23 March, 2019

चुनाव करीब, फिर शुरू हुआ कस्मे वादों का दौर

  • समस्याएं कम करने के दावे कभी पूरे नहीं हो पाते
  • ग्रामीणों का कहना है, सिंचाई के दौरान नहरे सूखी, बिगड़े पड़े हैं 405 नलकूप

इटौंजा-लखनऊ। चुनाव आते ही शुरू हुआ कसमो व वादों का सिलसिला इटौंजा व बख्शी का तालाब क्षेत्र किसान बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण हर बार किसानों के खेत में पानी पहुंचाने बिजली व खाद मयस्सर कराने के सपने दिखाए गए। पर स्थिति ढाक के तीन पात रही न तो नहर मे समय से पानी और न ही नलकूप पानी देते हैं। ऐसे में किसान की खेती सूखती जा रही है और किसान कर्ज के बोझ से डूबा हुआ है।लोकसभा चुनाव के दौरान बख्शी का तालाब विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं का किसानों से प्राप्त की गई जानकारी तो जो तस्वीर उभर कर आई। उसे राजनीतिक दलों के दावे की असलियत सामने आ गई। परसहिया निवासी नीलम का कहना है कि क्षेत्र में सिंचाई के लिए पानी की किल्लत है। बक्शी का तालाब ब्लॉक में 84 राजकीय नलकूप है तथा एक दर्जन नहरे हैं। सिंचाई के दौरान नहरे सूखी और 40ù नलकूप बिगड़े। नलकूप खराब रहने की वजह से किसानों की फसलों की सिंचाई समय से नहीं हो पाती है इसके लिए डीजल चालित पंपिंग सेट का प्रयोग करना पड़ता है जो कि काफी महंगा साबित होता है।

चुनाव आने पर सभी प्रत्याशी इस समस्या को हल करने के बड़े बड़े दावे करते हैं पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। इटौंजा कस्बे के शकील अहमद का कहना है कि यहां आलू पैदा करने वाले किसानों की दशा बेहद खराब है। आज तक इसके विपणन की व्यवस्था नहीं की गई है। इनका कहना है कि फसल की ऊंची कीमत प्राप्त करने के लिए किसान अपना आलू कोल्ड स्टोरेज में रख देते हैं पर समय से उठान होने पर काफी हानि उठानी पड़ती है। उचित मूल्य न मिलने पर उनके लिए कोल्ड स्टोरेज का किराया देना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में कोल्ड स्टोरेज मालिक उनका आलू बाहर निकाल देता है और कम भाव पर आलू बेचना पड़ता है। सिंघामऊ ् के किसान रामनरेश सिंह भदौरिया ने बताया कि डीएपी, यूरिया, पोटाश व अन्य खादों के साधन सहकारी समितियों में भारी कमी रहती है। समितियों में आने वाली खाद बड़े और प्रभावशाली किसान उठा लेते हैं। इनका कहना है कि 3 साल पहले तक केवल डीएपी खाद की किल्लत होती थी लेकिन यूरिया खाद आसानी से मिल जाती थी। अब यूरिया के साथ साथ डीएपी की भी किल्लत है। एक बोरी खाद के लिए किसानों को कई दिनों तक इंतजार करना पड़ता। इस इंतजार के बाद भी यह जरूरी नहीं है कि उसे सहकारी साधन समिति से खाद मिलेगी या नहीं इन समितियों में खाद ना मिलने से विवश होकर किसानो को ऊंचे दामों पर बाजार से खाद खरीदनी पड़ती है। खाद का अधिक मूल्य होने तथा समय से ना मिलने के कारण फसलों का उत्पादन प्रभावित होता है।राजापुर गांव के सिया राम कनौजिया का कहना है कि धान की खेती के लिए इस क्षेत्र की अलग पहचान है पर फसल की सही कीमत नहीं मिल पाती है। धान क्रय केंद्रों की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि किसान व्यापारियों व दलालों के हाथ धान औने पौने दामों में बेचने के लिए विवश है। यही स्थिति गेहूं व अन्य कृषि उत्पादों की भी है। लचर सरकारी व्यवस्था के चलते व्यापारी और बिचौलिए किसान की उपज का लाभांश ले जाते हैं। क्रय केंद्रों की अव्यवस्था से भी आला अफसर व जनप्रतिनिधि परिचित है। जनप्रतिनिधि किसानों की समस्या को जानते हुए भी अनदेखा कर देते हैं। गन्ना किसानों के लिए क्रय केंद्र पर हो रही घटतौली भी यहां की एक बड़ी समस्या है।

rgautamlko@gmail.com

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