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भाजपा को धूल चटाने में जुटी सपा-बसपा

'म्युचुअल अंडर स्टैंडिंग' के आधार पर विरोधियों को साइड लाइन करने में लगी सपा-बसपा  

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निर्भय राज

BSP: लखनऊ। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को सपा-बसपा जोर का झटका धीरे से देने की ‘म्युचुअल अंडर स्टैंडिंग’ पर काम कर रहे हैं।  यह ‘म्युचुअल अंडर स्टैंडिंग’ भले ही प्रत्यक्ष तौर पर नजर नहीं आ रही है। लेकिन अप्रत्यक्ष तौर सपा-बसपा अपने विरोधियों को साइड लाइन करने और भाजपा-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों यूपी में धूल चटाने की फिराक में हैं। राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सपा-बसपा की इस रणनीति से भाजपा को सबसे ज्यादा नुकसान होने की संभावना है। उल्लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में धुर-विरोधी पार्टी सपा-बसपा का गठबंधन हुआ था। जिस तरह के परिणाम की अपेक्षा दोनों पार्टियों ने की थी, वह नहीं मिला था। जीरो से बसपा 10 पर पहुंच गई थी। जबकि सपा मात्र अपनी पांच सीट ही बचा पाई थी।

2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह चर्चा काफी तेज हुई कि बसपा भी इंडिया गठबंधन में शामिल होगी। लेकिन बसपा (BSP) सुप्रीमो मायावती ने अपने पुराने गठबंधन के अनुभव को देखते हुए अकेले ही चुनाव लडऩे का ऐलान किया। सपा-बसपा भले ही यूपी में बगैर गठबंधन किए एक-दूसरे के खिलाफ मैदान में ताल ठोंक रहे हैं। लेकिन कुछ तथ्य इस बात का संकेत देती हैं कि अप्रत्यक्ष तौर पर एक-दूसरे की मदद कर रहे हैं। सपा से नाराज होने के बाद अपना दल (कमेरावादी) की मुखिया पल्लवी पटेल ने अपने बयानों में कहा था कि वह बसपा के सम्पर्क में हैं। लेकिन ‘म्युचुअल अंडर स्टैंडिंग’ के आधार पर बसपा ने पल्लवी पटेल को कोई तरजीह नहीं दी।

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इसी तरह आजाद समाज पार्टी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद को नगीना सीट पर समर्थन और टिकट नहीं दिया। सपा-बसपा की इस रणनीति के पीछे यह मंशा है कि इन छोटे दलों को तरजीह दी तो उनको ही नुकसान होगा। जहां बसपा ने अपने टिकट वितरण में यूपी की सुरक्षित सीटों पर अपने कॉडर और मिशनरी नेताओं को वरीयता दी है। इसके पीछे बसपा की रणनीति है कि अपने परम्परागत वोट बैंक को संदेश दिया जाए कि  वह अपने पुरानी नीति बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय पर वापस आ गई है। इससे बसपा का नाराज वोटर वापस पार्टी से जुड़ जाएगा। साथ ही किसी अन्य राजनीतिक दल को सपोर्ट नहीं करेगा। इसके साथ ही बसपा ने फारवर्ड समाज के दमदार प्रत्याशियों पर जातीय समीकरण के मुताबिक दांव लगाया है।

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मुस्लिम समाज को बसपा हमेशा की तरह टिकट देने में वरीयता दी है। साथ ही यह भी संदेश दिया है कि सिर्फ और सिर्फ बसपा ही मुस्लिम समाज की सच्ची हितैषी पार्टी है। सपा-बसपा की राजनीति पर बारीक नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक रतनमणि लाल कहते हैं कि 1992 से लेकर 2017 तक यूपी की राजनीति पर नजर डाले तो यह पता चलता है कि सपा-बसपा के मुखिया मुलायम और मायावती का ही राज रहा है। जिस तरह से तमिनाडु में दो पार्टियों एडीएमके और डीएमके का राज होता है उसी की तर्ज पर सपा-बसपा को यह बात समझ में आ गई है अगर वे सावधान नहीं रहे तो उनकी पार्टी का भविष्य अच्छा नहीं रहेगा और सत्ता से बाहर रहेंगे। इसी रणनीति के तहत सपा और बसपा ने पल्लवी पटेल और चंद्रशेखर आजाद को राजनीतिक संरक्षण नहीं दिया।

सपा ने कांग्रेस से गठबंधन भले ही नहीं किया है लेकिन मात्र 17 सीटें देकर कांग्रेस की औकात बता दी है। इसी तरह बसपा ने भी भाजपा को उसकी औकात बताने के लिए टिकट वितरण ऐसा किया है कि सबसे अधिक नुकसान भाजपा को होने की संभावना है। बसपा अपने चुनावी कैंपेन में सबसे अधिक भाजपा पर मुखर है। इसकी पीछे बसपा की यह रणनीति है कि जनता उसे भाजपा की बी टीम न समझे। सपा और बसपा का लक्ष्य है कि भाजपा को ज्यादा से ज्यादा नुकसान पहुंचा कर केन्द्र की सत्ता से दूर रखने का है।


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