18 February, 2019

रोस्टर प्रणाली के खिलाफ दलितों और पिछड़ों में धधक रही है आग

शिशुपाल सिंह

लखनऊ। सरकारी नौकरियों में लागू रोस्टर प्रणाली से अनारक्षित अर्थात सामान्य वर्ग को 50 से 100 प्रतिशत आरक्षण देने के प्रावधान से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा अन्य पिछड़े वर्गो में जबरदस्त आक्रोश है। जिसको लेकर विरोध शुरू हो गया है। लागू रोस्टर प्रणाली से आरक्षण पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। इसको लेकर जहां एक ओर भारतीय जनता पार्टी सवालों के घेरे में है तो दूसरी ओर विपक्षी पार्टियों इस मुद्दे पर हाथ तापने की फिराक में हैं।

बताते चलें कि 2 जुलाई 1997 को भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय द्वारा जारी ऑफिस मेमोरेन्डम में आरक्षण रोस्टर को पद आधारित करने की व्यवस्था की। आर.के. सबरवाल बनाम पंजाब राज्य मामले में सर्वोच्च न्यायलय के संवैधानिक पीठ ने निर्णय दिया की आरक्षण पदों पर लागू होना चाहिए न की रिक्तियों पर। न्यायलय ने आदेश में आगे यह भी कहा था की रिक्त आधारित रोस्टर तब-तब चलाया जा सकता है जब तक की आरक्षित वर्गो का समुचित प्रतिनिधित्व निर्धारित प्रतिशत तक न पहुंच जाए। इसके साथ ही भारत सरकार ने ये आदेश पारित किया कि आरक्षण पदाधारित होगा न कि रिक्ति आधारित। 2 जुलाई 1997 से लागू होने वाले पद आधारित रोस्टर में सभी नियुक्तियों को रोस्टर में व्यवस्थित करना आवश्यक होगा। इसके लिए सर्वप्रथम पदों को चिन्हित किया जाएगा। इसके बाद यह तय करना होगा कि किस श्रेणी द्वारा कोई पद भरा जाएगा।

आरक्षण बचाओ संघर्ष समिति के कार्यवाहक अध्यक्ष अवधेश वर्मा ने कहा कि रोस्टर प्रणाली आरक्षण की धार को समाप्त करने का हथियार है। रोस्टर सिद्घान्त के अनुसार सरकारी सेवाओं में आरक्षण पदों का है न कि रिक्तियों का। इसका नतीजा हुआ कि 22 वर्षो से लागू होने के बावजूद पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व भारत सरकार में 4 प्रतिशत बढ़कर 17 प्रतिशत से अधिक नहीं हो सका जो मण्डल कमीशन की रिर्पोट के अनुसार 1980 में 12.55 प्रतिशत थी। अर्थात 24 सालों मे 4.5 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी आरक्षण लागू करने वाली व्यवस्था पर बड़ा सवालिया निशान है।

उन्होंने बताया कि समुचित रोस्टर की पहचान भर्ती के तरीके और पदों की संख्या के आधार पर की जाएगी। प्रत्येक रोस्टर में अंकों की सख्या, प्रत्येक संवर्ग में पदों की संख्या के बराबर होगा। अनुसूचित जाति या पिछड़े वर्ग को पूर्णांक प्राप्त होने पर ही आरक्षण प्राप्त होगा। रोस्टर में पदों को चिन्हित करने के लिए पदों से निर्धारित आरक्षण प्रतिशत का गुणा करने पर पूर्णांक बनने वाला पद उस श्रेणी के लिए आरक्षित होगा। तीन पदों तक कोई भी आरक्षण लागू नहीं होगा। यदि किसी विभाग में केवल तीन पद है तो हमेशा के लिए सामान्य वर्ग का 100 प्रतिशत आरक्षण हो गया। इसका प्रमाण केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में देखा जा सकता है जहां 2300 प्रोफेसरों मे से केवल एक पद ओबीसी के लिए आरक्षित हैं, जबकि एसोसिएट प्रोफेसर के मात्र 6 पद।  यदि किसी विभाग में केवल 14 पद हो तो 9 पद हमेशा के लिए सामान्य वर्ग हेतु आरक्षित हो गये जो लगभग 65 प्रतिशत है जबकि आरक्षित वर्ग 35 प्रतिशत। यदि किसी विभाग में 13 पद हो तो 9 पद हमेशा के लिए सामान्य वर्ग हेतु आरक्षित होगें जो लगभग 70 प्रशित होगा। और आरक्षित वर्ग को 30 प्रतिशत। अखिल भारतीय स्तर पर सीधी भर्ती और पदोन्नतियों के लिए जहाँ केवल 13 से कम पद होते है। वहां पर रोस्टर लागू नहीं हो पाता है। तीनों श्रेणियों (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जन जाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग) के लिए इस उद््देश्य की पूर्ति के लिए 13 बिन्दु रोस्टर तैयार किया गया है।

