नहीं करेंगे । बाबासाहब ने झट कहा कि मालवीय आंध्र,मद्रास,केरल आदि के ब्राह्मणोें का रंग प्रायः अछूतोें से भी काला होता है। यही नहीं तुम्हारे इलाहाबाद और काशी मेें भी बहुतेरे काले ब्राह्मण हैं, तुम पहले यह नुस्खा उन गर्भवती ब्राह्मण स्त्रियोें पर क्यों नहीं आजमाते हो ? मालवीय जी यह सुनकर खिलखिला कर हंसे और कहे कि आखिर हो तो वकील ही न । ऐसे थे हाजिरजवाब  बाबासाहब ।

गाँधीजी की कथनी करनी पर हमला

दोहरे गुलामोेें की मुक्ति और लोकतांत्रिक मूल्यांें के लिए आजीवन संघर्ष करने वाले महापुरुष ने अपने युग के श्रेष्ठ और प्रभावशाली व्यक्ति गाँधीजी को चुनौती दी । जाति और वर्ण व्यवस्था की मान्यताओेेें के लिए गाँधी को ढोंगी और पाखण्डी कहते हुए उनकी कथनी और करनी को ललकारा । उन्होंने कहा कि गाँधी जाति और वर्ण व्यवस्था को मानते हैं तो गाँधी स्वयं तराजू क्यों नहीं पकड़ते ? वे बनिया का व्यवसाय क्यों नहीं करते हैं ? वे किसे उपदेश दे रहे हैं। वे कभी महात्मा,कभी राजनेता क्यों बने फिर रहे हैं ? इस चुनौती ने गाँधीजी को अन्दर तक हिलाकर रख दिया । गाँधीजी को अपनी बहुत सी मान्यताओें को बदलना पड़ा । अछूतोद्धार आदि के विभिन्न कार्यक्रम चलाये गये । जाति और वर्ण व्यवस्था के सम्बन्ध मेें गाँधीजी के विचारों मेें परिवर्तन हुआ । वे जाति के खिलाफ हुए पर वर्ण से कुछ वर्षो तक चिपके रहे और अन्त मेेें उसके भी खिलाफ हो गये । जब गाँधीजी से इस मत परिवर्तन के बारे में पूछा जाता था तो उनका जवाब होता था कि यह सत्य का प्रयोग है। मेरे वर्तमान कथन को सत्य मानो, पिछला भूल जाओ।

गाँधीजी ने अपनाए बाबासाहब के वचन  

गाँधीजी जीवन के अंतिम समय मेें जाति और अन्तर्जातीय विवाहोें के सम्बन्ध मेेे अम्बेडकर के विचारोें को अपना लिया और 6 मई सन् 1945 को अपने सहयोगी नरहरि पारिख को लिखा कि ’’हमें अतिशूद्र और सवर्ण हिन्दू के विवाह को बिना हिचक सर्वोच्च प्राथमिकता देनी चाहिए।’’ गाँधीजी ने 9 मई 1945 को पुनः एक सामाजिक कार्यकर्ता को लिखा कि ”अगर वह शादी एक ही जाति विरादरी मेें हो रही है तो मुझसे आशिर्वाद मत मांगो । मैं आशिर्वाद तभी दूँगा जब लड़की किसी और समुदाय की होगी ।“ 20 जुलाई 1946 को हरिजन सेवक संघ के एक कार्यकर्ता के प्रश्न के उत्तर में गाँधीजी ने कहा कि उसकी कोई अविवाहित बेटी हो और यदि शुद्ध सात्विक धार्मिक भावना से वे उसकी शादी हरिजन से करें, तो मुझे बहुत प्रसन्नता होगी और मैं उन्हें बधाई दूँगा ।  डॉ0 अम्बेडकर ओजस्वी वाकपटु और व्यंग्य तीर चलाने मेेें महारथी थे । संत कबीर की तरह विरोधियोें के ठीक विरुद्ध किनारे पर खड़े होकर तीर चलाते थे । कोई विरोधी उनके वाणोें (तर्को) का उत्तर देने की स्थिति मेेें नहीं रहता था । ढोेंगियोें और कुरीतियोें पर उनका जवाब मुँहफट और चुभनेवाली हुआ करती थी । उनके भाषण विचारोत्तेजक और सार्वजनिक जीवन के पाखण्डोें का पर्दाफाश करने वाले होते थे ।  उनकी मान्यता थी कि सतत् परिश्रम और मितव्ययिता के व्यवहार से मनुष्य को जीवन मेेें सफलता मिलती है। बहता हुआ पानी और गुजरता हुआ समय लौटकर नहीं आता है इसलिए उन दोनोेें का समय पर सदुपयोग बाबासाहब ने हमेशा किया ।

