23 April, 2018

महिलाओं के गिरते लिंगानुपात पर बेफिक्र है योगी सरकार!

Yogi government, sex ratio of women, Uttar Pradesh
  • पेचीदगी में उलझ गया भ्रूण जांच पर कार्रवाई का ‘फंदा’
  • डिकॉय सेल बनाने की शुरू हुई थी कवायद
  • विभागों की सहमति में अटकी प्रक्रिया

लखनऊ। राजस्थान राज्य की तर्ज पर यूपी में कन्या भू्रण हत्या रोकने के लिए गठित होने वाला पीसीपीएनडीटी सेल (प्री कॉनसेप्शन एंड नाटल डायग्नोस्टिक टेक्निक्स) का प्रस्ताव अफसरों और डाक्टरों की आपसी खींचतान की वजह से खटाई में पड़ गया है। सेल के गठन के बाद यूपी में कन्या भ्रूण हत्या पर लगाम लगेगा, साथ ही महिलाओं गिरता लिंगानुपात पर भी काबू पाया जा सकेगा। अधिकारों में कटौती और कार्रवाई की डर से जहां डाक्टर पीसीपीएनडीटी सेल के गठन में हर अड़चन खडी कर रहे हैं वहीं शासन और मंत्री अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग अलाप रहे हैं।

राजस्थान की टीमों ने यहां की छापेमारी

राजस्थान की एक डिकॉय (फंदा) टीम ने अलीगढ़ में एक नर्सिंग होम में भ्रूण लिंग परीक्षण का मामला पकड़ा। बीते डेढ़ साल में राजस्थान की टीम की यह यूपी में दसवीं छापेमारी थी। लोगों की निशानदेही पर आगरा, अलीगढ़ और उसके आसपास के इलाकों में की गई छापेमारी में कई नर्सिंग होम में भ्रूण लिंग जांच के मामले पकड़े गए हैं, लेकिन प्रदेश का अपना सिस्टम इस मामले में बिलकुल सुस्त है। राजस्थान की तरह यहां भी इस गोरखधंधे पर फंदा कसने के लिए यूपी में भी डिकॉय सेल बनाने की कोशिश हुई, लेकिन तमाम पेचीदगियों के कारण अब तक इसका गठन नहीं हो सका है। वह भी तब जबकि प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने के तुरंत बाद महिला एवं बाल विकास विभाग के प्रजेंटेशन के बाद विभागीय मंत्री रीता बहुगुणा जोशी ने इस सेल के गठन की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि कहा था कि सीएम की मंशा है कि प्रदेश में घटते हुए लिंगानुपात को रोका जाए और यहां प्री-कंसेप्शन ऐंड प्री-नाटल डायग्नॉस्टिक टेक्नीक्स (पीसीपीएनडीटी) ऐक्ट के तहत डिकॉय सेल बनाई जाए।

ऐसे काम करती है सेल

आम तौर पर भ्रूण लिंग की जांच करने वाले नर्सिंग होम या दूसरे तरह के सेंटर तमाम प्रभावशाली लोगों के संरक्षण में चलते हैं। स्थानीय पुलिस को भी इनके बारे में जानकारी होती है, लेकिन वे करते कुछ नहीं। जिले के सीएमओ से लेकर अन्य लोगों को भी इसका पता होता है। लिहाजा भ्रूण लिंग परीक्षण करने वाले केंद्र पर छापेमारी करने और उन्हें पकड़ने के लिए एक विशेष सेल गठित किया जाता है। राजस्थान ने घटते लिंगानुपात को रोकने के लिए पीसीपीएनडीटी ऐक्ट के तहत विशेष डिकॉय सेल बनाई है। इस सेल में पुलिस, स्वास्थ्य, महिला एवं बाल विकास विभाग, परिवार कल्याण और न्याय से संबंधित लोग होते हैं। दलाल अगर किसी महिला से भ्रूण लिंग परीक्षण के लिए संपर्क करें और महिला इसकी जानकारी सेल को दे देती है तो यह सेल काम करना शुरू कर देती है। महिला को संबंधित दलाल के साथ उस सेंटर में भ्रूण लिंग परीक्षण के लिए भेजा जाता है। यह विशेष टीम उन पर नजर रखे रहती है। बाद में लिंग परीक्षण करते समय सेंटर पर छापा मारा जाता है।

