17 August, 2018

यूपी में शोपीस बनकर रह गए हैं एमओयू!

Memorandum of Understanding have become a showpiece in Uttar Pradesh!

श्रवण शुक्ला

लखनऊ। जिस तरह अखिलेश यादव सरकार में औद्योगिक विकास विभाग के अफसरों ने एमओयू रूपी निवेश का मायाजाल रचा कर सरकार और जनता को खूब सब्जबाग दिखाए और जमकर वाहवाही लूटी वहीं खेल अब योगी सरकार में शुरू हो गया है। पूर्व सरकार में लगभग 50 एमओयू में मात्र दो से तीन ही धरातल पर आ पाए हैं, बाकी सब एमओयू शोपीस बन कर रह गए हैं। अब फिर यूपी में निवेश लाने के लिए योगी सरकार के अफसर देश के राज्यों में छह रोड शो कर लगभग ढाई लाख करोड़ रुपए के निवेश का आंकड़ों का गुब्बारा पेश कर रहे हैं। लेकिन मुख्य सचिव की समीक्षा बैठक ने औद्योगिक विकास विभाग के माथे पर पसीना ला दिया है। इससे चार साल में एक भी एमओयू धरातल पर न पाने के कारण यूपी में निवेश के सतरंगी मायाजाल का बुलबुल फूट गया है। आरटीआई ने जहां औद्योगिक विकास विभाग के आला अफसरों के कारनामों को उजागर कर दिया है वहीं निवेश के मुद्दे पर चुप्पी साध ली है।

Memorandum of Understanding  have become a showpiece in Uttar Pradesh!बताते चलें कि यूपी में में निवेश पर ढोल-मंजीरा लेकर ढिंढोरा पीटने वाले औद्योगिक विकास विभाग और उद्योग बंधु सेे जनसूचना अधिनियम 2005 के तहत प्राप्त सूचनाओं ने पोल खोल दी है। प्रदेश के उद्यमियों की समस्याओं का निराकरण और निवेश को बढ़ावा देने के लिए 20 मई 2013 को जारी शासनादेश के जरिए राज्य, मण्डल और जिले स्तर की समितियों का पुनर्गठन किया गया था। राज्य स्तरीय प्राधिकृत समिति की मुख्यमंत्री अध्यक्षता में साल में एक बैठक आहूत किए जाने की बात कहीं गई थी। आरटीआई में मिले जवाब में कहा गया है कि 15 मार्च 2012 से लेकर 15 फरवरी 2017 तक मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली न तो कोई बैठक हुई और न ही कोई उद्यमी प्रतिनिधि शामिल हुआ। जबकि इस दौरान मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली तीन बैठकें हुई और आईआईए, एसोचैम, पीएचडीसीआईआई और सीआईआई के प्रतिनिधि शामिल हुए।

उद्यमियों को लुभाने के लिए सरकार ने दिल्ली, मुम्बई और आगरा में बिजनेस कंक्लेव आयोजित किए।  इन बिजनेस कंक्लेव में भारी संख्या में उद्यमियों ने भाग लिया। दावा किया गया कि इन बिजनेस कंक्लेव के जरिए उद्यमियों ने प्रदेश में निवेश करने के लिए बहुत एमओयू किए गए। जिससे प्रदेश में हजारों करोड़ रुपए निवेश होगा और लोगों को रोजगार मिलेगा। लेकिन उद्योग बंधु से प्राप्त सूचना अलग असलियत बयां कर रही है। उद्योग बंधु ने मात्र 50 कम्पनियों और फर्मो का ब्यौरा दिया है। यह ब्यौरा दिल्ली में हुए बिजनेस कंक्लेव का है। जिसमें मात्र एक या दो एमओयू धरातल पर आए हैं। श्रीसीमेंट और पासवारा पेपर प्रोजेक्ट ही धरातल पर आ पाए हैं। बाकी सभी एमओयू शोपीस बन कर रह गए हैं। औद्योगिक विकास विभाग के सूत्रों का कहना है कि ये सभी एमओयू पूर्व प्रमुख सचिव संजीव सरन के कार्यकाल में हुए थे। पूर्व प्रमुख सचिव ने सरकार का करीबी बनने और विश्वास जीतने के लिए उद्यमियों को पकड़-पकड़ कर एमओयू कराए थे। इसी वजह से अधिकतर एमओयू साकार नहीं हो पाए। 

सूत्रों का कहना है कि आगामी 21 और 22 फरवरी को लखनऊ में होने वाले बिजनेस समिट के दिल्ली रोड शो में 44,201 करोड़, बैग्लौर रोड शो में 5,950 करोड़, हैदराबाद रोड शो में 11,645 करोड़, मुम्बई रोडशो 1,25,200 करोड़, कोलकाता रोड शो में 30,135 करोड़ और अहमदाबाद के रोड शो के जरिए 10,000 करोड़ के निवेश प्रस्ताव यूपी को मिले हैं। औद्योगिक विकास विभाग के प्रमुख सचिव आलोक सिन्हा का कहना है कि अभी यह बता पाना मुश्किल है कि बीते पांच सालों में कितने एमओयू हुए और कितने साकार। लेकिन यह भी देखना जरूरी है कि दूसरे राज्यों में एमओयू के कंर्वजन का प्रतिशत कितना है।