देश प्रेमी बाबासाहेब  

डॉ0 अम्बेडकर मेेेें देश प्रेम और राष्ट्रीयता कूट-कूट कर भरी हुई थी । वे प्रान्तीयता और क्षेत्रवाद के कटु आलोचक थे । 4 अप्रैल 1938 को बम्बई विधान सभा मेेेें बोलते हुए उन्होंने कहा था कि मुझे अच्छा नहीं लगता जब कुछ लोग कहते है कि हम पहले भारतीय हैं और बाद मेेें हिन्दू अथवा मुसलमान । मुझे यह स्वीकार नहीं । धर्म, जाति भाषा आदि की प्रतिस्पर्धी निष्ठा के रहते हुए भारतीयता के प्रति निष्ठा पनप नहीं सकती है। मैं चाहता हूँ कि लोग पहले भी भारतीय हों और अन्त तक भारतीय रहें, भारतीय के अलावा कुछ नहीं। डॉ0 अम्बेडकर के अन्तःकरण से निकले यह शब्द उनकी राष्ट्रीय निष्ठा की अभिव्यक्ति थी जो बड़े बड़े राष्ट्रवादियोेेेें मेें भी मिलना मुश्किल है। यदि अम्बेडकर चाहते तो अंग्रेजोेें की मदद से एक तीसरे देश के अस्तित्व को अमल मेेें ला सकते थे पर उन्होेंने गाँधीजी के साथ समझौता(पूना पैक्ट)कर देश की एकता और राष्ट्रीयता को मजबूत किया । उन्होंने जिन्ना का अनुसरण नहीं किया । यह उनके राष्ट्रीय व्यक्तित्व का अनोखा पहलू है।

बाबा साहब का पुस्तकालय

बाबासाहब का व्यक्तिगत पुस्तकालय एशिया के व्यक्तिगत पुस्तकालयोेें मेें सबसे बड़ा था । जिसमेेें दुर्लभ पुस्तकों का बेमिसाल संग्रह था। सन् 1940 में मालवीयजी ने वे पुस्तकेें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी के लिए बाबासाहब से दो लाख रुपये मेेें खरीदने का अनुरोध किया था जिसे बाबासाहब ने अस्वीकार कर दिया था । ऐसा था उनका व्यक्तिगत पुस्तकालय । इन पुस्तकोें मेेें से अधिकांश पुस्तकों को सिद्धार्थ कालेज बम्बई और मिलिन्द कॉलेज औरंगाबाद के पुस्तकालयोेें को उन्होंने दान दिया ।