सूचनाओं पर भी यूपी में नहीं होता काम

राजस्थान में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) के एमडी नवीन जैन की सरपरस्ती में डिकॉय सेल काम कर रही है। नवीन जैन के मुताबिक जब भी हमें यूपी में इस तरह के केंद्र चलने की जानकारी मिलती है तो सूचना प्रदेश सरकार से भी साझा करते हैं। सालाना कॉन्फ्रेंस में भी इस तरह की बातें बताई जाती हैं, हालांकि कार्रवाई नहीं होती। यूपी में ऐसे सेंटर बदस्तूर चल रहे हैं। अब जबकि यूपी में चल रहे सेंटरों से राजस्थान की महिलाएं प्रभावित होंगी तो हमारे पास इन पर छापेमारी करने के अलावा कोई और चारा नहीं होता।

राजस्थान-यूपी बॉर्डर कारोबार का गढ़

राजस्थान में इस तरह के सेंटरों पर कई तरह से नकेल कसी गई। इसकी वजह से यूपी के बॉर्डर एरिया में यह काम धड़ल्ले से शुरू हो गया। राजस्थान की डिकॉय सेल के इनपुट के मुताबिक राजस्थान-यूपी के बॉर्डर एरिया में भ्रूण लिंग की जांच करने वाले तमाम सेंटर चल रहे हैं। यहां से दलाल राजस्थान जाते हैं और ऐसे लोगों को ट्रेस करते हैं जो भ्रूण लिंग परीक्षण करवाना चाहते हैं। रेट तय होने के बाद एक निश्चित तारीख पर उन्हें यूपी लाकर परीक्षण करवाया जाता है। राजस्थान के इनपुट के मुताबिक यूपी में चलने वाले सेंटरों में भ्रूण लिंग परीक्षण का रेट काफी कम है और ज्यादातर पैसा दलालों के पास ही जाता है। एक परीक्षण के लिए अमूमन 30 से 40 हजार रुपये लिए जाते हैं। इनमें सेंटर का रेट महज छह-सात हजार रुपये ही है और बाकी पैसा दलालों के हिस्से जाता है।

डॉक्टर नहीं हो पा रहे एक राय

सूत्रों के मुताबिक डॉक्टरों के मजबूत कॉकस से यूपी में यह मामला फंसा है। महिला एवं बाल विकास विभाग ने डिकॉय सेल का प्रस्ताव बनाकर सभी विभागों को सहमति के लिए भेजा था। गृह विभाग ने इसके लिए सहमति दे दी। परिवार कल्याण विभाग महिला एवं बाल विकास विभाग का ही हिस्सा है तो वहां भी दिक्कत नहीं थी। न्याय विभाग ने ऐक्ट के मुताबिक इस तरह की सेल के लिए सहमति दे दी, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की तरफ से सहमति नहीं मिली। जानकार बताते हैं कि डॉक्टर इस तरह के सेल बनने को लेकर एक राय नहीं हैं। हॉस्पिटल डॉक्टरों के अपने हैं। अगर सेल की टीम छापेमारी करती है तो उनको नुकसान होगा। लिहाजा इस पर सहमति न हो पाने के कारण डिकॉय सेल नहीं बन पा रही है।

पुलिस फोर्स की कमी का रोना 

महिला एवं बाल विकास विभाग की मंत्री प्रो़ रीता बहुगुणा जोशी ने कहा कि प्रदेश में पुलिस फोर्स की कमी है, जो इसमें एक अड़चन है। हालांकि ‘मुखबिर’ योजना के तहत परिवार कल्याण विभाग ने पिछले तीन महीने में तीन छापेमारी की हैं। छापेमारी के बाद निश्चित रूप से कुछ डॉक्टरों में रोष है। हालांकि, हम डिकॉय सेल बनाने की कोशिश में जुटे हैं। उम्मीद है कि अगले एक सप्ताह में सीएम के साथ बैठक होगी और उसमें इस पर फैसला होगा।

 

rgautamlko@gmail.com

Review overview
NO COMMENTS

POST A COMMENT