20 November, 2017

पत्रकारिता में बढ़ रहा है सौदेबाजी का चलन

दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले भारत में अभी तक पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने वाला कोई ठोस कानून नहीं है। सत्य की कलम से लिखने वाले पत्रकार पर मौत का साया हरदम मंडराता रहता है। पत्रकारों की सुरक्षा से संबंधित कानून को जब भी लाने की बात की गई तो उस पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। आखिर ऐसा क्या है जो देश की सत्ता पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने देती क्यों कानून लाने की बात पर वह चुप्पी साध लेती है। भारत के संविधान में जहां सूचना लेने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, वहां इस अधिकार के कई बार हनन के बावजूद सरकार क्यों कुछ नहीं करती। क्या यह लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों पर प्रश्न चिन्ह नहीं है। यह बातें वरिष्ठï पत्रकार तारकेश्वर मिश्र ने निष्पक्ष दिव्य संदेश के संवाददाता त्रिनाथ के. शर्मा से एक साक्षात्कार में कहीं। पेश है बातचीत के सम्पादित अंश…

प्रश्न: अपने बाल्य जीवन और शैक्षिक सफर के बारे में कुछ बताएं?
उत्तर: मेरा जन्म 1 जुलाई 1967 को गांव अमड़ी, तहसील आलापुर जनपद अंबेडकर नगर में हुआ। मेरा पिता जी का नाम स्वर्गीय राम केवल मिश्र था, जो एक साधारण किसान थे। माता जी का नाम श्रीमती उदासी देवी था। वो एक साधारण गृहणी हैं। मेरी प्रारम्भिक शिक्षा गांव के प्राथमिक विद्यालय में हुई। हाई स्कूल कृषक ग्रामोद्योग इण्टर कॉलेज, नरियावं, आजमगढ़ में हुई। इण्टर परीक्षा भी कृषक ग्रामोद्योग इण्टर कॉलेज से उत्तीर्ण की। स्नातक डिग्री आजमगढ़ जनपद के प्रतिष्ठित कोयलसा डिग्री कॉलेज से प्राप्त की। हमारा परिवार अधिक सुविधा संपन्न तो नहीं था। लेकिन माता-पिता जी ने जो हमें संस्कार दिये वही हमारी असल पूंजी है। पिता जी पढ़ाई-लिखाई का तरजीह देते थे। उनका कहना था कि एक शिक्षित इंसान ही अपने परिवार, समाज और देश का भला कर सकता है।

