21 October, 2018

मोदी के लिए 2019 होगा अश्वमेघ या अग्पथ?

भीषण गर्मी के बीच सरकार के चार साल पूरे करने की जश्न मना रही भाजपा की खुशियों को उपचुनाव परिणाम की लू लग गयी। तीन राज्यों की चार लोकसभा और नौ राज्यों की 11 विधानसभा सीटों के परिणाम से भाजपा को तगढ़ा झटका लगा है। कुल 15 सीटों पर हुए चुनाव में भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टिया सिर्फ तीन सीटें ही जीत सकी हैं। इन परिणामों से 2019 के आमचुनावों में भाजपा के खिलाफ संयुक्त विपक्ष की चुनौती की जमीन भी तैयार हो गई हैं। खासकर मोदी और योगी की प्रतिष्ठा से जुड़ी कैराना सीट पर भी बीजेपी की बड़ी हार हुई है। तो ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या 2019 से पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को यूपी के कैराना व नूरपुर ने बता दिया है कि अब यूपी में भाजपा या मोदी की दाल नहीं लगेगी। अब हर चुनाव विपक्षी गठबंध नही जीतेगी। या यूं कहे कैराना का संदेश है कि अगर विपक्ष एक साथ आया तो मोदी के विजयरथ को रोका जा सकता है

सुरेश गांधी

कैराना लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार विपक्षी एकजुटता की जीत है.। साथ ही ये संदेश भी है कि सांप्रदायिक ध्रवीकरण से हट कर मतदाताओं ने मुद्दों की राजनीति को तरजीह दी है। चुनाव जीतने के लिए हिंदुत्व का कार्ड ही अब वोटरों को लुभाने के लिए काफी नही है। चाहे वह व्यापारी हो या स्वयंसेवी संगठन हो या अन्य तबका सबके सब मोदी द्वारा देशहित में लिए गए फैसले से खफा है। कुल मतदाताओं के 40 प्रतिशत लोग सिर्फ और सिर्फ इस बात से खफा है कि मोदी के राज में धंधा हो या अन्य कामकाज सरकारी अभिलेखों के लिखा पढ़ी से वे त्राहि त्राही कर रहे है। दबी जुबान से ही सही लेकिन लोगबाग कहते फिर रहे है कि मोदी के स्लोगन ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा अब भारी पड रहा है। कहने को सारे अर्नगल क्रिया कलाप बंद है, लेकिन पार्टी के कद्दावार नेता और संघ के ओहदेदारों की सांठगांठ से अमृत त्रिपाठी जेसे भ्रष्ट या बेईमान अफसरों की मनपसंद जिलों में तैनाती धड़ल्ले से की जा रही है। इससे यूपी का आमजनमानस मोदी और योगी से खफा है। यहां तक कि लोगबाग यह कहने में भी संकोच नहीं कर रहे है कि इससे बढ़िया यूपीए था, जो खुद तो खाता था, आमजन को भी जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी इतनी हिस्सेेेेेेेेेेेेेेदारी, की तर्ज पर खाने की छूट दी थी। हो जो भी सच तो यही है कि 2019 के आम चुनावों की ओर बढ़ रहे राजनीतिक दलों के लिए ये नतीजे काफी दूरगामी असर डालने वाले हैं। खासकर यूपी में सपा-बसपा के बोल्ड सियासी फैसले ने साफ कर दिया कि बीजेपी के चाणक्य अमित शाह के लिए 2019 की जंग यूपी में 2014 जितनी आसान नहीं रहने वाली। अब मोदी मैजिक की काट विपक्षी दलों के पास है और वो है महागठबंधन का फॉर्मूला। जो पहले बिहार में सफल रही थी और अब यूपी में हर उपचुनाव में कामयाब होती जा रही है। या यूं कहे चाहे वह यूपी का नूरपुर कैराना हो या बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र सब जगह लोकसभा उपचुनाव के नतीजे के नतीजों ने साफ संकेत दे दिया है कि अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में साझा विपक्ष मैदान में उतरता है तो मोदी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है।
क्या हार से बीजेपी सबक लेंगी