वरिष्ठï पत्रकार और दलित चिंतक ए.पी. दीवान का कहना है कि प्रत्येक श्रेणी का आरक्षण उसकी निर्धारित सीमा के अन्दर हर हाल में होना चाहिए। कुल आरक्षण किसी भी स्थिति में पच्चास प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए। यह भी व्यवस्था है कि आरक्षित श्रेणी के जो लोग अपनी मेरिट से सीधी भर्ती द्वारा सामान्य वर्ग के पद पर चयनित होते है, उन्हे सामान्य श्रेणी का मान लिया जाएगा। इसके बाद वास्तविक स्थिति की गणना की जायेगी कि विभिन्न श्रेणियों द्वारा कितने प्रतिशत पद भरे गये। यदि किसी श्रेणी का प्रतिनिधत्व ज्यादा होता है, यह कुल आरक्षण का 50 प्रतिशत से अधिक होता है, तो इसे भविष्य में व्यवस्थित किया जायेगा। वर्तमान भर्ती को डिस्टर्ब नहीं किया जायेगा। बाद में उत्पन्न होने वाली रिक्तियों की भर्ती के दौरान उतने पद, सामान्य वर्ग द्वारा भरे जाएंगें जितने लोग आरक्षित श्रेणी के सामान्य वर्ग में भरे गये थे। प्रतिनिधित्व की यह व्यवस्था 2 जुलाई 1997 के बाद उत्पन्न होने वाली श्रेणियों के लिए है। अर्थात पहले जो

अनुचित प्रतिनिधित्व है उसे जायज ठहराया गया। यदि पद चिहिन्त हैं और रिक्तियों में आरक्षण नहीं है तो अनारक्षित होने का सवाल ही नही उठता है। इसका अर्थ है कि बाकी सभी पद सामान्य वर्ग के लिए चिन्हित हो जाता है, जो 50 प्रतिशत से लेकर 100 प्रतिशत तक है।

वरिष्ठï पत्रकार राजेन्द्र के. गौतम का कहना है कि वर्तमान रोस्टर व्यवस्था से अनारक्षित वर्ग को 50 प्रतिशत से 100 प्रतिशत आरक्षण दिया जा रहा है। इसकी विसंगति यूं समझा जा सकता है कि यदि सामान्य वर्ग के लोगों को भी 15 प्रतिशत आरक्षण देकर इसी तरह की रोस्टर में प्रतिनिधित्व दिया जाए तो बाकी बचे पद हमेशा के लिए खाली  छूट जाएंगें। वर्तमान रोस्टर की यही खामी है। यदि 15 प्रतिशत आरक्षण सवर्णो को देने के बाद अर्थात (15 सवर्ण प्लस 15 अनुसूचित जाति प्लस 7.5 अनुसूचित जन जाति प्लस 27 प्रतिशत अन्य पिछड़े वर्ग बराबर 64.5 प्रतिशत) की सीमा में बाँध दिया जाएं तो 34.5 प्रतिशत पद हमेशा के लिए खाली रहेगें। सामान्य वर्ग का प्रतिनिधित्व भी निर्धारित होना चाहिए न कि बाकी सभी सीटें उनके लिए आरक्षित/चिन्हित कर दी जांए। कभी-कभी तो ऐसी स्थिति आ जायेगी जब 50 प्रतिशत से अधिक पदों पर किसी भी हालत में किसी की भर्ती नहीं हो सकती है।

उन्होंने कहा कि अत: 50 प्रतिशत से 70 प्रतिशत तक सामान्य वर्ग के लिए आरक्षण की व्यवस्था को खत्म किया जाय तथा रिक्त आधारित आरक्षण पुन: लागू होना चाहिए जैसा की सर्वच्च न्यायलय की सम्वैधानिक पीठ ने भी कहा है कि रिक्त आधारित व्यवस्था तब तक चलती रहनी चाहिए जब तक सभी आरक्षित वर्गो का निर्धारित आरक्षण पूरा नहीं हो जाता।

समाज सेविका ताहिरा हसन का कहना है कि आवश्यकता इस बात की है कि खाली होने वाले पदों पर आरक्षण हो न कि 2 जुलाई 1997 के बाद बने रोस्टर के अनुसार खाली होने वाले पदों पर। यदि सर्वोच्च न्यायालय की मंशा अनुसार निर्धारित आरक्षण 27 प्रतिशत,15 तथा 7.5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व पूरा करने के लिए आरक्षित वर्गो का विशेष भर्ती अभियान चलाया जाए और निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त किया जाय। खाली होने वाले सारे पदों पर तब तक आरक्षित लोगों  से भरा जाए जब तक कि आरक्षित वर्गो का प्रतिनिधित्व 27,15 और 7.5 प्रतिशत का लक्ष्य न प्राप्त कर ले। उन्होंने कि न्याय का सिद्धांत कहता है कि भूखे को खाना पहले मिलना चाहिए जब कि रोस्टर में सामान्य वर्ग को पहले स्थान दिया गया है और शुरू के तीन पद तक हमेशा के लिए अनारक्षित वर्ग के लिए चिन्हित कर दिए गये। सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि रिक्ति आधारित व्यवस्था तब तक जारी रहनी चाहिए जब तक प्रतिनिधित्व का लक्ष्य पूरा नहीं हो जाता है। ऐसी स्थिति में रिक्त आधारित आरक्षण व्यवस्था लागू की जानी चाहिए। इसके अलावा खुली प्रतियोगिता के आधार पर चयनित लोगों को सामान्य वर्ग में माना जाए और  2 जुलाई 1997 को जारी ऑफिस मेमोरेन्डम के अनुसार भविष्य में होने वाली भर्तियों में एडजेस्ट करने की व्यवस्था समाप्त की जाए।

 

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