प्रश्न: पत्रकारिता में आना कैसे हुआ?
उत्तर: विधार्थी जीवन से पत्रकारिता मुझे आकर्षक पेशा लगता था। मुझे लगता था कि इस पेशे के माधयम से आप दुखी, पीडि़त, अभावग्रस्त और गरीब लोगों की अधिकतम मदद कर सकते हैं। इन सब विचारों और व्यक्तिगत रूचि के चलते जिले के कई वरिष्ठ पत्रकार साथियों से मेरा परिचय हो गया। इनमें एक श्रीनाथ सहाय जो कि आजमगढ़ में अध्यापक थे। साथ ही साथ वाराणसी से प्रकाशित हिन्दी दैनिक पत्र सन्मार्ग व आकाशवाणी लखनऊ से बतौर संवाददाता जुड़े थे। सहाय जी ने पत्रकारिता के प्रति मुझे प्रेरित किया। एक पत्रकार के नाते आप समाज के लिये कुछ हटकर कर सकते हैं। दिन ब दिन मेरा पत्रकारिता के प्रति रूझान बढ़ता चला गया। वर्ष1991 में मैंने बनारस से प्रकाशित हिन्दी ‘दैनिक सन्मार्गÓ से पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया। इसके बाद मैंने अपने गृह जनपद से लखनऊ से प्रकाशित प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ‘कुबेर टाइम्सÓ में बतौर जिला संवाददाता के रूप में अपनी सेवाएं दी। कुबेर टाइम्स से मेरा साथ छूटा तो देश की प्रख्यात समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्टऑफ  इण्डिया (पीटीआई) में जिला संवाददाता का दायित्व मैंने बखूबी निभाया। पीटीआई के साथ काम करने के दौरान काफी कुछ समझने सीखने का अवसर मिला। इसके बाद मेरी पत्रकारिता की यात्रा का अगला पड़ाव लखनऊ बना। लखनऊ आकर मैंने हिन्दी पत्रकारिता के सबसे बड़े समाचार पत्र हिन्दी दैनिक ‘पंजाब केसरीÓ के जालंधर संस्करण के ‘उत्तर प्रदेश राज्य प्रमुखÓ का दायित्व निभाया। लखनऊ के बाद मेरी पत्रकारिता की गाड़ी का अगला स्टापेज चण्डीगढ़ था। चण्डीगढ़ में मैने ‘न्यूज टाइम्सÓ न्यूज चैनल लांच करने में अग्रणी भूमिका निभायी। प्रिंट मीडिया के बाद इलेक्ट्रानिक मीडिया में काम करने का अलग अनुभव प्राप्त किया। लेकिन किस्मत ने एक बार फिर जोर मारा और वर्ष 2008 में दोबारा लखनऊ पहुंच गया। इस बार मैं सुभारती मीडिया लि. के हिन्दी दैनिक ‘प्रभातÓ का बतौर संपादक नियुक्त हुआ। 2013 में प्रभात का अलविदा कह दिया और बतौर संपादक लखनऊ एवं पटना से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘जनमाध्यमÓ के संपादक का पद संभाला। वर्ष 2016 में जनमाध्यम को बॉय-बॉय कहकर स्वतंत्र पत्रकारिता एवं लेखन की राह पकड़ ली। इन दिनों मैं देश की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं हेतु लेखन कर रहा हूं। जल्द ही सामाजिक समस्याओं और वर्तमान में  राजनीतिक हालातों पर मेरी पुस्तकें प्रकाशित होने वाली हैं। इन दिनों पुस्तकों पर कार्य कर रहा हूं। पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्य करना चुनौतीपूर्ण होता है।

प्रश्न: आपको क्या लगता है कि पत्रकारिता में गिरावट आई है। यदि आई है तो आप किसे दोषी मानते हैं?
उत्तर: वर्ष 1947 से पहले पत्रकारिता को मिशन माना जाता था, वर्ष 1947-75 तक मीडिया में प्रोफेशन का दौर था। आपातकाल के खत्म होने के बाद पत्रकारिता में गिरावट आनी शुरू हो गई थी और वर्ष 1991 से उदारीकरण के कारण मीडिया में कमर्शियलाइजेशन का दौर आया। लेकिन पेड न्यूज के दौर में पत्रकारिता के लिए कमर्शियल शब्द भी छोटा पड़ रहा है। पहले की पत्रकारिता समाज और देश को दिशा देने वाला एक मिशन रही है। पहले पत्रकार अपनी विचारशील लेखनी से सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक पहलुओं पर अपने दूरदर्शी लेख लिखकर समाज और देश को अच्छी दिशा देने का काम करते थे। वे जनता के सामने सही तथ्य खोजकर लाते थे। उनकी भूमिका एक प्रहरी जैसी होती थी। लेकिन आज पत्रकारिता में काफी लोग ऐसे आ गए हैं जिनका पत्रकारिता से कोई लेना-देना नहीं रहा है। अश्लीलता दिनों-दिन पत्रकारिता पर हावी होती जा रही है। आज पत्रकारिता सनसनीखेज अधिक हो गई है। विकास, रचनात्मक, जनहित ग्राम्य क्षेत्रों की खबरों को स्थान कम मिलता है जो कि किसी भी विकासशील देश व समाज के लिए ठीक नहीं है।

