14 December, 2018

मुलायम-अखिलेश के चरखा दांव से घनचक्कर बने शिवपाल यादव

Mulayam, Akhilesh, Charkha Danv, Shivpal Yadav
 योगेश श्रीवास्तव 
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर समाजवादी कुनबे में चल रहा शीत युद्घ सुर्खियों में है। सपा के कद्दावर नेता रहे समाजवादी सेक्युलर मोर्चे के प्रमुख शिवपाल यादव के अब तक के उन सारे दावों की हवा निकल गई जिसमें वे मुलायम सिंह यादव का आर्शीवाद होने का दावा कर रहे थे। पिछले दिनों दिल्ली के जंतर-मंतर में आयोजित विरोध प्रदर्शन में अखिलेश यादव के साथ मंच साझा करके मुलायम सिंह यादव ने शिवपाल समेत सपा समर्थकों संकेत दे दिया कि वे अपने पुत्र अखिलेश के ही साथ है बावजूद इसके समाजवादी सेक्युलर मोर्चे के नेता समर्थक कार्यकर्ता हताश-निराश नहीं है, उनका मानना है कि इसके बाद भी उनका या मोर्चे का कोई नुकसान होगा बल्कि इससे सपा प्रभाव वाले क्षेत्रों में लोगों की सहानुभूति का लाभ शिवपाल यादव का अवश्य मिलेगा।
नवंबर 2016 से समाजवादी कुनबे में जो रार शुरू हुई इसकी परिणीत यह रही विधानसभा चुनाव में पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा और पार्टी में खेमेबंदी तेज हुयी। पिछले दो सालों से सपा में चल रही खींचतान के बीच समाजवादी सेक्युलर मोर्चे का जन्म हुआ। सपा में हाशिए और उपेक्षित नेता कार्यकर्ता अब जहां मोर्चे में अपना भविष्य तलाश रहे है, वहीं राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा के अब तक के चल घटनाक्रम में लोगों की सहानुभूति शिवपाल यादव के साथ रहेगी। मुलायम के दिल्ली के  जंतर-मंतर में विरोध प्रदर्शन में  अखिलेश के साथ मंच साझा करने में किसी को हैरानी नहीं है, लोग यह से मानकर चल रहे है कि मुलायम सिंह यादव का हर फैसला अखिलेश के ही हक में रहा है। चुनाव चिन्ह के विवाद में जिस प्रकार आवश्यक दस्तावेज दाखिल न करके अखिलेश की जो मदद की थी तभी से साफ  था कि चाचा भतीजे में जंग में मुलायम सिंह यादव पुत्र अखिलेश के ही साथ है। समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव द्वारा तरजीह न दिये जाने से सेक्युलर मोर्चे के मुखिया शिवपाल यादव कतई हताश निराश नहीं दिख रहे हैं इतनी उपेक्षा और हाशिये पर रखे जाने के बाद भी उनका नेता जी के प्रति मान सम्मान जस का तस है। इसकों लेकर मोर्चे से जुड़े से लोगों का मानना है कि नेता हम सबके अभिभावक है उनका तिरस्कार भी हम लोगों के आर्शीवाद से कम नहीं हैं।
इसी बात को लेकर हम जनता के बीच जायेंगे। शिवपाल यादव अब तक मुजफ्फरनगर, कानपुर, सहारनपुर, फैजाबाद में मोर्चे के सम्मेलन आयोजित कर चुके है। मोर्चे के सम्मेलनों में जुटने वाली भीड़ से उत्साहित शिवपाल यादव नेता जी उपेक्षा से बेपरवाह जरूर है लेकिन अपने भाषणों में वे कहीं भी नेता जी के बारे में कोई बात नहीं कह रहे है। शिवपाल यादव ने दावा किया है कि लगभग 40 छोटे-मोटे दल उनके संपर्क है जो मोर्चे का हिस्सा बनने को तैयार है।
महागठबंधन पर भी पड़ सकता है असर 
सपा कुनबे में मची रार का असर प्रदेश में संभावित महागठबंधन पर भी पड़ सकता है। फिलवक्त तो महागठबंधन के गठन का रूख बसपा पर ही निर्भर है। शिवपाल यादव के सपा से अलग होने से बसपा सपा पर महागठबंधन में सेक्युलर मोर्चे को शामिल करने का दबाव बना सकती है। बसपा जानकारों की माने तो सपा के प्रभाव और यादव बाहुल्य क्षेत्रों में परिवार की यह रार महागठबंधन पर भारी पड़ सकती है लिहाजा बसपा सेक्युलर मोर्चे के लिए सीट छोडऩे पर दबाव बना सकती है। राजनीति जानकारों की यह मानने में गुरेज नहीं कि सेक्युलर मोर्चा सपा प्रभाव वाले क्षेत्रों में अन्य दलों की अपेक्षा महागठबंधन को नुकसान पहुंचाने की स्थिति में जरूर रहेगा। सहारनपुर के सम्मेलन में  उन्होंने मांग की कि उन्हे भी महागठबंधन में हिस्सा मिलना चाहिए। अपनी मिशन को अंजाम देने के लिए शिवपाल यादव ने प्रगतिवादी समाजवादी पार्टी का रजिस्ट्रेशन करवाने के लिए आवेदन कर दिया है।

 

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