जनसंख्या घोटाला से रोकी जा रही है एससी-एसटी की तरक्की

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bahuhan swaraj ghoshana patra, Dr. Mahendra pratap rana, divya sandesh, JNU, Population scandal
bahuhan swaraj ghoshana patra, Dr. Mahendra pratap rana, divya sandesh

वर्ष 2018 में भारत की कुल जनसंख्या 135 करोड़ 1,351,122,408 यानी 1.35 बिलियन थी। अत्यधिक जनसंख्या घनत्व वाला देश होने के साथ-साथ भारत अत्यधिक जनसंख्या वृद्धि की समस्या से जूझ रहा हैं। भारत में अछूत के नाम से एवम् अंग्रेजी हुकूमत में डिप्रेस्ड क्लासेस के नाम से पहचान रखने वाली जातियों को स्वतंत्र भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति नामक दो श्रेणियां बनी हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की सम्पूर्ण जनसंख्या मे अनुसूचित जातियों की संख्या 200,892,108 (16.6 प्रतिशत) तथा अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 104,076,634 (8.6 प्रतिशत) थी। सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार भारत में अन्य पिछड़े वर्गो की जनसंख्या की कुल आबादी का 41 प्रतिशत हैं। राष्टीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में अनुसूचित जाति- (19.59 प्रतिशत) अनुसूचित जनजाति-जनसंख्या (8.63 प्रतिशत) व  अन्य पिछडा वर्ग  (40.94 प्रतिशत ) और शेष 30 प्रतिशत जनसंख्या सामान्य वर्ग की हैं। अब यहां कई प्रश्न उभर कर सामने आ रहे हैं। एक – अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या वर्तमान में उन्हें मिल रहे आरक्षण से   काफी ज्यादा हैं। अत: इन समूहों के लिए आरक्षण उनके जनसंख्या के प्रतिशत के बराबर बढ़ाया जाना चहिए। दो –  मण्ड़ल आयोग की रिपोर्ट में पिछड़े वर्गो की जनसंख्या 52 प्रतिशत उल्लेखित की गयी थी वह घटकर 41 प्रतिशत पर आ गयी है अर्थात 11 प्रतिशत की कमी हुई हैं।  तीन- सामान्य वर्गो की जनसंख्या 30 प्रतिशत आंकी गयी हैं अर्थात 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई हैं।

