20 April, 2018

‘नटवर लाल’ बाबूओं के चंगुल में सचिवालय

शिशुपाल सिंह
लखनऊ।  सचिवालय में छिड़ी भीतरी बनाम बाहरी की लड़ाई में कर्मचारी संगठनों की मांग तो ठीक है, लेकिन सचिवालय सेवा के खाली लगभग 800 पदों पर बीते 20 वर्षों से भर्ती न होने देने षडयंत्र में सचिवालय प्रशासन विभाग कुछ नटवरलाल बाबूओं के चंगुल में फंस गया है। जिसकी वजह से सचिवालय के चंद बाबू अपने कैडर को लाभ पहुंचाने और अपने वर्चस्व को बरकरार रखने के लिए सही को गलत और गलत को सही करने का खेल अर्से से खेल रहे हैं। यूपी में अब तक जितनी भी सरकारें आई, बाबूओं के इस खेल में उलझ कर रही गई हैं। इस तरह अनैतिक खेलों के रिकार्ड सचिवालय प्रशासन विभाग पटा पड़ा हुआ है। जिसके कारण अनगिनत प्रकरण कोर्ट में न्याय के लिए लम्बित हैं। जिनमें सबसे ज्यादा चर्चित प्रकरण लोक सेवा आयोग से चयनित 78 दलित समीक्षा अधिकारियों को ज्वाइनिंग न कराए जाने का रहा है।
78 दलित सहायक समीक्षा अधिकारियों को ज्वाइनिंग न कराने में खूब उड़ी नियमों की धज्जियां मुख्यमंत्री के पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने 22 अप्रैल 2004 को सचिवालय में बैकलॉग कोटे के तहत सहायक समीक्षा अधिकारियों के सीधी भर्ती प्रक्रिया से 83 पदों को भरने के लिए प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को अनुमोदन के लिए प्रस्ताव भेजा था। जिस पर मुख्यमंत्री ने लोकसभा आयोग को बैकलॉग के रिक्त पदों के सापेक्ष सहायक समीक्षा अधिकारियों के अभियाचन भेजने पर सहमति प्रदान की थी। साथ ही 45 पदों को पदोन्नतियों से भरने की मंजूरी दी थी। लोक सेवा आयोग ने 23 अगस्त 2009 को प्रारम्भिक परीक्षा आयोजित की। प्रारम्भिक परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों की 14 व 28 मार्च 2011 को एक मुख्य परीक्षा आयोजित की। मुख्य परीक्षा के आधार पर सफल 78 सहायक समीक्षा अधिकारियों को नियुक्ति प्रदान करने के लिए 6 नवम्बर 2011 को सचिव लोक सेवा आयोग ने संस्तुति की। इसके कुछ माह बाद यूपी में विधान सभा चुनाव की गतिविधियां शुरू हो गई। सत्ता परिवर्तन में बसपा सरकार की विदाई हुई और अखिलेश सरकार अस्तित्व में आई थी। सरकार की मंशा को भांपते हुए सचिवालय प्रशासन ने 78 दलित सहायक समीक्षा अधिकारियों को ज्वाइन न कराने के लिए हर हथकंडे अपनाए। नियुक्ति प्रदान न किए जाने से हत्तोसहित चयनित 78 सहायक समीक्षा अधिकारियों में से कुछ ने न्याय के लिए कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। रिट याचिका संख्या 44609/2013 प्रेमलता बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य में उच्च न्यायालय ने 27 सितम्बर 2013 को दो माह के अंदर नियुक्ति प्रदान किए जाने का आदेश पारित किया। इस पर सरकार ने एक जांच अधिकारी नियुक्त कर रिपोर्ट तैयार करवाया। जांच रिपोर्ट में यह तथ्य सामने लाए कि गलत अधियाचन भेजा गया था। इस वजह से अधियाचन को निरस्त किया जाए। पूर्व मुख्य सचिव जावेद उस्मानी ने 17 फरवरी 2014 को उच्चतम न्यायालय के शंकर सन दास बनाम भारत संघ के मामले में आए फैसले का हवाला देते हुए उल्लेखित किया है कि लोक सेवा आयोग की संस्तुतियों के आधार पर नियुक्ति प्रदान किए जाने का औचित्य नहीं बनता है। ऐसी स्थिति में चयनित सहायक समीक्षा अधिकारियों का नियुक्ति प्रदान करने का अनुरोध बलहीन, औचित्यहीन और निराधार है। 
सचिवालय सूत्रों का कहना है कि उत्तर प्रदेश सचिवालय कम्प्यूटर सहायक एवं सहायक समीक्षा अधिकारी संघ ने अपने कॉडर को मजबूत करने के लिए लोक सेवा आयोग से चयनित 78 दलित सहायक समीक्षा अधिकारियों को ज्वाइनिंग न होने देने के लिए साम, दाम और दण्ड भेद का सहारा लिया। सचिवालय में सहायक समीक्षा अधिकारी के 810 पद हैं। इनमें से आधे लोकसेवा आयोग से सीधी भर्ती और आधे पदोन्नति कोटे से अर्थात 405 सीर्धी भर्ती के और 405 पदोन्नति कोटे से भरे जाने का प्रावधान है। मौजूदा समय सचिवालय में पदोन्नति कोटे से 310 कर्मी तैनात हैं।