 

बेशक, कैराना लोकसभा सीट पर बीजेपी की हार और साझा विपक्ष की जीत के कई मायने हैं। यूं कहे विपक्ष को मोदी को हराने का फार्मूला मिल गया है। अब मोदी-शाह की जोड़ी को उस विपक्षी एकता का कोई तोड़ निकालना ही होगा। जिसे दोनों अवसरवादिता की एकता कह-कहकर उसका सियासी मजाग उड़ाते रहे हैं। रोजगार-किसानों के मुद्दों समेत तमाम मुद्दों पर एंटी-इंकमबेंसी का सामना अब बीजेपी को करना होगा। क्योंकि अब सिर्फ ब्रांड मोदी के बूते जीत काफी नहीं है। मोदी सरकार को जनता के बीच असर दिखाने वाले ठोस कदम उठाने होंगे। किसानों, युवाओं के रोजगार के मुद्दे, आर्थिक गड़बड़ियों को रोक पाने में विफलता आदि ऐसे तमाम मुद्दे हैं जो विपक्ष को सरकार को घेरने का मौका दे रहे हैं। इसके अलावा राम मंदिर जैसे बीजेपी के कोर मुद्दों पर भी कोई ठोस पहल नहीं होना बीजेपी के लिए मुश्किल बढ़ा रही है। अभी देश के 20 से अधिक राज्यों में बीजेपी और सहयोगी दलों की सरकारें हैं। आने वाले वक्त में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्यों में चुनाव होने हैं। जबकि देश के सबसे बड़े राज्य यूपी जहां प्रचंड बहुमत के साथ बीजेपी जीतकर आई थी वहां लगातार उपचुनावों में हार हुई है। पार्टी को सरकार के कामकाज की जमीनी हकीकत पर गंभीरता से गौर करना होगा। महंगाई का मुद्दा बीजेपी के लिए बड़ा सिरदर्द बनता जा रहा है। पेट्रोल-डीजल कीमतों को लेकर खुद बीजेपी की सहयोगी दल जेडीयू ने सवाल खड़ा किया और चुनावी हार के लिए इसे जिम्मेदार ठहराया। यह अलग बात है कि यूपी-बिहार जैसे राज्यों में बढ़ती चुनौतियों के बीच बीजेपी के लिए कुछ अच्छे संकेत भी हैं। जैसे पश्चिम बंगाल में बीजेपी की लगातार पैठ बढ़ती जा रही है।। त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्य में जीत से नए इलाकों में पार्टी के लिए संभावनाएं बढ़ी हैं। तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश, ओडिशा जैसे राज्यों में बीजेपी सक्रिय हुई है और उसे इसका फायदा मिल सकता है।

 

अब्दुल्ला दीवाना की भूमिका में कांग्रेस

 

