16 October, 2018

देश में तेजी से बढ़ रही है कैंसर मरीजों की संख्या

भारत में कैंसर के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसकी वजह सिर्फ यह नहीं है कि पिछले 15 वर्षो में लोगों की उम्र करीब 10 वर्ष तक बढ़ गई है। यानी 1990 में जहां हमारी जीवन प्रत्याशा 57.9 वर्ष हुआ करती थी, वह 2015 में बढ़कर 68.3 वर्ष हो गई। बल्कि यह भी है कि हमारी जीवन-शैली में बड़ा बदलाव आ गया है। तंबाकू व नशे की लत, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो का इस्तेमाल, ताजा खाना व सब्जियों से दूरी, वायु प्रदूषण, शारीरिक श्रम में कमी और मोटापा बड़ी वजहें हैं, जिस कारण देश में हृदय रोग, कैंसर, मस्तिष्क आघात जैसे गैर-संचारी रोगों के मरीजों में वृद्धि हुई है। अब कुल मौतों में इन बीमारियों से होने वाली मौत की हिस्सेदारी 61 फीसदी हो गई है, जो 1990 में 37.9 फीसदी थी। देश में हर साल 14.5 लाख लोग कैंसर की गिरफ्त में आते हैं। इनमें महिलाओं में स्तन कैंसर और पुरुषों में फेफड़े के कैंसर के मामले सबसे ज्यादा होते हैं।

cancer patients file photo

आकलन है कि साल 2020 तक हर साल 17.3 लाख कैंसर के नए मरीज सामने आएंगे। ‘बॉडी बर्डन : लाइफस्टाइल डिजीज’ शीर्षक से जारी सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के अनुसार, ‘2016 में हुए एक शोध का नतीजा यह बताता है कि खान-पान में गड़बड़ी से 16 प्रकार के कैंसर हो सकते हैं, जिनमें स्तन, फेफड़ा, भोजन-नलिका, पेट, गुरदा व प्रोस्ट्रेट संबंधी कैंसर शामिल हैं।’ रिपोर्ट की मानें, तो प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थो में प्रोटीन, विटामिन या खनिज बिल्कुल नहीं या फिर नाम मात्र की मात्र में होते हैं और उनमें प्रसंस्कृत नमक, चीनी, वसा व एनर्जी (कैलोरी) भी होती है। इस कारण विकसित देशों में कैंसर का खतरा 30 फीसदी तक और विकासशील देशों में 20 फीसदी तक बढ़ गया है। हद से ज्यादा वजन या मोटापा भी दर्जन भर प्रकार के कैंसर की वजह बन सकता है। मोटापे से ऐन्डोमीट्रीयम (गर्भाशय की परत यानी गर्भकला) कैंसर, ग्रासनली का कैंसर, पेट का कैंसर (गैस्टिक कार्डिया कैंसर), लीवर, किडनी, अस्थि मज्ज संबंधी कैंसर, मिनिन्जीओमा (मस्तिष्क संबंधी कैंसर), आंत, गॉल्ब्लॉडर (पित्ताशय संबंधी), स्तन, ओवरी और थॉयराइड संबंधी कैंसर हो सकते हैं।

डॉ एल एच हिरानंदानी अस्पताल के मेडिकल आंकोलॉजिस्ट डॉ आशीष बक्षी कहते हैं, ‘मोटापा खाद्य नली में कैंसर का भी कारण बन सकता है, क्योंकि इसमें पेट का अम्ल खाद्य नली के आखिरी हिस्से तक पहुंच जाता है।’ इस वर्ष की शुरुआत में जारी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 के आंकड़े बताते हैं कि साल 2005 और 2015 के दरम्यान भारत में मोटे लोगों की संख्या दोगुना बढ़ी है। अब 20.7 फीसदी महिलाएं और 18.6 फीसदी पुरुष मोटापे की श्रेणी में हैं। जाहिर है, अपने देश में कैंसर महामारी का रूप लेने को तैयार दिख रहा है।ऐसे हालात में रोकथाम पहली जरूरत है, और इसके लिए जरूरी है कि हम एक स्वस्थ जीवन-शैली अपनाएं। हम रोजाना कम से कम 500 ग्राम हरी सब्जियां और फल खाएं, 45 मिनट नियमित तौर पर व्यायाम करें, शराब का सेवन कम से कम सेवन कर दें और तंबाकू तो छोड़ ही दें। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज, मुंबई के स्कूल ऑफ हेल्थ सिस्टम्स स्टडीज के डीन डॉ टी सुंदररमन बताते हैं, ‘देखा गया है कि खान-पान में फल व सब्जियों को शामिल करने से न सिर्फ कोलोन यानी मलाशय के कैंसर का खतरा कम होता है, बल्कि अन्य प्रकार के कैंसरों से भी हमारा बचाव होता है’।

