23 April, 2018

नोएडा का ‘अंधविश्वास’ तोड़ेंगे योगी आदित्यनाथ

Noida's 'superstition', Yogi Adityanath, Uttar Pradesh
  • प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मेट्रो के विस्तार कार्यक्रम में शामिल होंगे सीएम
  • कई सीएम ने गंवाई कुर्सी

लखनऊ। नोएडा को लेकर करीब 29 वर्ष से यह अंधविश्वास चल रहा है कि जो भी मुख्यमंत्री वहां गया उसे लखनऊ लौटकर अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। अब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस अंधविश्वास को तोड़ने का बीड़ा उठाया है। वह 25 दिसंबर को नोएडा जा रहे हैं। उसी दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नोएडा में मेट्रो लाइन का शुभारंभ करेंगे।

गोरक्षपीठ के महंत और मुख्यमंत्री योगी जिस नाथ संप्रदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं, वह किसी भी प्रकार की रूढ़ियों के खिलाफ है। जाहिर है मुख्यमंत्री ऐसी बातों को नहीं मानते। परंतु अब भी समाज में अंधविश्वास का प्रभाव है और सूबे की सियासत भी इससे अछूती नहीं। यहां तक कि मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पांच कालिदास मार्ग के बगल वाले बंगले में भी यह अंधविश्वास कायम है। पशुपालन मंत्री प्रोफेसर एसपी बघेल ने बंगला नंबर छह में जाकर इस अंधविश्वास को तोड़ने की पहल की, लेकिन कुछ दिन बाद उनके कदम डिग गए और उन्होंने बंगला छोड़ दिया। उनके पहले भी कई मंत्री और अफसर इस बंगले को खाली कर चुके हैं। कहा यही जाता है कि जो लोग उस बंगले में रहे उन्हें कोई न कोइ क्षति उठानी पड़ी। वहां स्टांप पंजीयन मंत्री नंदगोपाल नंदी रहते हैं। जहां तक नोएडा की बात है तो सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने 2012 में सरकार बनाने से पहले नोएडा में खूब साइकिल चलाई, सीएम बनने के बाद वहां के लोग उनका इंतजार ही करते रह गए। अखिलेश ने बतौर सीएम नोएडा की योजनाओं का शिलान्यास और उद्घाटन लखनऊ से किया। यहां तक कि राष्ट्रपति व प्रधानमंत्री के नोएडा जाने पर उनकी अगवानी के लिए खुद न जाकर उन्होंने मंत्री भेजे।

मुख्यमंत्री योगी ने बुधवार को राजधानी में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि नोएडा में मुख्यमंत्री के जाने को अशुभ मानने की धारणा बन गई थी लेकिन, हम प्रदेश के अशुभ को दूर करने के लिए ही आए हैं। इसी कार्यक्रम में मुख्यमंत्री से संवाद में जुड़े योग गुरु बाबा रामदेव ने नोएडा जाने के निर्णय पर योगी का अभिनंदन भी किया।

वीरबहादुर सिंह से शुरू हुआ सिलसिला

1987-88 में बतौर मुख्यमंत्री वीरबहादुर सिंह नोएडा गए तो वापसी के कुछ दिन बाद ही उनकी कुर्सी चली गई। उन्हें केंद्र में संचार मंत्री बनाया गया। उनके बाद एनडी तिवारी उप्र के मुख्यमंत्री बने और वह भी नोएडा गए। तिवारी की न केवल मुख्यमंत्री की कुर्सी गई बल्कि कांग्रेस की सरकार ही चली गई और तबसे उप्र में उसकी वापसी नहीं हुई। 1995 में मुख्यमंत्री के रूप में मुलायम सिंह यादव भी नोएडा गये और वापसी के कुछ समय बाद बसपा से उनका गठबंधन टूट गया। मायावती जब चौथी बार मुख्यमंत्री बनी तो वह 14 अगस्त 2011 को नोएडा में करीब 700 करोड़ रुपये की लागत से बने दलित प्रेरणा पार्क का उद्‌घाटन करने गई थीं। हालांकि, अगले वर्ष उनकी कुर्सी चली गई। मुलायम 1995 में और कल्याण सिंह 1999 में बतौर सीएम नोएडा गए थे। वे भी कुर्सी नहीं बचा पाए। लिहाजा 2003 में दोबारा सीएम बनने पर मुलायम ने नोएडा का रुख नहीं किया। एनडी तिवारी, मुलायम सिंह, कल्याण सिंह, रामप्रकाश गुप्ता, राजनाथ सिंह से लेकर अखिलेश यादव तक सीएम बने लेकिन नोएडा सबको डराता रहा। मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी आदित्यनाथ ने सभी 75 जिलों का दौरा शुरू किया था, लेकिन नोएडा नहीं गए। ऐसे में उनके ‘आत्मबल’ पर भी प्रश्न उठा था। हालांकि, अब योगी ने 25 दिसंबर को नोएडा के कार्यक्रम में शामिल होने की हामी भर दी है।

योगी पर भी उठे थे सवाल

भाजपा के प्रदेश प्रवक्ता डॉ़ चंद्रमोहन का कहना है कि योगी अंधविश्वासों को नहीं मानते बल्कि उनकी पीठ की परंपरा इसे तोड़ने की रही है। नोएडा जाने से सत्ता नहीं रहती। मुख्यमंत्रियों के इस अंधविश्वास को तोड़ना जरूरी है। वह इसलिए क्योंकि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के व्यवहार का असर आम लोगों पर होता है। बात चाहे सत्ता की हो, समाज या फिर परिवारों की। रोजमर्रा के जीवन में वैज्ञानिक सोच होना जरूरी है। आश्चर्य का विषय है कि मुख्यमंत्री जैसे महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोग भी ऐसे झूठे विश्वासों के शिकार हो जाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सहित दूसरे भी इस धारणा की वजह से नोएडा नहीं गए। यह एक शहर और वहां लोगों के लिए अपमानजनक बात है कि उनके शहर को मनहूस समझा जाए। सीएम योगी वहां जाकर इस अंधविश्वास को तोड़ रहे हैं, यह अच्छी बात है।

rgautamlko@gmail.com

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