अगर विपक्ष में से सिर्फ कांग्रेस की बात की जाए तो उसके लिए नतीजों का निचोड़ यही है कि वो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की भूमिका में आती जा रही है और 2019 की विपक्षी एकता की धुरी बनने का अवसर गंवाती जा रही है। लिहाजा उसे इन नतीजों से बहुत ज्यादा खुश होने के बजाए बीजेपी की तरह चिंतित होना चाहिए। मतलब साफ है अगले छह महीने बाद होने वाले राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और बीजेपी के बीच का ही मुकाबला है। इन तीनों राज्यों में से दो (मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़) में बीजेपी तीन बार से काबिज है और राजस्थान का सियासी मिजाज बताता है कि वहां हर पांच साल बाद सत्ता में परिवर्तन होता रहता है। तीनों ही राज्यों में आमतौर पर बीजेपी और कांग्रेस के बीच हार जीत का अंतर डेढ़ से दो फीसद वोटों का रहता है (2013 को छोड़ दिया जाये तो)। पिछली बार तो छत्तीसगढ़ में कांग्रेस को बीजेपी से सिर्फ 0.75 फीसद वोट कम मिले थे और उसे विपक्ष में बैठना पड़ा था। इतना कुछ विस्तार से बताना इसलिए जरुरी है कि कांग्रेस को लग रहा है कि वह तीनों राज्यों में बीजेपी को अकेले ही पटखनी दे सकती है और किसी अन्य दल के लिए सीटें छोड़ने की गुंजाइश नहीं है। लेकिन यहां मायावती अपना हिस्सा मांग सकती है। कर्नाटक में मायावती ही विपक्षी दलों के बीच आर्कषण का केन्द्र रही थीं। मायावती समझ गयी हैं कि जिस तरह वह बीजेपी और मोदी की हार में अपने वजूद का बचना देख रही हैं वैसा ही कुछ अन्य विपक्षी दल भी देख रहे हैं जिसमें कांग्रेस भी शामिल है। ऐसे में मायावती राजस्थान और मध्यप्रदेश में खासतौर से कांग्रेस से सम्मानजनक समझौता करने को कह सकती है।

 

मोदी को दिखाना होगा बड़ा दिल

 

2019 में मोदी के खिलाफ अगर कांग्रेस को कुछ बड़ा करना है तो उसे इन राज्यों के विधानसभा चुनावों में बड़ा दिल दिखाना ही होगा। क्या वह ऐसा कर पाएगी, क्या राजस्थान में अशोक गहलोत और मध्यप्रदेश मे दिग्विजय सिंह ऐसा कर पाएंगे। इन उपचुनावों के नतीजों का यूपी 2019 पर खासा असर पड़ेगा। अभी तक मायावती और अखिलेश के बीच समझौते की बात हो रही है लेकिन अब कैराना में जीत के बाद अजीत सिंह का लोकदल भी उस गठबंधन का हिस्सा बनने को लालायित दिख रहा है। पहले फूलपुर, गोरखपुर और अब कैराना…तय है कि यूपी में अगर कांग्रेस भी इस गठबंधन में शामिल कर ली गयी (अगर उसने राजस्थान और एमपी के विधानसभा चुनावों में मायावती को सम्मान रखा) तो बीजेपी को सीधे-सीधे 50 सीटों का नुकसान उठाना पड़ सकता है। यूपी में बीजेपी के लिए चिंता की बात है कि अखिलेश यादव समझौते के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं। वह कह चुके हैं कि बड़ी लड़ाई में छोटे मोटे स्वार्थ ताक पर रखने ही पड़ते हैं। विधानसभा चुनावों में भी एसपी ने कांग्रेस के लिए एक दर्जन से ज्यादा ऐसी सीटें छोड़ दी थी जहां से पार्टी का जीतना तय था। यूपी में मुस्लिम वोटों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह बात भी कैराना ने तय कर दी है जहां से यूपी को पहला मुस्लिम सांसद मिला है।

 

ध्रुवीकरण की राजनीति को झटका

 

फिरहाल, इस जीत ने धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की राजनीति को झटका दिया है। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद से पश्चिमी यूपी में ध्रुवीकरण की राजनीति का जोर चल रहा था। 2013 के इन दंगों के बाद से इस इलाके में हिंदुओं और मुसलमानों के बीच खाई बढ़ी। 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनावों में वोट भी इन दंगों की आग और जख्मों के बीच पड़े। जिसका सीधा फायदा बीजेपी को मिला। मुसलमानों और जाटों के इस गढ़ में बीजेपी के आगे एसपी और बीएसपी ही नहीं, अजित सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोकदल की जड़ें भी उखाड़ फेंकी गई। लेकिन साझा विपक्ष की रणनीति ने कैराना में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को ध्वस्त कर दिया। विपक्षी रणनीति का ही तकाजा रहा कि एसपी, कांग्रेस और आरएलडी ने मिलकर अपना उम्मीदवार उतारा। बीएसपी ने सीधे सीधे एलान नही किया लेकिन समर्थन विपक्ष के उम्मीदवार को ही दिया। जाटों की पार्टी मानी जाने वाली आरएलडी से एक मुसलमान को कैंडिडेट बनाया गया। ताकि जाट और मुसलमान वोट साथ आ सकें। जब समीकरण साथ होते हैं तो कैमिस्ट्री भी बन जाती है। नतीजे सामने हैं। कैराना और नुरपूर की जीत ने ये भ्रम तोड़ दिया कि अभी मुसलमान कैंडिडेट का जीतना मुश्किल है। बल्कि दोनों सीटों पर जीत के साथ ये पैगाम भी चला गया कि अब दंगों की खाई काफी हद तक पाटी जा चुकी है।

