18 February, 2019

एससी/एसटी एक्ट में दोषी को छह माह से कम की सजा नहीं

  • 11 दिन की सजा को छह माह में बदला सुप्रीम कोर्ट ने
  • मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्णय को गलत ठहरायाकानून में दी गई न्यूनतम सजा के प्रावधान का पालन करना होगा अदालतों कोन्यूनतम से कम सजा नहीं दे सकतीं अदालतें

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के तहत दोषी ठहराए जाने पर मुजरिम को छह महीने से कम की सजा नहीं दी जा सकती। एक्ट में न्यूनतम का सजा का प्रावधान है। अदालतों को कानून में निर्धारित न्यूनतम से कम सजा देने का अधिकार नहीं है। जस्टिस धनंजय चंद्रचूड और हेमंत गुप्ता की बेंच ने दलित महिला के शारीरिक शोषण के दोषी को सिर्फ 11 दिन की सजा देने के मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के निर्णय को गलत ठहराया। मुजरिम विक्रम दास की अपील पर हाई कोर्ट ने जेल में काटी गई अवधि को सजा में बदलकर मुजरिम को रिहा कर दिया था। हालांकि हाई कोर्ट ने जुर्माने की रकम 500 रपए से बढ़ाकर तीन हजार रपए की दी थी। बेंच ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट को मिले विशेषाधिकार का इस्तेमाल सजा को कम करने के लिए नहीं किया जा सकता। अदालत का मत था कि जब कानून में न्यूनतम सजा का साफतौर पर उल्लेख है तो सुप्रीम कोर्ट अपने विशेषाधिकार का इस्तेमाल करने के लिए बाध्य नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट मई 2012 में दिए गए हाई कोर्ट के निर्णय को निरस्त करके ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने मार्च 2007 में दिए अपने फैसले में चार गवाहों के बयान के आधार पर एससी/एसटी एक्ट, 1989 की धारा तीन के तहत अभियुक्त को छह महीने के कठोर कारावास का दंड दिया था। विशेष अदालत ने अभियुक्त पर 500 रपए जुर्माना भी लगाया था। हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ मध्य प्रदेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। राज्य सरकार का कहना था कि चार गवाहों में से तीन महिलाएं थी। पीड़ित महिला ने भी अदालत को दिए बयान में साफतौर पर कहा था कि अभियुक्त ने उसका शोषण किया। उसका शारीरिक शोषण किया गया। वह धूलिया जाति की है, जबकि अभियुक्त पनिका जाति से ताल्लुक रखता है। प्रतिवादी के वकील का कहना था कि जाति-बिरादरी के कारण वारदात नहीं हुई। आपसी कहासुनी की वजह से घटना हुई। एफआईआर भी 16 दिन बाद दर्ज कराई गई थी। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जज जस्टिस एमए सिद्दीकी ने ट्रायल के दौरान काटी गई 11 दिन की सजा को पर्याप्त माना था। मुजरिम ने अपील में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती नहीं दी थी। उसने सजा की अवधि कम करने के लिए हाई कोर्ट में अपील दायर की थी। हाई कोर्ट में उसे सफलता भी मिली जब छह महीने की सजा को 11 दिन में तब्दील कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने बची सजा काटने के लिए चार सप्ताह के अंदर सरेंडर करने का आदेश दिया।

rgautamlko@gmail.com

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