जसलोक हॉस्पिटल ऐंड रिसर्च सेंटर के डॉ महबूब बसाडे की राय में, ‘सॉसेज, पका हुआ फ्रोजन गोश्त, सलामी, हॉट डॉग, बैकॉन, हैम, सिंका हुआ व सूखा मांस जैसे प्रसंस्कृत मांसाहारी खाद्य पदार्थो का सेवन भी कोलोन, पैन्क्रीएटिक यानी अग्न्याशय और प्रॉस्टेट कैंसर का खतरा बढ़ा देता है’। ये पदार्थ इसलिए कैंसरकारी हो जाते हैं, क्योंकि इनको संरक्षित करने के लिए तमाम तरह के उपाय किए जाते हैं और इनमें नमक व खमीर जैसे तत्व भी पर्याप्त मात्र में मिलाए जाते हैं, जो हमारी सेहत के लिएनुकसानदेह है।जहां तक पर्यावरण से जुड़े कारणों का सवाल है, तो लंबे समय तक रसायनों के संपर्क में रहना और प्रदूषण भी आपको कैंसर का रोगी बना सकता है। मेटल, कीटनाशक, बालों में इस्तेमाल किए जाने वाले रंग, कार्बनिक प्रदूषक, फार्मास्यूटिकल्स, क्लोरीनयुक्त सॉल्वेंट और पूरी तरह कीटाणुमुक्त पानी हमें बीमार बना सकते हैं। घरों में आमतौर पर इस्तेमाल किए जाने वाले रसायन और सौंदर्य प्रसाधन की वस्तुओं में अभ्रक, निकल, कैडमियम, विनाइल क्लोराइड, रैडॉन, बेंजीन जैसे पदार्थ होते हैं, जो कैंसरकारी माने जाते हैं।

लेकिन चेतावनी भरे इन सारे हालात के बीच डॉ पीके जुल्का की राय उत्साहवर्धक है। डॉ जुल्का बताते हैं, ‘यह सही है कि ये सभी कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं और कैंसर के एक कारक के रूप में काम करते हैं, मगर यह भी उतना ही सच है कि भारत में 60 फीसदी मामलों में कैंसर की रोकथाम संभव है।’ अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में रेडिएशन ओन्कोलॉजी विभाग के प्रमुख रह चुके डॉ जुल्का कहते हैं, ‘भारत में कैंसर के करीब 40 फीसदी मामलों में तंबाकू वजह बनती है और अन्य 20 फीसदी मामले हेपेटाइटिस बी (लीवर कैंसर की वजह) और एचपीवी (गर्भाशय संबंधी कैंसर की वजह) जैसे इंफेक्शन के कारण होते हैं। हम चाहें, तो तंबाकू से दूरी बरतकर, वैक्सीन वगैरह जैसे सुरक्षात्मक उपायों और स्वस्थ जीवन-शैली अपनाकर कैंसर का खतरा काफी हद तक कम कर सकते हैं।’

तंबाकू-सेवन किस हद तक खतरनाक है, यह डॉ बसाडे भी बताते हैं। वह कहते हैं, ‘मेरे पास मुंह के कैंसर से पीड़ित सबसे कम उम्र का जो मरीज अब तक आया है, उसकी आयु महज 20 वर्ष थी। वह कैंसर का इसलिए शिकार बना, क्योंकि उसे तंबाकू चबाने की आदत थी। यह आदत अब कैंसर का एक बड़ा कारण बन चुकी है। यहां तक कि रिपोर्ट ऐसी भी है कि तंबाकू छोड़ने के 25 वर्ष बाद भी कैंसर होने का खतरा चार फीसदी तक बना रहता है।’ किसी व्यक्ति में कैंसर होने की वजह भौगोलिक या कई बार उसका पेशा भी हो सकता है।

डॉ सुंदररमन की मानें, तो ‘परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं में लंबे समय तक विकिरण के संपर्क में रहने वाले, प्रयोगशालाओं के हादसे की वजह से विकिरण की चपेट में आने वाले या फिर विकिरण पैदा करने वाली वस्तुएं होने की वजह से कूड़ा-कचरा अथवा कबाड़ जमाव वाले क्षेत्रों या उसके आसपास रहने वाले लोगों में कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।’ वैसे, सेलफोन और मोबाइल टावर से उत्सजिर्त होने वाले विद्युत चुंबकीय विकिरण और कैंसर में कोई रिश्ता अब तक साबित नहीं हो सका है। हालांकि आईसीएमआर के विश्लेषक यह सलाह जरूर देते हैं कि मोबाइल फोन का इस्तेमाल जरूरत के वक्त ही करें और संभव हो, तो हेडफोन या ईयरफोन लगाने की आदत डाल लें। जाहिर है, अगर आपका खान-पान सही है और आपने स्वस्थ जीवन-शैली अपना रखी है, तो कैंसर का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है। जहां तक संभव हो, नशा सेवन से दूर रहने में ही भलाई है। डॉ बसाडे के शब्दों को समझना जरूरी है, जो कहते हैं, ‘धूम्रपान या शराब सेवन का कोई बहाना नहीं चल सकता। अगर आपने यह धारणा पाल रखी है कि आप नियमित तौर पर व्यायाम कर रहे हैं, इसलिए धूम्रपान या शराब का सेवन कर सकते हैं, तो यकीनन आप बड़ी भूल कर रहे हैं’। इस सच को स्वीकार करने की कोशिश करें।

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