प्रश्न: वर्तमान समय में पत्रकारिता जगत में आप क्या बदलाव देखते हैं?
उत्तर: वर्तमान दौर में सौदेबाजी की पत्रकारिता हो रही है। यदि किसी को मीडिया द्वारा कवरेज करवानी है तो उसका मूल्य पहले से ही निर्धारित होता है। कमर्शियल में समाचार पेड नहीं होता, विज्ञापन के जरिए पैसा कमाया जाता है लेकिन अब पत्रकारिता में डील हो रही है। जो लोग इसको कर रहे है वह इसे व्यावसायिक पत्रकारिता मानते हैं। आज पत्रकारिता अपने मार्ग से भटक रही है। पत्रकारिता के आधार पर प्राप्त शक्तियों का पत्रकार दुरूपयोग कर रहे हैं। पहले पत्रकार देश में हो रहे घपलों, घोटालों व भ्रष्टाचार को उजागर करते थे लेकिन अब वह इसका हिस्सा बन रहे हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में जिस तरह शीर्ष पत्रकारों का नाम आया उससे पत्रकार की गरिमा पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। पत्रकारिता के क्षेत्र में सभी स्तरों के पत्रकार प्रेस को प्राप्त अधिकारों को अपने विशेषाधिकार समझने लगे हैं और इसका दुरुपयोग कर रहे हैं।

प्रश्न: वर्तमान में जहां चौथे स्तम्भ की भूमिका पर सवालिया निशान खड़े किए जा रहें हैं, ऐसी दशा में क्या आपको लगता है कि इसमें कोई सुधार हो सकता है?
उत्तर: पत्रकारिता के स्तर में गिरावट जरूर आई है। यदि कोई बहुराष्ट्रीय कम्पनी अगर अपना उत्पाद बाजार में लेकर आती है तो उसे मीडिया के माध्यम से समाचार के रूप में प्रस्तुत करवाती है। राजनैतिक दलों द्वारा भी चुनाव के समय मीडिया से डील किया जाता है और संवाददाता के जरिए उम्मीदवार का प्रचार कराया जाता है। पत्रकारिता को बचाने वाले अब कम ही लोग रह गए हैं और अन्य धक्का देकर निकल रहे हैं, लेकिन मीडिया में अब भी कई लोग ईमानदारी से काम कर रहे हैं। पत्रकारिता में अभी स्थिति वहां तक नहीं पहुंची कि कुछ सुधार नहीं किया जा सकता। अच्छी पत्रकारिता आवाज बनकर उठेगी।

प्रश्न: पाश्चात्य संस्क्तति के बढ़ते प्रभाव के कारण आज अंग्रेजी भाषा का जो प्रचलन बढ़ा है, ऐसे में हिन्दी पत्रकारिता को किन चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है?
उत्तर: हिन्दी पत्रकारिता की हम जब भी चर्चा करते हैं तो हम उसको अंग्रेजी के सामने लाकर खड़ा कर देते हैं जो गलत है। हिन्दी अंग्रेजी की प्रतिस्पर्धी भाषा नहीं है। भारतीय पत्रकारिता ने अंग्रेजी भाषा को कभी भी अपना प्रतिस्पर्धी नहीं माना लेकिन जब भी हिन्दी पत्रकारिता को बढ़ाने की बात की गई तो हमने कह दिया कि अंग्रेजी के कारण ऐसा नहीं हो रहा। पिछले 10 सालों में हिन्दी पत्रकारिता का विस्तार हुआ है।

प्रश्न: पत्रकारों पर हो रहे हमलों पर आपकी क्या राय है?
उत्तर: दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा करने वाले भारत में अभी तक पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करने वाला कोई ठोस कानून नहीं है। सत्य की कलम से लिखने वाले पत्रकार पर मौत का साया हरदम मंडराता रहता है। पत्रकारों की सुरक्षा से संबंधित कानून को जब भी लाने की बात की गई तो उस पर कभी भी गंभीरता से विचार नहीं किया गया। आखिर ऐसा क्या है जो देश की सत्ता पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होने देती क्यों कानून लाने की बात पर वह चुप्पी साध लेती है। भारत के संविधान में जहां सूचना लेने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है, वहां इस अधिकार के कई बार हनन के बावजूद सरकार क्यों कुछ नहीं करती क्या यह लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों पर प्रश्न चिन्ह नहीं है।

