27 May, 2018

ईमानदारी की आड़ में ‘ईमानदार प्रस्ताव’ की चढ़ी बलि

वन विभाग के तीन अफसरों के खिलाफ बगैर जांच के करवाई एफआईआर

शिशुपाल सिंह

लखनऊ। ‘हवन करते हाथ जलना’ की यह कहावत वन विभाग के तीन अफसरों पर सटीक साबित होती है। प्रदेश के जंगलों के अंदर बहने वाली नदियों और नालों के उथले हो जाने के कारण जहां बाढ़ से हर वर्ष वन क्षेत्रों से भारी तबाही होती है वहीं जंगली जानवरों को अपनी प्यास बुझाने के लिए शहरी क्षेत्रों में घुसने को मजबूर होना पड़ता है। इस समस्या के निदान के लिए उत्तर प्रदेश वन निगम ने वनों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जंगलों में बहने वाली नदियों एवं नालों की तली में जमे अतिरिक्त खनिज को अन्य वन उपज की तरह एकत्रित करके बेचने का प्रस्ताव बोर्ड की बैठक में पास करके शासन को भेजा था। बोर्ड की बैठक के बाद वन निगम ने सेवाप्रदाता के चयन के लिए टेण्डर प्रक्रिया शुरू की। इस मामले में प्रमुख सचिव वन द्वारा बगैर कोई जांच के वन क्षेत्रों में ईको रेस्टोरेशन की आड़ में नियम विरूद्घ खनन को बढ़ावा देने के आरोप लगाते हुए वन निगम के तीन अफसरों के लिए एफआईआर दर्ज करवाने निर्णय से वन विभाग के अफसरों में जबरदस्त नाराजगी है। इस मुद्दे पर शासन और प्रमुख सचिव वन ने चुप्पी साध ली है।
बताते चलें कि 2 और 30 नवम्बर 2017 को उत्तर प्रदेश वन निगम ने अपनी 259वीं बोर्ड की बैठक में यह निर्णय लिया कि प्रदेश के नौ वन प्रभागों की नदियों एवं नालों की तली में जमे अतिरिक्त खनिज को अन्य वन उपज की तरह लाट तैयार करके बेचा जाए। इससे सूबे के वन क्षेत्रों में ईको रेस्टोरेशन होगा और सरकार को राजस्व भी मिलेगा। साथ ही वन क्षेत्रों में होने वाली अवैध खनन पर भी रोक लगेगी। इस आशय का एक पत्र प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा ने 7 सितम्बर 2017 को प्रमुख सचिव वन रेणुका कुमार को भेजा गया। इसके बाद 8 मार्च 2018 को प्रबंध निदेशक ने प्रोक्योरमेंट कंसल्टेंट के साथ सेवा प्रदाता के चयन के लिए तकनीकी समिति का गठन किया गया। यूपीको प्रोक्योरमेंट कंसल्टेंट के रूप में कार्य किए जाने के लिए वन निगम ने निर्णय लिया। 29 मार्च 2018 को यूपीको ने विभिन्न अखबारों में सेवाप्रदाता के चयन के लिए टेण्डर प्रकाशित करवाए। 4 अप्रैल 2018 को यह टेण्डर वेबसाइट पर भी अपलोड कराए गए। वन निगम के प्रबंध निदेशक ने 9 और 27 मार्च 2018 को विधिक राय के लिए शासन को पत्र भेजा। शासन का यह भी आरोप है कि वन निगम ने शासन से अपने पत्र दिनांक 27-3-2018 द्वारा यूपीको प्रोक्योरमेंट से खर्च की अनुमति मांगी थी। सूत्रों से वार्ता के बाद ज्ञात हुआ कि यह भी असत्य है।
उच्चतम न्यायालय के उपरोक्त आदेश 15-09-2017 के क्रम में वन निगम द्वारा प्रमुख सचिव वन से विधिक राय मांगी गई कि भारत सरकार से कार्ययोजना के अनुमोदनोपरान्त वन विभाग द्वारा वन निगम को यह कार्य सौंपे जाने के उपरान्त खनन अधिनियम 1954 व भारतीय वन अधिनियम 1927 में से किस के प्राविधान प्रभावी होंगें एवं वन निगम द्वारा वन उपज के निस्तारण से प्राप्त धनराशि आदि को माननीय सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय दिनांक 15-09-17 के आलोक में खनन विभाग अथवा वन विभाग के खाते में जमा किया जाएगा। अर्थात वन निगम ने रेणुका कुमार एवं संजय सिंह को इस बात से कोई फर्क पड़ता कि 300 से 400 करोड़ की रायल्टी की धनराशि वन विभाग को न मिलकर खनन विभाग को मिले ताकि अपनी हनक बनी रहे।