 

एकजुटता की काट मंदिर निर्माण

 

मोदी की आंधी में पत्तों की तरह उड़ते विपक्ष को ये समझ आने लगा है कि बीजेपी को मात देने के लिए अपनी रणनीति दुरूस्त करनी होगी। नए सबक के साथ विपक्ष ने अपनी खिसकती जमीन को पाने की जद्दोजहद शुरू की। गोरखपुर और फूलपुर उपचुनाव के नतीजों ने एसपी-बीएसी को आगे भी एक साथ आने पर मजबूर किया। इस एकजुटता का असर ये हुआ कि विपक्ष ने मतदाताओं के सामने मुद्दों को मजबूती से रखा। राजनीति हिंदू-मुस्लिम की बजाय इलाके के मुद्दों पर केंद्रित हो गयी। कैराना और नूरपुर के नतीजे इसके गवाह हैं, जहां गन्ने के किसान अपने बकाया राशि का रोना रोते दिखे, तो वहीं सरकार बनने के सालभर बाद भी सड़क से लेकर बिजली और अपराध से लोग दो चार होते रहे। खासकर इस हार से सबसे बड़ा झटका सीएम और बीजेपी के स्टार प्रचारक योगी आदित्यनाथ के जिताऊ करिश्मे की छवि को लगी है। मतलब साफ है महागठबंधन की जीत बीजेपी की नींद उड़ाने के लिए काफी है। क्योंकि एसपी, बीएसपी, कांग्रेस और आरएलडी के साथ आने से बीजेपी को यूपी की हर सीट पर मुश्किल का सामना करना पड़ेगा। यहां तक कि एकजुट विपक्ष बनारस जैसी सीट में भी बीजेपी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। तबस्सुम हसन की जीत के साथ ही देश में मुसलमानों की सबसे बड़ी आबादी वाले सूबे से अब एक मुसलमान सांसद भी लोकसभा में होगा। आपको बता दें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में बीएसपी का खाता नहीं खुला तो कांग्रेस मां-बेटी (सोनिया-राहुल) की सीट तक सिमट गई थी। मुलायम भी 5 सीटों (परिवार के 5 सांसद) सिमट गए थे। 80 में 71 सीटें बीजेपी और दो सीटें बीजेपी की सहयोगी अपना दल को मिली थीं। लेकिन अब मोदी मैजिक की काट विपक्षी दलों के पास है और वो है महागठबंधन का फॉर्मूला। जो पहले बिहार में सफल रही थी और अब यूपी में हर उपचुनाव में कामयाब होती जा रही है। या यूं कहे चाहे वह यूपी का नूरपुर कैराना हो या बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र सब जगह लोकसभा उपचुनाव के नतीजे के नतीजों ने साफ संकेत दे दिया है कि अगर 2019 के लोकसभा चुनाव में साझा विपक्ष मैदान में उतरता है तो मोदी के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है। ऐसे में विपक्ष को घेरने के लिए राम मंदिर निर्माण ही बीजेपी के पास एक मात्र ब्रह्मास्त्र है। अगर बीजेपी ने इसका इस्तेमाल किया तो वह फायदे में रह सकती है।

