19 July, 2018

हर घर के कर का देना होगा हिसाब

एनडीएस ब्यूरो
लखनऊ। विधानसभा के पटल पर रखी गई सीएजी की रिपोर्ट में शहरी निकायों की आय के बारे में की गई टिप्पणी के बाद सरकार ने निकायों पर पूरा टैक्स वसूलने का दबाव बनाना शुरू कर दिया है। सभी नगर निगमों की वास्तविक आय जानने के लिए नगर विकास विभाग ने नगर निगमों के रेकॉर्ड में दर्ज संपत्तियों का ब्योरा मांग लिया है। सीएजी ने रिपोर्ट में टिप्पणी की थी कि शहरी निकाय केवल सरकारी अनुदान के भरोसे चल रहे हैं। हाउस टैक्स शहरी निकायों में आय का सबसे बड़ा स्रोत है, लेकिन प्रदेश के किसी भी शहरी निकाय में टैक्स वसूली की स्थिति ठीक नहीं है। हाल यह है कि जितने भवनों से टैक्स वसूला जा रहा है, उससे ज्यादा संख्या ऐसे भवनों की है, जिनपर टैक्स लगाया ही नहीं गया है। अकेले लखनऊ नगर निगम की बात करें तो यहां पांच लाख से ज्यादा भवन होने का अनुमान है, लेकिन टैक्स महज दो लाख से कुछ ज्यादा भवनों से ही वसूला जा रहा है।
यही स्थिति वाराणसी, कानपुर, इलाहाबाद, गोरखपुर और मेरठ नगर निगम की भी है। वाराणसी में 40 प्रतिशत से ज्यादा, कानपुर में 60 प्रतिशत से ज्यादा, इलाहाबाद में 50 प्रतिशत, गोरखपुर में 40 प्रतिशत और मेरठ में 55 प्रतिशत से ज्यादा भवनों पर टैक्स लगाया ही नहीं जा रहा है। सरकार ने अब सभी नगर निगमों से कुल प्रॉपर्टी और उनपर लगाए जा रहे टैक्स का ब्योरा देने को कहा है। यह भी बताने को कहा है कि कितने भवनों का किस तरह कमर्शल इस्तेमाल हो रहा है और उनसे कितना टैक्स लिया जा रहा है। इसके अलावा ऐसे कितने भवन हैं, जिनपर अब तक टैक्स नहीं लगा है। सरकार ने हाउस टैक्स से अनुमानित आय के साथ यह भी जाना है कि बीते साल कितना टैक्स वसूला गया।
नगर निगमों को यह भी बताना होगा कि वॉटर टैक्स की डिमांड क्या है। बीते साल कितना पैसा वॉटर टैक्स के रूप में वसूला गया। इसके अलावा कितने भवनों में पानी का इस्तेमाल कमर्शल हो रहा है और वहां से कितना टैक्स लिया जा रहा है। कहां से टैक्स नहीं लिया जा रहा है, इसका ब्योरा भी देना होगा।
तीन लाख से अधिक आबादी वाले शहर बन सकेंगे नगर निगम
लखनऊ। प्रदेश सरकार ने एक बार फिर नगर निगम व नगर पालिका परिषद के गठन के नए सिरे से मानक तय किए हैं। अब तीन लाख से अधिक आबादी वाले शहर भी नगर निगम बन सकेंगे। बशर्ते प्रस्तावित क्षेत्र की 75 फीसद से अधिक जनसंख्या का व्यवसाय गैर कृषि कार्य हो। प्रस्तावित क्षेत्र में सड़क यातायात का अच्छा नेटवर्क हो। वहीं, नगर पालिका परिषद के लिए आबादी का मानक दो से पांच लाख के बजाय घटाकर दो से तीन लाख कर दिया गया है। दरअसल, नगर पंचायत को नगर पालिका परिषद व पालिका परिषद को नगर निगम बनाने तथा मौजूदा नगरीय निकायों का सीमा विस्तार करने के संबंध में सन 1986 के शासनादेश के तहत मानक तय थे।
पिछली सपा सरकार ने वर्षों पुराने मानकों को बदलते हुए वर्ष 2014 में नए सिरे से मानक तय किए थे। मौजूदा सरकार ने तेजी से बदलते शहरी परिदृश्य और नागरिकों को बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराए जाने के मद्ïदेनजर एक बार फिर प्रथम श्रेणी की नगर पालिका परिषद के लिए तय मानकों में बदलाव करने का फैसला किया है। प्रमुख सचिव नगर विकास मनोज कुमार सिंह द्वारा इस संबंध में शासनादेश जारी किया गया है जो कि तत्काल प्रभाव से लागू भी हो गया है। सरकार द्वारा अब तय किए गए मानक के मुताबिक प्रथम श्रेणी की नगर पालिका परिषद की स्थापना के लिए निधाज़्रित जनसंख्या के मानक को घटा दिया है। पहले दो से पांच लाख की आबादी वाले क्षेत्र को ही नगर पालिका परिषद बनाया जाता था। इसे घटाकर दो से तीन लाख की आबादी कर दी गई है। हालांकि, नगर पालिका परिषद बनने की शेष शर्ते यथावत रखी गई हैं।

 

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