कम्प्यूटर सहायक एवं सहायक समीक्षा अधिकारी संवर्ग में पदोन्नति कोटे के कर्मचारी सीधी भर्ती के कार्मिकों को इसलिए आने से रोकते हैं, अगर सीधी भर्ती के कर्मिक अपने कोटे के सापेक्ष नियुक्ति पा जाएंगे तो समीक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति में निर्धारित अर्हकारी सेवा पूरी करने के बाद ही उपलब्ध रिक्ति के सापेक्ष पदोन्नति पाएंगे। वर्तमान स्थिति में अर्हकारी सेवा में शिथिलीकरण प्राप्त करके समीक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति पा रहे हैं। इसी लाभ को प्राप्त करने के उद्देश्य से संबंधित कर्मचारी संघ ने सचिवालय प्रशासन विभाग पर दबाव डाल कर तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर लोक सेवा आयोग से चयनित 78 दलित सहायक समीक्षा अधिकारियों की ज्वाइनिंग नहीं होने दी है। सचिवालय प्रशासन विभाग ने कर्मचारी संघों के दबाव में राज्य मुकादमा नीति के खिलाफ जाकर कोर्ट में गलत तथ्य पेश किए हैं। जिसकी वजह न्याय मिलने में दिक्कत हो रही हैं।
सचिवालय के सूत्रों का कहना है कि सचिवालय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव महेश गुप्ता की भूमिका काफी संदिग्ध है। अपनी कार्यप्रणाली के अनुरूप सचिवालय के नटवर लाल बाबू पर काफी मेहरबान हैं। सचिवालय में हुए कई घपलों की फाइलें को दबा रखा है। सेटिंग-गेटिंग के कारण सचिवालय में हुए कई करोड़ के स्टेशनरी घोटाले बाज बाबूओं को संरक्षण दे रखा है। इस संबंध में सचिवालय प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव महेश गुप्ता से सम्पर्क किए जाने पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई।
बाहरियों को बाहर करने का आंदोलन हुआ तेज
लखनऊ। उत्तर प्रदेश सचिवालय अपर निजी सचिव संघ ने चेतावनी दी है कि जब तक बाहर के विभागों से आये 24 कार्मिकों को उनके मूल विभाग में वापस नहीं भेजा जाएगा तब तक आंदोलन जारी रहेगा। अपर निजी सचिव संघ के अध्यक्ष अमर सिंह, उपाध्यक्ष सुरेन्द्र कुमार मौर्य और संयुक्त सचिव राकेश कुमार सिंह ने कहा कि नितान्त कामचलाऊ व्यवस्था के तहत विभिन्न विभागों से स्थानान्तरण पर सचिवालय सेवा में आये 24 कार्मिकों को सचिवालय प्रशासन अनुचित लाभ देने पर अडिग है। प्रमुख सचिव सचिवालय प्रशासन विभाग लोक सेवा आयोग से चयनित 1999 बेच के अपर निजी सचिवों को नियम विरुद्ध तरीके से मंत्रि परिषद के माध्यम से वरिष्ठ कराने पर कार्रवाई की जा रही है, जिसका अपर निजी सचिव संघ लगातार विरोध कर रहा है। संघ ने 29 नवम्बर को सचिवालय प्रशासन के विरुद्ध सभा करके अपनी आपत्ति भी जतायी थी। संघ के पदाधिकारियों ने बताया कि मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एसपी गोयल से भी प्रतिनिधिमंडल मिलकर वार्ता कर चुका है। प्रमुख सचिव मुख्यमंत्री ने वार्ता के बाद पत्रावली मंगाकर परीक्षण किये जाने का निर्देश दिया और संघ को आश्वस्त किया कि कोई भी नियम विरुद्ध कार्यवाई नहीं होने दी जाएगी, लेकिन प्रमुख सचिव सचिवालय प्रशासन से इस मामले में कोई वार्ता नहीं की गयी है। इसलिए जब तक सचिवालय प्रशासन इस कार्रवाई को नहीं रोकेगा तब तक आंदोलन जारी रहेगा और धरना-प्रदर्शन के अलावा अनशन आदि भी किया जाएगा।
सचिवालय में हुए घपलों की हो निष्पक्ष जांच
सचिवालय के समीक्षा अधिकारी अरूण कुमार श्रीवास्तव का कहना है कि सचिवालय प्रशासन विभाग में सीधी भर्ती से नियुक्त समीक्षा अधिकारी से पदोन्नति पाए अनुभाग अधिकारी से विशेष सचिव तक का कब्जा है। विभाग एक निष्पक्ष एवं निष्पक्ष राज्य सरकार का संवैधानिक अंग नहीं रह गया है। नियमों की मनमानी व्याख्या एवं विशेष अधिवक्ता आबद्घ कर मुकदमेंबाजी के खेल के चलते 78 दलित सहायक समीक्षा अधिकारियों के अतिरिक्त लगभग 400 सचिवालय कार्मिक पीडि़त हैं। सचिवालय में भीतरी बनाम बाहरी की लड़ाई में सचिवालय प्रशासन विभाग और कर्मचारी संगठनों की मांग तो ठीक है, लेकिन इस पर विचार किया जाए कि सचिवालय सेवा के खाली लगभग 800 पदों पर विगत 20 वर्षों से भर्ती न होने देने की कुप्रयास किया गया है, उस चंगुल से सचिवालय प्रशासन विभाग कैसे मुक्त होगा। इन 800 पदों के लिए निर्धारित शासकीय दायित्व निर्वाहन कराए के लिए किसी न किसी कर्मचारी को सम्बद्घ करना पड़ेगा। 

 

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