वर्ष 1999-2000 में एनएसएसओ के एक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में अन्य पिछड़े वर्ग की जनसंख्या 35 प्रतिशत थी जो कि अगले 5 वर्षो (2000.05) में 6 प्रतिशत की और वृद्धि हुई अर्थात पिछड़े वर्ग की जनसंख्या 41 प्रतिशत हो गयी। भारत सरकार के अधीन संस्था एनएसएसओ द्वारा पिछड़े जातियों की प्रत्येक 5 वर्षो में 6 प्रतिशत की जनसंख्या वृद्धि को आधार मान लिया जाय इस आधार पर भी 2005-2020 अर्थात अगले 15 वषों में पिछड़े जातियों की जनसंख्या में 18 प्रतिशत की और वृद्धि हो जायगी। ऐसी स्थिति में भारत सरकार की पिछड़े जातियों को 27 प्रतिशत आरक्षण प्रक्रिया पूर्ण रूप से असंवैधानिक हैं। अत: अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़े वर्गो को 2011 की जनगणना में दर्शित इन वर्गो के प्रतिशत जो क्रमश: 16.6, 8.6 एवं 52 प्रतिशत थी के बराबर राज्यों एवं केन्द्र सरकार के अधीन नई आरक्षण नीति लागू हो। 2011 की जनगणना में उल्लिखित अनुसूचित जाति एवम् अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या क्रमश: 16.6 एवम् 8.6 प्रतिशत एवम् पिछड़े जातियों को 52 प्रतिशत आरक्षण जनसंख्या को ध्यान में रखते हुए बहुजन स्वराज अभियान, लोक सभा राज्य विधान सभाओं और स्थानिय निकायों में नई आरक्षण नीति लागू हो। यहां पर यह उल्लेख करना भी आवश्यक हैं कि सर्वोच्च न्यायालय को इंदिरा साहनी मामले में अपने उस निर्णय पर पुर्नविचार करें जिसमें अन्य पिछड़े वर्गो के लिय केवल 27 प्रतिशत आरक्षण देने की सीमा तय की गयी थी। संविधान के 124वें संसोधन के लिय के द्वारा गरीब सामान्य वर्गो को 10 प्रतिशत आरक्षण दिये जाने के बाद आज की बदली परिस्थिति में इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अर्थहीन हो चुका हैं। वर्तमान में आरक्षण की सीमा 59.6 प्रतिशत तक पहुंच चुकी हैं अत: ऐसी स्थिति में पिछड़े वर्गो का आरक्षण 27 प्रतिशत पर रोके रखना संविधन की मूल भावना के विरूद्ध हैं।
मण्ड़ल कमीशन रिपोर्ट में पिछड़े वर्गों को 52 प्रतिशत आरक्षण की अनुसंशा की गयी थी किन्तु सर्वोच्च न्यायालय एवम् उच्च न्यायालयों द्वारा विशेष रूप से अनुसूचित जाति अनुसूचित  जनजाति एवम् पिछड़े वर्गो से जुड़े मामले पर निर्णय के इतिहास को देखा जाय तो उच्चन्याय पालिका सदैव इन वर्गो के हितों को सुरक्षित रखने के बाजए इनके विरूद्ध  ही फैसला दिये हैं। जो कि उच्च न्याय पालिका जजों की कमजोर वर्ग विरोधी मानसिकता को दर्शाता हैं। मण्डल अयोग ने पिछड़े वर्गो की जनसंख्या 52 का ऑकडा 1931 की जनगणना से लिया गया था।
1931 की जनगणना में अछूत जाजियो-वर्तमान में अनुसुचित जाति का राज्यवार जनसंख्या 17 से लेकर 33 प्रतिशत तक थी और अनुसूचित जनजाति की राज्यवार जनसंख्या 8 से 10 प्रतिशत के बीच थी और पिछड़े वर्गों की अबादी 52 प्रतिशत थी। 2001 की जनगणना में अनुसूचित जाति 15.5 प्रतिशत  और अनुसूचित जनजति  7.5 प्रतिशत उधृत का गयी। 2011 की जनगणना में अनुसूचित जाति 16.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति 8.6 प्रतिशत अर्थात दोनो समुदायों 1.1 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गयी।
जनसंख्या 8.63 प्रतिशत दशार्य गया हैं। वही 2011 की जनगणना में अनुसूचित जाति 16.6 प्रतिशत व अनुसूचित जनजाति को 8.6 प्रतिशत दिखाया गया हैं। 1931 में अछूत जातियों की संख्या 17-33 प्रतिशत थी जो 2011 में 80 वर्षों बाद 16.6 प्रतिशत पर आ गयी। इसी अवधि  में अनुसूचित जनजाति की 8-10 प्रतिशत थी जो 2011 में 8.6 प्रतिशत ही रह गयी और पिछड़े जातियों की संख्या 52 प्रतिशत से घटकर 41 प्रतिशत पर आ गयी। अर्थात अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या बढऩे के बजाय कम हुई है।
एनएसएसओ जनसंख्या की गणना कराने की अधिकृत संस्था का कार्य नमूने इक_ा कर इसका विश्लेषण करना है किन्तु विगत वर्षों में एलएसएसओ ने जिस प्रकार से अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति व पिछड़े जातियों की जनसंख्या व्रद्धि पर आकड़े प्रस्तुत किये हैं उसने एक संदेह की स्थिति पैदा हो गयी है। जनगणना विभाग भारत सरकार ने तो पिछड़े जातियों की जनसंख्या अधिकारिक तौर पर घोषित नहीं किया है। जनगणना विभाग एवं एनएसएसओ दोनों ही भारत सरकार की संस्थाए हैं और दो मिलकर अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति व पिछड़े वगोज़्ं की वास्तविक जनसंख्या को छिपाने में लगे हैं। यदि इमानदारी से इसकी पडताल हुई तो यह देश का सबसे बड़ा घोटाला होगा।
एनएसएसओ भारत सरकार की एक संस्था अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति व पिछड़े वर्गों की जनसंख्या में व्रद्धि दिखा रहा है और जनगणना विभाग भारत सरकार नई दिल्ली इन तीनों वर्गों की जनसंख्या में कमी होती दिखा रही हैं। जनसंख्या के विषय में जनगणना विभाग ग्रह मंत्रालय भारत सरकार यदि सहि हैं भारत की आबादी किसी भी रूप में बढऩी नही चाहिए थी। जबकी भारत की जनसंख्या 2018 के अन्त तक 135 करोड़ से ज्यादा हो चुकी हैं। इसका सीधा अर्थ हुआ कि जनगणना विभाग ग्रह मंत्रालय भारत सरकार अनुसूचित जातियों अनुसूचित जनजातिव पिछडे वर्गों की जनसंख्या को उनकी वास्तविक  जनसंख्या से काफी कम दिख कर उसके संवैधानिक अधिकारों की बड़े पैमाने पर अनदेखा कर रही है। अत: जनगणना विभाग ग्रह मंत्रालय भारत सरकार को बताना चाहिए कि…
 1. अनुसूचित जातियों व अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या कम कैसे हो गयी और इनकी जनसंख्या में कमी होने के क्या कारण हैं?
 2.  पिछड़े वर्गों की जनसंख्या भी 1931 की जनगणना के तुलना में कम हुई है कैसे?
 3. जनसंख्या किसकी बढ़ रही है?
 4. ब्राह्मणों, बनियों और क्षत्रियों (हिन्दुओं) का जनसंख्या में कम हुई है जिसमे 2018 के अन्त तक भारत की  जनसंख्या 135 करोण से ज्यादा हो चुकी है?
लेखक- डॉ. महेंद्र प्रताप राना एसोसिएट प्रोफेसर, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली।

 

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