चुनाव में नकली शराब खपाने की जुगत में माफिया

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  • कार्यकर्ताओं को खुश करने व वोट बैंक बढ़ाने में मदिरा का अहम रोल
  • मुफ्त में पीने को मिले तो शराबी नहीं करता असली व नकली का भेद

लखनऊ। लोकसभा चुनाव की रणभेरी बज चुकी है। सभी प्रत्याशी कार्यकर्ताओं को खुश रखने व वोट बैंक को मजबूत करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रहे है। इनमें शराब का अहम रोल माना जाता है। इसी मौके की नजाकत को भांफकर शराब माफिया चुनाव के दौरान नकली अंग्रेजी व देशी शराब की खेप को खपाने की जुगत में लगे हैं। अब जब चुनाव में मुफ्त में मदिरा पीने को मिले तो पीने वाले भी गटकते चले जाते हैं। ऐसे में फ्री में जाम लड़ाने वालों पर नकली शराब कहीं जानलेवा न साबित हो जाए। अभी हाल में ही पुलिस ने कई जगह छापेमारी करनकली शराब बरामद की है। इधर नकली शराब की आवक पर आबकारी विभाग मौन साधे है। इतना ही नहीं, इससे प्रदेश में राजस्व को प्रति वर्ष करोड़ों की चपत लग रही है। लोस चुनाव के मद्देनजर जिस तरह पुलिस करेन्सी व असलहे जब्त कर रही है। इसी तरह शराब की खेप पर भी पुलिस ने निगरानी तेज कर दी है।

पुलिस के एक अधिकारी का मानना है कि चुनाव में आम दिनों की अपेक्षा शराब की खपत ज्यादा होती है। प्रदेश में अन्य राज्यों की अपेक्षा शराब की कीमत ज्यादा है। यहां पर शराब की दुकानों को लाटरी के माध्यम से दिया जाता है, तब सभी दुकानों की लाइसेंस फीस व एक साल में शराब उठान (खरीदारी) का कोटा फिक्स कर दिया जाता है। ऐसे में प्रदेश की बहुत सी ऐसी दुकानें हैं जहां पर शराब की बिक्री अधिक है लेकिन कोटा इनका कम है। कम कोटे की दुकानों के मालिक अपने सेल्समैन के माध्यम से बाहर से पैकिंग की गयी शराब को लाकर दुकान में रख लेते हैं। सेल्समैन ग्राहकों को देखकर बाहर की पैकिंग शराब बेचते हैं। मजे की बात यह है कि उन शराब की बोतलों में भी फर्जी होलोग्राम भी लगे होते हैं। कभी-कभी ग्राहक शराब के स्वाद में अन्तर पाता है तथा दुकानदार से इसकी शिकायत करता है तो दुकानदार यह कहकर झगड़ा करने पर आमादा हो जाता है कि शराब की बोतल खुल गयी तो मेरा क्या दोष है। चुनाव के समय डुप्लीकेट शराब की धड़ल्ले से खपत होना आसान बात है क्योंकि प्रचारकों व छुटभैया कार्यकर्ताओं को नेता जी के लोग निशुल्क मदिरा उपलब्ध कराते हैं। जब पीने वाले की जेब से पैसा नहीं लगता है तो वह भी शान्त होकर गटकता रहता है। प्रदेश की शराब की दुकानों पर अंग्रेजी शराब की क्वार्टर, हाफ व बोतल की जो पैकिंग होती है वह वास्तविक कम्पनी की तरह नहीं होती है। इन बोतलों को उल्टा करने के बाद इसमें से शराब की लिकेज होती है। डुप्लीकेट होने की यह भी एक निशानी है। आबकारी व पुलिस विभाग अभियान चलाकर नकली शराब के कारोबारियों की नकेल कसते रहते हैं। बाजार में तरह-तरह की ब्राण्डों के शराब की ज्यादा खपत रहती है। शराब माफियाओं की नजर भी इन्हीं शराब के क्वार्टर बोतल पर रहती है। माफिया जानते है कि लोग जल्दी में आते हैं तथा पीकर शीशी को फेक देते हैं। कोई भी आदमी बहुत जहमत नहीं उठाता है। सूत्रों का कहना है कि इस तरह की शराब ड्रमों में भरकर प्रदेश के कुछ चुनिंदा जगह पर लायी जाती है, जहां बाद में पैकिंग मशीन से पैककर फर्जी होलोग्राम लगा दिया जाता है। फिलहाल इस धंधे से प्रदेश सरकार को करोड़ों के आबकारी टैक्स की चपत लगायी जा रही है। अगर यह धंधा फलता-फूलता रहा तो कभी भी इस तरह की शराब पीने से बड़ा हादसा हो सकता है।

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