दलितों-पिछड़ों को सिखाया संघर्ष का मार्ग 

डॉ0 अम्बेडकर की पहली महत्वपूर्ण विशेषता है कि उन्होंने अछूतोें-पिछड़ोें मेें मानव अस्तित्व की चेतना को जागृत किया । अधिकार के लिए संघर्ष की प्रेरणा दी । याचकोेें को याचना और गुलामी की मानसिकता छोड़ने के लिए प्रेरित किया । दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता है कि डॉ0 अम्बेडकर ने अधिकारोेें के लिए सामाजिक ही नहीं बल्कि राजनीतिक मंच से भी संघर्ष का विगुल फूंका । तीसरी विशेषता यह है कि प्रादेशिक स्तर पर चलने वाले अछूतोें के संघर्ष को राष्ट्रीय समस्या के रुप मेें राष्ट्रीय स्तर पर विस्तारित किया । विभिन्न राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर अछूतों के मानवाधिकार एवं उनकी समस्याओेें को वैज्ञानिक तर्क और बुद्धिनिष्ठा से उठाया । चौथी विशेषता यह है कि डॉ0 अम्बेडकर ने धार्मिक मोर्चे पर भी संघर्ष छेड़ा और कहा कि अछूतोें के शोषण का कारण हिन्दू धर्म है। अतः इन्सानियत और समान व्यवहार का दर्जा न देने वाले हिन्दू धर्म का त्याग कर समानतावाले धर्म को स्वीकार करेें जहाँ आत्मगौरव, शान्ति और सुरक्षा मिले । पाँचवीं विशेषता यह है कि सरकारी संस्थाओें मेें अछूतोें को सुरक्षित स्थान दिये जंाय। विधायिका मेें आरक्षण, शिक्षण संस्थाओें मेें प्रवेश, छात्रवृत्ति और आर्थिक संसाधनोें मेेें भागीदरी सुनिश्चित की जाय। इन प्रश्नोें को मानवाधिकार एवं सामाजिक-राजनीतिक समानता और भागेदारी के साथ जोड़कर डॉ0 अम्बेडकर ने इसे राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केन्द्रबिन्दू बनाया । देश के कर्णधारोेें को इसका समाधान करने के लिए विवश किया। डॉ0 अम्बेडकर ने यह भी एहसास कराया कि बिना जुझारु संगठन और मानवाधिकार प्रेमियोें के सहयोग के अछूतोें का उद्धार नहीं होगा । इसके लिए उन्होंने सन् 1920 मेें बहिष्कृत हितकारिणी सभा की बुनियाद रखी जिसका उद्देश्य अछूतोेें मेें शिक्षा प्रसार, कुरीतियोें को दूर करना,रोजगार के अवसरोें को बढ़ाना तथा मानवाधिकारोेें के लिए संघर्ष करना प्रमुख था। उनकी मान्यता थी कि हक प्राप्त करने के लिए लड़ना पड़ता है, कुर्बानी देनी पड़ती है तथा जीतने का कौशल सीखना पड़ता है। मांगने से भीख मिलती है, अधिकार और स्वतंत्रता नहीं। अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए डॉ0 अम्बेडकर ने बहुआयामी स्तरोेें पर कार्य किया। पहला विदेशी शासन से संघर्ष, कभी गरम, कभी नरम । दूसरा हिन्दू समाज और उसकी प्रतिनिधि संस्था कांग्रेस और गाँधीजी से संघर्ष और तीसरा अपने समाज को समय समय पर संगठित और संघर्ष के लिए प्रेरित करना तथा अपने समाज के विभीषणों से भी समय-समय पर निपटते रहे । डॉ0 अम्बेडकर की मान्यता थी कि धर्म और राजसत्ता के बल पर दलितोेें-पिछड़ोें को गुलाम बना कर रखा गया है । उनके चहुँमुखी विकास के रास्ते मेेें धर्म के नाम पर बड़े बड़े अवरोधक खड़े किये गये । राजसत्ता और धार्मिक मामले मेेेें भागीदारी से वंचित किया गया । उन्हीें अवरोधोें को हटाने के लिए विविध उपायोें के साथ बाबासाहब आजीवन संधर्षरत रहे । डॉ0 अम्बेडकर सम्पूर्ण वांड्.मय उनके जीवन संघर्ष एवं उपलब्धियोें का दस्तावेज है, नये भारत के निर्माण का ब्लू प्रिंट है। पूना पैक्ट 1932, एक व्यक्ति: एक वोटःएक मूल्य और भारतीय संविधान के निर्माण मेेें उनके योगदान चिरकाल तक अविस्मरणीय रहेंगेे।

डॉ0 अम्बेडकर ने ‘‘शिक्षित बनो, संगठित होओ और संघर्ष करोे

सफलता अवश्यम्भावी है’’ का उत्साहवर्द्धक नारा दिया। उन्होंने दलितोें की विभिन्न उपजातियोेें को अनुसूचित किया और उन्हेें आपसी भेदभाव दूर करने को प्रेरित किया । राजसत्ता पर अधिकार करने की भावना पैदा की। उन्हें एकजुट करने के लिए धर्मपरिवर्तन का संदेश दिया-एक जाति बनो, मानव बनो का आह्वान किया । डॉ0 अम्बेडकर कबीर, फूले, गोखले और रानाडे की परम्परा के महापुरुष थे जिन्होंने हमारे देश को एक ऐसा संविधान दिया जो सामाजिक क्रान्ति का दस्तावेज है। यह न्यायविद डॉ0 अम्बेडकर का भारतीय समाज को दिया गया एक नायाब तोहफा है। बाबासाहब का जीवन संघर्श आदि से अंत तक प्रेरणादायक और स्फूर्तिदायक है। उनके जीवन के प्रसंगोें को काव्य मेें उद्धृत किया जा सकता है। उनका सम्पूर्ण जीवन अपने आप मेें एक महाकाव्य है।

