21 September, 2018

माया-अखिलेश ने तैयार किया भाजपा को चित्त करने का फार्मूला 

Mayawati, Akhilesh yadav, BJP

शिशुपाल सिंह

लखनऊ। वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने और पीएम पद की दावेदारी के लिए बसपा सुप्रीमो मायावती कील-कांटा लेकर  रणनीति बनानी शुरू कर दी है। कर्नाटक और यूपी की दो लोकसभा सीट पर प्रयोग के बाद अब देश के दूसरे राज्यों के छोटे और प्रभावशाली राजनीतिक दलों के साथ गठबंधन की राजनीति पर फोकस करना शुरू कर दिया है। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि अगर गठबंधन चुनावी मैदान में एक साथ उतरा तो भाजपा एक अंकों की सीटें तक सिमट जाने की संभावना है।
बसपा सूत्रों का कहना है कि बसपा ने काफी अनुभव के बाद अब फिर से गठबंधन की राजनीति पर फोकस किया है। बसपा की इस बदली रणनीति से जहां बसपा सुप्रीमो मायावती की चर्चा देश में शुरू हो गई है वहीं अन्य क्षेत्रीय पार्टियों के नेताओं में मायावती की स्वीकार्यता भी बढ़ी हैं। फूलपुर और गोरखपुर सीट पर बसपा द्वारा अपने वोट को सपा को ट्रांसफर करवाए जाने की रणनीति से सपा मुखिया अखिलेश यादव भी बाग-बाग हैं। राज्यसभा सीट पर बसपा प्रत्याशी की हार के बावजूद आगामी लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन के ऐलान के बाद से सत्तारूढ़ दल भाजपा में हलचल मच गई है। इसकी एक वजह यह है कि भाजपा ने 2014 के चुनाव में यूपी की 89 सीटों में से 71 सीटें जीतीं जबकि उसके गठबंधन में शामिल अपना दल ने दो सीटों जीती थी।
भाजपा को इस चुनाव में 61 सीटों का फायदा हुआ और वोट प्रतिशत 42.3 पर जा पहुंचा। उस समय यूपी में सत्तारूढ़ सपा मात्र पांच सीटों पर जीत सकी। उसे 18 सीटों का नुकसान हुआ और उसका वोट प्रतिशत 1.06 प्रतिशत घटकर 22.20 फीसदी पर पहुंच गया था। बसपा इस चुनाव में शून्य पर आ गई। उसे 20 सीटों का नुकसान हुआ और उसका वोट 7.82 प्रतिशत घटकर 19.6 फीसदी पर आ गया। कांग्रेस को दो सीटों पर जीत मिली और उसे 19 सीटों का नुकसान उठाना पड़ा। उसका 10.75 प्रतिशत वोट घटकर 7.5 फीसदी पर आ गया।
सूत्रों के मुताबिक भाजपा के विजय रथ को रोकने के लिए सपा-बसपा में सीटों पर लगभग सहमति बन चुकी है। फिलहाल तय हुआ है कि सपा को उसकी जीती सीटों के साथ ही भाजपा के मुकाबले दूसरे स्थान पर रही सीटें 2019 के लोकसभा चुनाव में मिलेंगी। इसकी संख्या 36 होती है। इसी तरह बसपा को दूसरे नम्बर वाली 34 सीटें मिलेंगी। इन तथ्यों से दोनों दलों के खाते में 70 सीटें आयेंगी। रालोद को एक सीट मथुरा जो वह दूसरे स्थान पर रही दी जा सकती है। ज्यादा रहा तो समझौते में रालोद को बागपत सीट भी दी जा सकती है। इस पर 2014 में सपा दूसरे नम्बर पर रही थी। वाराणसी में अपना दल के केजरीवाल दूसरे नम्बर पर रहे थे। मगर अभी इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है। भरोसेमंद सूत्रों की मानें तो सपा-बसपा में दो-तीन अन्य सीटों पर छोटे दलों पीस पार्टी, अपना दल (कृष्णा गुट) महान दल आदि को जोडऩे के लिए भी सहमति बन सकती है। इस गठबंधन की कोशिश योगी सरकार की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी सुभासपा को भी अपने साथ लेने की होगी। फिलहाल कांग्रेस को लेकर सपा-बसपा में कोई सहमति नहीं बनी है। कांग्रेस की जीती दो और दूसरे नम्बर पर रही छह सीटों को छोड़ा गया है। इस तरह देखें तो आगामी लोकसभा चुनाव में यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो भाजपा को मुश्किल हो सकती है, क्योंकि इस गठबंधन का वोट 50 फीसदी के आंकड़े को छु रहा है।
राजनीतिक विश्लेषक वगीश धर द्विवेदी का कहना है कि बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा मुखिया अखिलेश यादव अब खुलकर गठबंधन के पक्ष में बोलने लगे हैं। सपा-बसपा में सीटों का बंटवारा लगभग हो चुका है। कुछ माह के अंदर ही प्रत्याशी भी तय कर दिए जाएंगे। इस गठबंधन पर सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने अभी तक कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन सपा और बसपा के गठबंधन को लेकर काफी उत्साहित हैं। मुलायम सिंह यादव ने कई बार प्रयास किए हैं, लेकिन गठबंधन के लिए बसपा सुप्रीमो को नहीं मना पाए।

 

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