17 August, 2018

जमी थी महफ़िल हुश्न-ओ-शवाब की, उनके साथ डूबना भा गया। निहारा जब नयन-ए-शराब को, तो मुझे अजीब नशा छा गया।। [caption id="attachment_41103" align="alignleft" width="229"] लेखिका : सुषमा मलिक, रोहतक (हरियाणा)[/caption] समेट लायी हूं मैं यादों में, झील किनारे बिताए  खुशनुमा पल। इन शरारती नजरो को उनका, इस अदब से

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[caption id="attachment_39749" align="alignleft" width="150"] ​ सुषमा मलिक, रोहतक महिला प्रदेशाध्यक्ष CLA हरियाणा[/caption] भूले से भी ना तुम  आँसू बहाना। उठा कर जनाजा कंधो पर अपने, मुझे शमशान तक सभी छोड़ आना।। होंगे उस वक़्त वो नींद में मगरूर, भूले से भी ना उसे तुम जगाना।। मैय्यत में मेरी तुम सभी चले

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