 

नहीं रुकेगा मोदीजी का देशव्यापी अश्वमेध घोड़ा

 

मोदीजी का घोड़ा गुजरात चुनाव में ठिठका था, राजस्थान और यूपी के उपचुनावों में झटका खाकर त्रिपुरा में संभला था और कर्नाटक में फिर रुक गया। सच यह है कि विजयी अश्व अभी बंधा नहीं, बस अटका है। जब घोड़ा अटका है तभी विपक्ष झूम रहा है। लेकिन विपक्ष को समझना होगा कि घुड़दौड़ में भाजपा को बहुमत से पहले रोकना या फिर घोड़ा मंडी में परचून की बिक्री को थोक की डील से रुकवाना एक बात है, अश्वमेध के घोड़े को रोकना दूसरा खेल है। क्योंकि विपक्षी एकता कितनी टिकाऊ होगी। उसके बारे में तो अभी कुछ कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना तो तय है कि इसकी मियाद चार-छह महीने से ज्यादा नहीं हैं। बेंगलुरू की विपक्षी एकता की तमाम फोटो में एक भी ऐसी फोटो भी नहीं मिला, जिसमें वहां उपस्थित सभी विपक्षी नेता एक साथ दिख जाएं। बड़ी ग्रुप फोटो में नायडू और ममता नदारद हैं, बाकी फोटो में वे दोनों हैं तो अन्य नेता नहीं। नवीन पटनायक आए नहीं, चंद्रशेखर राव पहले आकर चले गए, और एक बार लालूजी के साथ फोटो खिंचवाकर फंसे केजरीवाल इस बार फोटो से दूर रहे। यानी कि अभी विपक्षी एकता का गोंद पक्का नहीं हुआ है। इतनी कच्ची रस्सी से अश्वमेध का घोड़ा बंधेगा नहीं। सच यह है कि देश के आधे से ज्यादा राज्यों में बीजेपी विरोधी एकता का कोई मतलब नहीं है। क्योंकि वहां या तो सीधे-सीधे कांग्रेस और भाजपा में मुकाबला है या फिर भाजपा वहां एक महत्वपूर्ण राजनीतिक ताकत है ही नहीं। अगर गठबंधन का फायदा है तो मुख्यतः उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, महाराष्ट्र, हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों तक सीमित है। इन राज्यों में प्रभावी गैर-भाजपा गठबंधन से 50 से 70 सीटों का फर्क पड़ सकता है। मगर याद रहे कि इन राज्यों में भी भाजपा विरोधी मोर्चा बनाने का दीर्घकालिक असर यही होगा कि भाजपा का अपना जनाधार बढ़ेगा। क्योंकि खाली मोदी विरोधी एकता से जनता में आशा का संचार कम से कम तो नहीं होने वाला है। आज देश को सिर्फ विरोध नहीं, विश्वास की तलाश है। सिर्फ विपक्ष नहीं विकल्प की जरूरत है। चार साल तक मोदीजी के मुकाबले जनता अब तक कोई ऐसा नेतृत्व नहीं ढूंढ़ पाई है,जिसके कर्म और वचन दोनों पर भरोसा किया जा सके। क्या बेंगलुरू के ग्रुप फोटो में उन्हें कोई भी ऐसा चेहरा दिखाई दिया होगा? अगर मोदी सरकार का विकल्प खड़ा करना है तो देश के सामने कोई बड़ा सपना पेश करना होगा। भाजपा विरोधी जमावड़ा क्या ऐसा सपना पेश करेगा? क्या बंगाल के पंचायत चुनावों में तांडव रचने वाली ममता बनर्जी को बगल में खड़ा कर राहुल गांधी देश को मोदी और शाह के अलोकतांत्रिक हथकंडों से मुक्ति का सपना दिखाएंगे? क्या शरद पवार, मायावतीजी, लालूजी के सुपुत्र, चंद्रशेखर राव और करुणानिधि के वंशज देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने का सपना दिखाएंगे? क्या आजम खान की समाजवादी पार्टी (या संभवतः शिवसेना भी) देश को धर्मनिरपेक्षता का रास्ता दिखाएगी? सिद्धांत और नैतिकता की बात भूल भी जाएं, तो क्या यह विपक्षी एकता भाजपा का मुकाबला करने लायक संकल्प, ऊर्जा और रणकौशल पैदा कर पाएगी? ये बड़ा सवाल है।