प्रश्न: क्या आप मानते हैं कि पत्रकार संगठन अपना दायित्व ईमानदारी से निभा रहे हैं?
उत्तर: पत्रकार संगठन भी अपने मूल उद्देश्य से भटक गये हैं। तमाम पत्रकार संगठन व्यक्तिगत राजनीति चमकाने का मंच बन चुके हैं। पत्रकार संगठन आम पत्रकार की समस्याओं, सेवा संबंधी, आवास एवं परेशानियों को उठाने की बजाय इधर-उधर के मुद्दों पर ऊर्जा खपाते दिख रहे हैं। जबकि पत्रकारों के सुरक्षा, सेवा नियमावली, वेतन, भत्ते, सुविधाएं, मान्यता और आवास संबंधी तमाम ऐसे मुद्दे हैं जिन पर सभी संगठन मौन धारण किये हैं।  

प्रश्न: विज्ञापनों की होड़ ने प्रिंट मीडिया को कितना प्रभावित किया है?
उत्तर: विज्ञापनों की प्रतिस्पर्धा ने पत्रकारिता के मूल सरोकार को बेपटरी कर दिया है। समाचार पत्रों में आम आदमी के मुद्दे को प्राथमिकता न देकर शहरी माल, आईटी सेक्टर के समाचारों को प्रमुखता दी जा रही है। अब अखबार बाजार के मुताबिक चलने लगे हैं। सरकारी विज्ञापनों को हथियाने के लिये समाचार पत्रों में गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हो गई है। इसलिये अधिकतर संपादक मैनेजर की भूमिका में आ गये हैं। विज्ञापनों की होड़ और बढ़ते बाजारीकरण ने पत्रकारिता पर गहरा असर डाला है। इससे इंकार नहीं किया जा सकता है।

प्रश्न: भविष्य की पत्रकारिता कैसी होगी?
उत्तर: वर्तमान में पत्रकारिता में संक्रमण के दौर से गुजर रही है। इलेक्ट्रानिक मीडिया पिं्रट मीडिया पर हावी है। लेकिन मेरा मानना है कि इलेक्ट्रानिक फास्ट फूड है। भूख पिं्रट मीडिया से ही शांत होती है। वेब मीडिया ने  अपना नया रास्ता खोल दिया है, जहां से चल कर कम संसाधनों में एक मजबूत पत्रकारिता की मंजिल तय की जा सकती है। सोशल मीडिया ने जनता को जागरूक किया है। वहीं हर व्यक्ति पत्रकार की भूमिका निभाता दिख रहा है। कुल मिलाकर वर्तमान में जो माहौल देश में बना है वो पत्रकार और पत्रकारिता के लिहाज से ज्यादा बेहतर नहीं है।

प्रश्न: आप युवा पत्रकारों को क्या सुझाव व सन्देश देना चाहेंगे?
उत्तर: पत्रकारिता का सत्य से वही नाता है, जो एक पतिव्रता पत्नी का अपने पति से होता है। पत्रकारों को यही सुझाव है कि वे पत्रकारिता जैसे दायित्वपूर्ण व्यवसाय में आए हैं तो उपरोक्त बात को मानकर चलें। वे सभी प्रकार के कष्ट झेलकर पत्रकारिता को समर्पित होकर सत्य से नाता जोड़ें। पत्रकारिता के स्वरूप व महत्व को समझते हुए लोक जीवन से जुड़ें। ईमानदारी और निरंतर अध्ययन से ही कोई अच्छा पत्रकार बन सकता है। अपने को नवीनतम जानकारी से अपडेट करते रहना चाहिए। ईमानदारी में बेईमानी की तुलना में आर्थिक लाभ भी ज्यादा है।.

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