बाबासाहब का मिशन अधूरा

डॉ0 अम्बेडकर के सामाजिक क्रान्ति का मिशन अभी पूरा नहीं हुआ है । उसमें बहुत काम बाकी है, सफर लम्बा है तथा रास्ता आसान नहीं है। बाबा ने हमें रास्ता दिखाया,एक स्पष्ट दिशा दी, निदेश दिये और उसे पूरा करने की जिम्मेवारी अगली पीढ़ी को सौंपते हुए यह कहा था कि ‘’मैंने तुम्हारे लिए जो कुछ भी किया है, वह बेहद मुसीबतों, अत्यन्त दुखोें और बेशुमार विरोधियोें का मुकाबला करके किया है। यह कारवां आज जिस जगह है, मैं इसे बड़ी मुसीबतोें के साथ लाया हूँ । तुम्हारा कर्त्तब्य है कि यह कारवां सदा आगे ही बढ़ता रहे, बेशक कितनी रुकावटें क्यों न आये । यदि मेरे अनुयायी इसे आगे न बढ़ा सकें तो उसे यहीं छोड़ देें पर किसी भी हालत मेें पीछे न जाने दें । आप लोगोें से मेरा यही संदेश है।

डॉ0 अम्बेडकर के निधन के बाद दलितोंें के पढे़ लिखे तबके और बहुसंख्यक उपजातियोें वाले दलित सबकी हकमारी करने लगे, जिस कारण महादलित की चर्चा होने लगी । आज हिन्दू धर्म की चातुर्वर्ण व्यवस्था सभी वर्गो को प्रभावित किये हुए है। उच्च वर्ण मेें चार जातियों का प्रभुत्व तो है ही, पिछड़े वर्गो मेें भी चार ही जातियोें का वर्ण व्यवस्था बन गया । उसी तरह दलितोें मेें भी चातुर्वर्ण व्यवस्था घर कर गई है। बाबासाहब के जातिविहीन समाज बनाने के सपने को उनके अनुयायी अपने क्षणिक स्वार्थ के लिए क्यों दफना रहे हैं ? क्या बाबासाहब का यही सपना था ? क्या उनका यही संदेश है ? डॉ0 अम्बेडकर के मिशन को आगे बढ़ाने की महती जिम्मेवारी उनपर है जो उनके आन्दोलन से लाभान्वित होकर बेहतर स्थिति मेेें है। उन्हें बाबासाहब के ‘ पे बैक टू सोसाईटी ’ अर्थात समाज के नाम पर लिए गए ऋण (लाभ ) को सूदसहित लौटाओ, को ध्यान में रखकर कार्य करना होगा । उन्हें यह एहसास होना चाहिए कि उनके नीचे अभी भी बहुत बड़ी संख्या वैसे लोगोें की है जो लगभग गुलामी का सा जीवन व्यतीत कर रहे हैं। इन लोगों की बेहतरी के लिए हम अपने क्षमतानुसार कार्य करें ,अपना दायित्व निभाएं। इसके अतिरिक्त इसका दायित्व देश के उन प्रबुद्ध लोगोें पर भी आती है जो देश के लिए सोचते हैं। अम्बेडकर का मिशन देश की एकता, अखण्डता और खुशहाली का है, सारे भारतीय समाज की भलाई का है। उनका मिशन भारतीय समाज को रुढ़ियों, अंधविश्वासोें और जड़ताओें से मुक्त कर उदार, बौद्धिक और वैज्ञानिक समाज बनाने का है । उनके मिशन को पूरा करने की दिशा मेेें किया जानेवाला प्रयत्न ही बाबासाहब डॉ0 अम्बेडकर के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी ।

 ( इस आलेख में सोहन लाल शास्त्री की पुस्तक ’’बाबासाहब के सम्पर्क में 25 वर्श ’’ द्वितीय संस्करण 1975  तथा मधु लिमये की पुस्तक ’’ डॉ0 अम्बेडकर: एक चिंतन ’’ वर्श 1990 से संदर्भ लिया गया है ) ।     

  • ई0 राजेन्द्र प्रसाद
  • लेखक : एक सामाजिक चिंतक हैं मो॰-09472575206       

rgautamlko@gmail.com

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