 

बिहार में नीतीश दे सकते हैं मोदी को झटका

 

बिहार की नजर से देखा जाए तो नीतीश कुमार शायद पछता रहे होंगे कि उन्होंने बीजेपी के साथ आकर क्या सियासी शतरंज में मात तो नहीं खा ली। आखिर उनके ही दल के विधायक के इस्तीफे से खाली हुई थी जोकीहाट की सीट। यहां से नीतीश कुमार को जीतना ही चाहिए था लेकिन जेल में दिन बिता रहे चारा चोर लालू के सियासी रंगरुट बेटे ने बाजी पलट दी। नीतीश कुमार के लिए चिंता की बात सीएसडीएस की सर्वे हैं जो बता रहा है कि बिहार में बीजेपी मजबूत हो रही है और जदयू कमजोर रो रहा है। यही वजह है कि नीतीश कुमार ने कुछ दिनों से सुर बदला है। नोटबंदी की आलोचना की है, बिहार को विशेष राज्य का दर्जा देने की वकालत की है और सांप्रदायिक सदभाव के लिए जान देने का संकल्प दोहराया है। जोकीहाट की हार के बाद नीतीश कुमार कुछ ऐसा तो नहीं सोच रहे जो 2019 से पहले सभी राजनीतिक पंडितों को चैंका जाए, फिरहाल यह वक्त बताएगा लेकिन तय है कि बिहार में खिचड़ी पकनी शुरू हो गयी है। महाराष्ट्र में बीजेपी एक सीट पर जीती और एक पर हारी है। इस जीत के बाद संभव है कि शिवसेना को लगे कि बीजेपी के साथ लड़ने में ही भलाई है। हो सकता है कि उसे लगे कि बीजेपी को हराने के लिए विपक्ष का हिस्सा बनना जरुरी है। लेकिन तय है कि एनसीपी और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन लगभग हो ही गया है। इसी तरह झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने दोनों सीटें सिल्ली और गोमिया को निकाल कर सत्तारुढ़ बीजेपी को परेशानी में डाला है। वहां भी कांग्रेस और लालू के दल के साथ झारखंड मुक्ति मोर्चा एक गठबंधन के तहत लोकसभा चुनाव लड़ता दिख रहा है.। बीजेपी के लिए सचमुच संकट है। अगर विपक्ष इसी तरह एक होता रहा तो खुद के बल पर 51 फीसद वोटों का जुगाड़ करना बेहद कठिन हो जाएगा। बीजेपी को यह भी समझना चाहिए कि आखिर क्यों वह उपचुनाव हार रही है जहां जहां उसकी सरकार राज्य में है। कहीं यह विपक्षी एकता से ज्यादा सत्तारुढ़ बीजेपी मुख्यमंत्रियों के कामकाज के खिलाफ तो वोट नहीं है। कुछ ऐसा ही राजस्थान, मध्यप्रदेश और बिहार में भी है। बीजेपी के लिए बहुत आसान है कह देना कि विपक्ष एक हो गया और हार हो गयी लेकिन पार्टी आलाकमान को देखना होगा कि उसकी राज्य सरकारें कहां क्या चूक कर रही हैं, सत्ता और संगठन में कहां खाइयां पैदा हो रही हैं और कहीं मोदी-शाह का केन्द्रीयकरण आम कार्यकर्ता में भ्रम तो पैदा नहीं कर रहा है।

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