प्रमुख सचिव वन रेणुका कुमार के निर्देश पर विशेष सचिव वन ओम प्रकाश द्वारा दर्ज करवाई गई रिपोर्ट के मुताबिक प्रमुख सचिव वन को एक शिकायत सूत्रों से प्राप्त हुई कि वन निगम के स्तर से राज्य और केन्द्र सरकार की अनुमति के बगैर नियम विरूद्घ तरीके से वन क्षेत्र के ईको रेस्टोरेशन की आड़ में खनन कार्य कराए जाने के लिए ई-टेण्डर आमंत्रित किए गए हैं। सूत्रों ने सभी साक्ष्य भी उपलब्ध कराए। इस पर प्रमुख सचिव वन ने वन निगम के प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा को समस्त पत्रावलियों सहित तलब किया गया। पत्रावलियों का परीक्षण के बाद प्रबंध निदेशक ने अपना बयान अभिलेखीय साक्ष्यों के आधार पर दिया गया है। श्री शर्मा ने अपने बयान में यह उल्लेख किया है कि उन्हें भली-भांति जानकारी है कि भारतीय वन अधिनियम 1927 में वन क्षेत्रों में खनन प्रतिबंधित है। टेण्डर डाक्यूमेंंट में मौरंग, बालू, बजरी और बोल्डर वन क्षेत्र से निकालने के लिए टेण्डर इंवाइट किए गए हैं। जिसका उद्देश्य ईको रेस्टोरेशन है। श्री शर्मा ने अपने बयान में स्वीकारा है कि यह कार्य नियम विरूद्घ है, इसी वजह से टेण्डर प्रक्रिया को 4 मई 2018 को निरस्त कर दिया गया है। सुनियोजित षडयंत्र के तहत वन निगम के प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा, अपर प्रबंध निदेशक मनोज सिन्हा, प्रभागीय लागिंग प्रबंधक जी.सी. सिन्हा ने यह कृत्य किया है। इसके लिए गाजीपुर थाने में एफआईआर दर्ज करवाई है।
शासन के सूत्रों का कहना है कि प्रमुख सचिव वन रेणुका कुमार को वन निगम के हर प्रस्ताव और मूवमेंट की जानकारी थी। वन निगम का यह प्रस्ताव किसी भी सूरत में रास नहीं आ रहा था। अपनी ईमानदार की छवि धूमिल न हो, इसके लिए वन निगम के प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा को 3 मई को योजना भवन में बुलवाकर खूब फटकार लगाई। प्रस्ताव को निरस्त करने और अपना बयान देने का दबाव बनाया। साथ ही यह भी प्रलोभन दिया कि अगर अपना बयान नहीं दिया तो इसी माह होने वाली पदोन्नति में मुख्य वन संरक्षक का पद पर तैनाती नहीं देंगी। प्रमुख सचिव के दबाव में आकर प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा ने अपना लिखित दर्ज करवाया। इसके बाद प्रमुख सचिव वन ने बगैर कोई जांच और भारत सरकार से अनुमति के आईएफएस सेवा के अफसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के आदेश दिए। सूत्रों का कहना है कि जब विभागीय वन मंत्री कर्नाटक के चुनावी ड्यूटी में व्यस्त थे, तभी प्रमुख सचिव ने यह कारनामा अंजाम दिया। एफआईआर दर्ज होने के बाद वन निगम के प्रबंध निदेशक एस.के.शर्मा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर इस प्रकरण का सच रखना की कोशिश में हैं, लेकिन मुख्यमंत्री कर्नाटक चुनाव में व्यस्त होने के कारण समय नहीं मिल पाया है। जबकि वन विभाग में एस.के. शर्मा की छवि काफी साफ-सुथरी बताई जाती है। जबकि प्रमुख सचिव वन जिस विभाग में रहीं है, उस विभाग की गतिविधियां ठप पड़ जाती हैं और विभाग के अफसर प्रताडि़त होते हैं। एफआईआर दर्ज होने के कारण सबसे वरिष्ठï अफसर होने के बावजूद मुख्य वन संरक्षक के पद पर होने वाली पदोन्नति प्रभावित हो गई है। वन निगम के प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा ने मुख्य सचिव राजीव कुमार को एक पत्र लिखा है। जिसमें प्रमुख सचिव वन की कार्यप्रणाली और दबाव में पत्र लिखवाने का आरोप लगाया है। इस संबंध में वन निगम के प्रबंध निदेशक एस.के. शर्मा और प्रमुख सचिव वन रेणुका कुमार तथा विभागीय मंत्री दारा सिंह चौहान से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।

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