मुख्य सचिव की सख्ती से पसीना-पसीना हुए अफसर

Memorandum of Understanding  have become a showpiece in Uttar Pradesh!बीती 16 जनवरी को यूपी इंवेस्टर्स सम्मिट की हुई समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव राजीव कुमार ने औद्योगिक विकास विभाग के अफसरों को निवेश प्रस्तावों के आंकड़ों पर सख्ती बरते हुए निर्देश दिए कि बीते पांच सालों में प्रदेश में कितने एमओयू हुए हैं और कितने धरातल पर आए हैं। उसकी रिपोर्ट तलब की है। मुख्य सचिव कहा कि निवेश प्रोत्साहन बोर्ड की बैठक में हरियाणा के एक उद्योगपति जगदीश खट्टïर उनसे कहा कि पहले आप अपना घर संभाले, फिर बाहर के लिए प्रयास करें। उनका कहने का ताप्पर्य यह था कि यूपी में जिन निवेशकों ने निवेश किया है और एमओयू किया है सरकारी तंत्र की लापरवाही से काफी बुरा हाल है। पांच साल में हुए निवेश का रिकार्ड उपलब्ध कराएं, तब फिर समीक्षा होगी। मुख्य सचिव के इस निर्देश से औद्योगिक विकास विभाग के अफसरों के पसीना आ गया है। सूत्रों का कहना है कि अब कि औद्योगिक विकास विभाग इस बात के कोई रिकार्ड नहीं बना पाया है कि कितने एमओयू हुए और कितने साकर हुए हैं। 

माल ए मुफ्त, दिल ए बेरहम जैसा हाल है उद्योग बंधु का

नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाने का पाठ सीखना है तो आप उद्योग बंधु की ओर रुख कर सकते हैं। भले ही अपने मूल दायित्व का भली-भांति निर्वाहन न कर पा रहा हो, लेकिन गलत को सही कैसे किया जाए, इसमें विशेषज्ञता हासिल कर ली है। इसी विशेषज्ञता के कारण जहां नोएडा प्राधिकरणों से मिली रकम से उद्योग बंधु के आला अफसर मौज कर रहे हैं वहीं सुख-सुविधाओं और विदेश यात्राओं के नाम पर सरकारी धन की लूट की जा रही है। इस प्रकरण पर उद्योग बंधु से लेकर शासन तक के अफसरों ने चुप्पी साध ली है। बताते चलें कि वर्ष 1986 में उद्योग बंधु की स्थापना प्रदेश में उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए की गई थी। अब यह उद्योग बंधु मात्र सफेद हाथी बन कर रह गया है। इस सफेद हाथी को पालने के लिए सरकार को प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए खर्च करने पड़ते हैं। उद्योग बंधु को सरकार कोई बजट आवंटित नहीं करती हैं। लेकिन उद्योग बंधु को अपनी सेवाओं के नाम पर यूपीएसआईडीसी, नोएडा अथारिटी और ग्रेटर नोएडा अथारिटी से लगभग तीन-चार करोड़ रुपए मिलते हैं। उद्योग बंधु इस रकम को कर्मचारियों-अधिकारियों के वेतन के साथ अन्य मदों पर खर्च करता है। उद्योग बंधु के आला अफसर उद्योग बढ़ावा देने के नाम पर बड़े-बड़े बिजनेस कंक्लेव करवाता है, जिसका पूरा खर्च  यूपीएसआईडीसी, नोएडा अथारिटी और ग्रेटर नोएडा अथारिटी तथा सरकार उठाती है। कार्यक्रम के नाम पर मिलने वाली रकम से उद्योग बंधु के तथाकथित निदेशक जमकर दुरुपयोग करते हैं। अर्हता न रखने के बावजूद वाहन सुविधा के साथ ही हवाई यात्राओं की सुविधा प्रदान की जा रही है। इन सुविधाओं पर प्रतिवर्ष लाखों रुपए खर्च किए जा रहे हैं। उद्योग बंधु सूत्रों का कहना है कि जिन कर्मचारियों को निदेशक का पदनाम दिया गया है, वे उद्योग बंधु के लिए बोझ हैं। न तो उस पद के लिए अर्हता रखते     हैं और न ही निवेश बढ़ाने की क्षमता। निदेशक का पदनाम हासिल करते ही ये तथाकथित निदेशक अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए साम, दाम, दण्ड और भेद का सहारा ले रहे है। सचिवालय प्रशासन की मनाही के बावजूद उद्योग बंधु के तथाकथित निदेशकों का सचिवालय प्रवेश पत्र जारी हो गया है।

 

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